अपर्णा

राजनीतिक विमर्श की भाषा सुधरे

अपर्णा

पिछले एक-डेढ़ दशक से राजनीतिक विमर्श की भाषा में जो बदलाव आया है, वह एक चिंतनीय प्रश्न है. चाहे वह राजनीतिक प्रवक्ताओं का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में बहस हो या चुनावी सभाओं में नेताओं का भाषण, उसमें बहस की संस्कृति में आया बदलाव स्पष्ट दिखता है.भाषा की संस्कृति में जुमलेबाजी ने अपना स्थान बना लिया है, जो अराजकता, बर्बर और असभ्य अभिव्यक्ति के रूप में दिखायी पड़ता है. भाषा की संस्कृति में गिरावट अचानक नहीं हुई है. यह दो बातों पर निर्भर करती है. एक, देश की राजनीतिक संस्कृति, जिसका तात्पर्य है राजनीति में कैसे और किस प्रकार के लोगों का वर्चस्व है. सत्तर के दशक तक की राजनीति पर स्वतंत्रता आंदोलन की छाया थी.

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