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नारी जब तुम्हें देखता हूं
-विवेक कुमार पाठक- नारी जब तुम्हें देखता हूं प्रकृति जैसी समानता दिखती निःश्चल ममता दिखती है नव पत्तों की कोमलता दिखती है वसंत की खुशहाली दिखती है जनने का सामर्थ्य दिखता है दृढ़ निश्चयी, अडिग दिखती हो तुझमें दिखता मुझे एक दर्पण पूरा जीवन दूसरों के लिए अर्पण शक्ति की अवतार सृष्टि की आधार अधरों पर मुस्कान अमृत का कराती पान तुम्हारा क्रंदन सृष्टि में स्पंदन नर, नारी दोनों को जनती हो समान ममता बरसाती हो ऊंच -नीच का भाव न होता सेवा का कोई मोल न होता प्रकृति और तुम बिन सृष्टि का चिंतन व्यर्थ फिर क्यों दोनों के साथ अनर्थ? युग बीते सदियां बीतीं अधिकार बदले लेकिन शोषण के आधार न बदले देशी- विदेशी आक्रांता देखे आतंकवादी मसीहा देखे नारी का शोषण कर क्रूरता का परचम लहराते देखा लड़ते देखा, मरते देखा क्रूरता का साम्राज्य मिटते देखा देखा दमनों में पिसती नारी गिरती और उठती नारी नर को जनती नारी सृष्टि की प्यारी नारी मत इतराओं, झूठे सामर्थ्य पर मत करो अनर्थ अस्तित्व से मत करो इनकार मिट जायेगा तुम्हारे जीवन का सार जब नारी और प्रकृति जगती है इतिहास और भूगोल बदलती है संपर्क : ग्राम -गोपालपुर पो- मीरगंज, जनपद- जौनपुर उत्तर प्रदेश Mobile- 7007460723