60 results found for ''चुनावी''
नियुक्तियां हों चुनाव में मुद्दा
झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 की घोषणा होते ही पक्ष-विपक्ष नये-नये वादों, घोषणाओं, आरोप-प्रत्यारोप व उपलब्धियों के साथ चुनावी मैदान में उतर रहे हैं. प्रत्येक चुनाव की तरह इस चुनाव में भी मुख्य रूप से स्वास्थ्य, बिजली, सड़क, पानी, भ्रष्टाचार जैसी कई समस्याएं व मुद्दे हैं, पर सबसे अहम मुद्दा है रोजगार की कमी. हम सभी जानते हैं कि झारखंड में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है और सरकार की नीतियों के कारण या तो बहाली हुई ही नहीं या न्यायालय में अटकने के कारण अपूर्ण है.
झारखंड विस चुनाव 2019 : भाजपा-आजसू में दरार, रोमांचक हुई चुनावी जंग, आजसू की सीट पर भी भाजपा उतार सकती है प्रत्याशी
रांची : विधानसभा चुनाव से पहले ही भाजपा-आजसू का गठबंधन टूट गया. इसकी वजह से चुनावी रोमांच बढ़ गया है. आजसू ने गुरुवार को 11 प्रत्याशियों की सूची जारी की. आजसू ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा के खिलाफ उम्मीदवार उतारा है. भाजपा ने लक्ष्मण गिलुवा को चक्रधरपुर से प्रत्याशी बनाया है. आजसू ने इस सीट पर रामलाल मुंडा को चुनाव मैदान में उतारा है. अब चुनावी जंग सिल्ली से लेकर रामगढ़ तक होगी. भाजपा भी आजसू प्रत्याशी के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा कर सकता है.
झारखंड विस चुनाव 2019 : भाजपा-आजसू में दरार, रोमांचक हुई चुनावी जंग, आजसू की सीट पर भी भाजपा उतार सकती है प्रत्याशी
रांची : विधानसभा चुनाव से पहले ही भाजपा-आजसू का गठबंधन टूट गया. इसकी वजह से चुनावी रोमांच बढ़ गया है. आजसू ने गुरुवार को 11 प्रत्याशियों की सूची जारी की. आजसू ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा के खिलाफ उम्मीदवार उतारा है. भाजपा ने लक्ष्मण गिलुवा को चक्रधरपुर से प्रत्याशी बनाया है. आजसू ने इस सीट पर रामलाल मुंडा को चुनाव मैदान में उतारा है. अब चुनावी जंग सिल्ली से लेकर रामगढ़ तक होगी. भाजपा भी आजसू प्रत्याशी के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा कर सकता है.
टी एन शेषन पंचतत्व में विलीन
चेन्नई : पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन, जिन्होंने देश में चुनाव सुधारों को आगे बढ़ाया और चुनावी मैदान से धनबल और बाहुबल को खत्म करने का बीड़ा उठाया, उनका सोमवार को यहां अंतिम संस्कार किया गया.
लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने में शेषन के योगदान हमेशा याद किये जायेंगे : सुशील मोदी
पटना : बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने ट्वीट कर कहा है कि भारत के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने देश को पहली बार चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की वास्तविक शक्ति से परिचित कराया और बैलेट पेपर से मतदान वाले दौर में होने वाली बूथ-लूट और चुनावी हिंसा को रोकने में प्रभावी भूमिका निभायी. शेषन ने चुनाव सुधार के लिए पहचान पत्र लागू करने-जैसे जो कड़े कदम उठाये, उससे बिहार में जंगलराज के अंत की शुरुआत हुई. उन्होंने कहा कि भारत की लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया को विश्वसनीय बनाने में शेषन के योगदान हमेशा याद किये जायेंगे. बिहार की जनता की ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!
चुनावी समर में गंभीरता जरूरी
चुनावी समर में आरोप प्रत्यारोप के साथ निम्न स्तरीय भाषा शैली का प्रयोग आज बहुत ही सामान्य हो गया है. आनेवाले दिनों में झारखंड के विधानसभा चुनाव का प्रचार बेशक इस दलील को सही साबित करेगा. लेकिन राजनीतिक दलों ªद्वारा जरूरी चुनावी मुद्दों को बेहतर तरीके से लोगों के सामने प्रस्तुत कर इनके निदान के लिए प्रयास अति सराहनीय पहल हो सकती है.
विधायक का सफरनामा : एक अकेला, पर तीन बार बदली पार्टी
बरही : उमा शंकर अकेला का चुनावी राजनीतिक जीवन गतिमान रहा है. वे किसी राजनीतिक दल में स्थिर होकर नहीं रह सके. अब तक उन्होंने तीन दल बदला है. बरही से उन्होंने अपना राजनीतिक कैरियर बाबू जगजीवन राम की पार्टी कांग्रेस (जे) से शुरू किया था. वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में वह बरही से कांग्रेस (जे) के टिकट पर लड़े तथा करीब 7500 वोट पाया. इस चुनाव में जीतने वाले उम्मीदवार को लगभग 11 हजार वोट मिले थे.
विधायक का सफरनामा : एक अकेला, पर तीन बार बदली पार्टी
बरही : उमा शंकर अकेला का चुनावी राजनीतिक जीवन गतिमान रहा है. वे किसी राजनीतिक दल में स्थिर होकर नहीं रह सके. अब तक उन्होंने तीन दल बदला है. बरही से उन्होंने अपना राजनीतिक कैरियर बाबू जगजीवन राम की पार्टी कांग्रेस (जे) से शुरू किया था. वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में वह बरही से कांग्रेस (जे) के टिकट पर लड़े तथा करीब 7500 वोट पाया. इस चुनाव में जीतने वाले उम्मीदवार को लगभग 11 हजार वोट मिले थे.
फ्लैश बैक : जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र, एक नारे ने पलटी शमशुद्दीन खान की बाजी और चुनाव जीत गये एमपी सिंह
जमशेदपुर : भारतीय लोकतंत्र में कोई भी चुनाव बगैर नारों के संपन्न नहीं हो सकता. नारे न तो कविता हैं, न ही कहानी, इन्हें साहित्य की श्रेणी में रखा गया है. पर वे नारे ही हैं, जो लोगों को किसी दल और उसकी सोच को जनता के सामने लाते हैं. ऐसे ही एक नारे ने जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा में 1985 के चुनाव परिणाम काे बदल दिया था. बिहार में कांग्रेस प्रत्याशी रहे तारिक अनवर ने एक चुनावी नारा लगाया था. उसी नारे काे 1985 में जमशेदपुर पश्चिम के चुनाव में तलवार की तरह इस्तेमाल किया गया. इस चुनाव में भाजपा के मृगेंद्र प्रताप सिंह आैर कांग्रेस के माे शमशुद्दीन खान के बीच कांटे की टक्कर थी.
फ्लैश बैक : जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा क्षेत्र, एक नारे ने पलटी शमशुद्दीन खान की बाजी और चुनाव जीत गये एमपी सिंह
जमशेदपुर : भारतीय लोकतंत्र में कोई भी चुनाव बगैर नारों के संपन्न नहीं हो सकता. नारे न तो कविता हैं, न ही कहानी, इन्हें साहित्य की श्रेणी में रखा गया है. पर वे नारे ही हैं, जो लोगों को किसी दल और उसकी सोच को जनता के सामने लाते हैं. ऐसे ही एक नारे ने जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा में 1985 के चुनाव परिणाम काे बदल दिया था. बिहार में कांग्रेस प्रत्याशी रहे तारिक अनवर ने एक चुनावी नारा लगाया था. उसी नारे काे 1985 में जमशेदपुर पश्चिम के चुनाव में तलवार की तरह इस्तेमाल किया गया. इस चुनाव में भाजपा के मृगेंद्र प्रताप सिंह आैर कांग्रेस के माे शमशुद्दीन खान के बीच कांटे की टक्कर थी.
एक बार फिर लगा बैंकिंग पर चुनावी ग्रहण
लोकतंत्र के महापर्व में बैंकिंग सेक्टर के बुरे दिन आने वाले हैं. बैंकिंग सेक्टर पर चुनावी ग्रहण लग गया है. असर बैंकिंग योजनाओं की गति पर होने वाला है. दरअसल हर तिमाही होने वाली जिला स्तरीय समन्वय समिति की बैठक को चुनाव के कारण टाल दिया गया है. 2019 में यह दूसरा मौका है, जब बैठक को टाला गया है. इससे पहले लोकसभा चुनाव के दौरान यह कदम उठाना पड़ा था.
52 वर्ष पहले जनसंघ के बालेश्वर दास ने छीना था कांग्रेस से देवघर सीट, बूट पॉलिश कर जुटाते थे चुनावी खर्च
देवघर : देवघर (बाबा नगरी) विधानसभा सीट 1962 में एससी के लिए सुरक्षित घोषित हुई, तब जनसंघ के प्रत्याशी बालेश्वर दास ने कांग्रेस से यह सीट छीनी थी. इससे पहले 1952 में कांग्रेस के पं विनोदानंद झा को फॉरवर्ड ब्लॉक के भुवनेश्वर पांडेय उर्फ भूमि पांडेय ने हराया था. 1957 के चुनाव में कांग्रेस ने बाजी पलट दी और शैलबाला राय ने चुनाव जीता था.
52 वर्ष पहले जनसंघ के बालेश्वर दास ने छीना था कांग्रेस से देवघर सीट, बूट पॉलिश कर जुटाते थे चुनावी खर्च
देवघर : देवघर (बाबा नगरी) विधानसभा सीट 1962 में एससी के लिए सुरक्षित घोषित हुई, तब जनसंघ के प्रत्याशी बालेश्वर दास ने कांग्रेस से यह सीट छीनी थी. इससे पहले 1952 में कांग्रेस के पं विनोदानंद झा को फॉरवर्ड ब्लॉक के भुवनेश्वर पांडेय उर्फ भूमि पांडेय ने हराया था. 1957 के चुनाव में कांग्रेस ने बाजी पलट दी और शैलबाला राय ने चुनाव जीता था.
88 पैक्स का मार्च 2020 में होगा टर्म पूरा
पैक्स चुनाव के घोषणा के बाद चुनावी सरगर्मी तेज हो गया है. प्रबंध कार्यकारिणी के 12 पदों पर 5 चरणों में होने वाले पैक्स चुनाव में 289 पैक्स में ही चुनाव होगा. जबकि 88 पैक्स का टर्म मार्च 2020 में पूरा होने के कारण वहां चुनाव नहीं होगा. वहीं जिला में 21 पैक्स को विभिन्न कारणों से चुनाव प्रक्रिया से वंचित रखा गया है.
लसिया को प्रखंड बनाना होगा चुनावी मुद्दा
कोलेबिरा प्रखंड मुख्यालय से 15 किमी एवं जिला मुख्यालय से 45 किमी की दूरी पर स्थित है मुस्लिम बहुल गांव लसिया. यहां के लोग तीन दशक से लसिया को प्रखंड बनाने की मांग करते आ रहे हैं, किंतु उनकी मांग अब तक पूरी नहीं हुई. इस दौरान कितने विधायक आये और गये, किंतु लसिया को प्रखंड बनाने का सपना पूरा नहीं हो सका.
जिले में उच्च शिक्षा और रोजगार की कमी
झारखंड विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 30 नवबंर को लातेहार में चुनाव होना है. चुनाव आयोग द्वारा इसकी घोषणा की जा चुकी है. चुनाव की घोषणा के बाद लातेहार विधानसभा में चुनावी गतिविधि काफी तेज हो गयी है. वर्तमान समय में युवा मतदाता के मन में क्या सोच है और उनके दृष्टिकोण से इस चुनाव में मुख्य मुद्दा क्या होना चाहिए.
नवाडीह सड़क बनेगी चुनावी मुद्दा
गुमला विधानसभा क्षेत्र के डुमरी प्रखंड छत्तीसगढ़ राज्य से सटा हुआ है. इसकी भौगोलिक बनावट बरबस लोगों को अपनी और आकर्षित करती है. टांगीनाथ धाम के कारण यह क्षेत्र देश के मानचित्र में भी है, लेकिन आज इस क्षेत्र की बदनामी हो रही है.
रांची : भाजपा कार्यालय पहुंचे सीएम, लोगों से मिले
रांची : मुख्यमंत्री रघुवर दास मंगलवार को शाम में भाजपा कार्यालय पहुंचे. यहां पर उन्होंने एक घंटे तक कार्यकर्ताओं से अलग-अलग मुलाकात की. विभिन्न जिलों से आये कार्यकर्ताओं ने विधानसभा चुनाव में टिकट को लेकर अपनी दावेदारी पेश की. इसके बाद मुख्यमंत्री ने संगठन महामंत्री के साथ बैठक कर पार्टी की ओर से चलायी जाने वाले चुनावी गतिविधि के बारे में जानकारी हासिल की.
सुनिए झारखंड के नायकों को : चुनावी एजेंडे में झारखंडीपन होना जरूरी है
राजनीतिक पार्टियां चुनाव का घोषणा-पत्र अपनी विचारधारा को केंद्र में रख कर तैयार करती है़ं उस केंद्र के इर्द-गिर्द वे लोक लुभावन वादे करती है़ं. ये लोक लुभावन वादे जनता को दिखाने के लिए होते हैं, लेकिन ये वादे क्या वाकई जनता के होते हैं? घोषणा-पत्र तैयार करते हुए यह देखा जाना चाहिए कि उस क्षेत्र की जनता की अपनी भौगोलिक सांस्कृतिक विशेषता क्या है़ खासतौर पर जब प्रांतीय स्तर की बात हो, तो इसका सबसे ज्यादा ख्याल रखा जाना चाहिए.
सुनिए झारखंड के नायकों को : चुनावी एजेंडे में झारखंडीपन होना जरूरी है
राजनीतिक पार्टियां चुनाव का घोषणा-पत्र अपनी विचारधारा को केंद्र में रख कर तैयार करती है़ं उस केंद्र के इर्द-गिर्द वे लोक लुभावन वादे करती है़ं. ये लोक लुभावन वादे जनता को दिखाने के लिए होते हैं, लेकिन ये वादे क्या वाकई जनता के होते हैं? घोषणा-पत्र तैयार करते हुए यह देखा जाना चाहिए कि उस क्षेत्र की जनता की अपनी भौगोलिक सांस्कृतिक विशेषता क्या है़ खासतौर पर जब प्रांतीय स्तर की बात हो, तो इसका सबसे ज्यादा ख्याल रखा जाना चाहिए.