• विशेष लेख: भटक रहे हैं युवा, माता सरस्वती की पूजा पश्चिमी सभ्यता में हो रही है तब्दील

    कला व संस्कृति की प्रतीक विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों के लिए खास त्यौहार है. पूजा बसंत पंचमी के दिन मनाया जाता है. इसे माघ महीने के बसंत पंचमी के दिन हर स्कूल कॉलेजों एवं गली मोहल्लों में मनाया जाता है.

  • अमरता का पात्र

    एक बार धर्मशास्त्रों की शिक्षा देने वाला एक विद्वान ईसा मसीह के पास आया. उसने ईसा से पूछा- अमरता की प्राप्ति के लिए क्या करना होगा? ईसा मसीह बोले- इस पर धर्मशास्त्र क्या कहते हैं? व्यक्ति बोला- वे कहते हैं कि हमें ईश्वर को संपूर्ण हृदय से प्रेम करना चाहिए. अपने पड़ोसी और इष्ट मित्रों को भी ईश्वर से जोड़ देना चाहिए. ईसा ने कहा- बिल्कुल ठीक.

  • सफलता का मार्ग

    एक निःसंतान राजा था. वह वृद्ध हो चुका था और उसे राज्य के लिए एक योग्य उत्तराधिकारी की चिंता सताने लगी थी. योग्य उत्तराधिकारी के खोज के लिए राजा ने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि अमुक दिन शाम को जो मुझसे मिलने आयेगा, उसे मैं अपने राज्य का एक हिस्सा दूंगा.

  • मुक्ति का ज्ञान ही है सच्ची विद्या : बीके शीलू दीदी

    कोलकाता : प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, माउंट आबू के ध्यान व रोजयोग की अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विशेषज्ञ ब्रह्माकुमारी शीलू दीदी ने कहा कि विद्या वही है, जो दु:ख, रोग, कष्ट, तनाव और अवसाद से मुक्ति दे. समस्याओं से मुक्त करे. जीवन मुक्ति का ज्ञान ही सच्ची विद्या है. जीवन मुक्ति का ज्ञान केवल भगवान ही दे सकता है.

  • जिसने सत्य का आश्रय ले लिया उसे छू भी नहीं सकता कोई भय

    इस जगत की हर वस्तु के साथ भय मिश्रित रहता है. जिनके पास बहुत अधिक धन है, उनका व्यवसाय बहुत अच्छा चल रहा है, मगर उनके व्यवसाय में क्षति की आशंका भी रहती है.

  • नग्न होकर स्नान करने से लगता है दोष

    जमशेदपुर : श्री राजस्थान शिव मंदिर, जुगसलाई में गुरुवार को गोवर्धन प्रसंग और रुक्मिणी मंगल की कथा सुनायी गयी. कथावाचक आचार्य मयंक मनीष ने कहा कि नग्न स्नान करने से व्यक्ति लौकिक और पारलौकिक दोनों जगह दोष का अधिकारी बनता है. स्त्रियों को खुले बाल में विचरण नहीं करना चाहिए. धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए. उसे कुचल कर नहीं चलना चाहिए.

  • गृहस्थ आश्रम इंसान को बनाता है जिम्मेदार

    सत्यनारायण मंदिर ठाकुरबाड़ी जुगसलाई में रामकथा के छठे दिन गुरुवार को माता सीता के स्वयंवर का प्रसंग हुआ. कथावाचक संतोष कृष्ण त्रिपाठी ऋषि ने कहा कि सभी आश्रमों में गृहस्थ को सबसे अच्छा माना गया है. विवाह बंधन में बंधकर ही व्यक्ति घर, परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदार बनता है. भगवान राम ने स्वयंवर में शिव धनुष तोड़ा.

  • विश्व शांति दिवस: जब कोई संघर्ष होता है, तो सबसे पहले संवाद खत्म होता है और फिर विश्वास टूटता है

    कुछ साल पहले, मैं इराक में हमारे राहत और पुनर्वास कार्यों को देखने गया था. हमें सुरक्षित क्षेत्र ( ग्रीन जोन) में रहने के लिए कहा गया था. हमारी सुरक्षा के लिए 12 वाहन और दो टैंकर उपलब्ध कराये गये थे. मैंने उनसे कहा कि मैं ''रेड जोन'' में जाना चाहता हूं, मैं ''ग्रीन जोन'' में क्या करूं? उन्होंने कहा कि ''रेड जोन'' काफी जोखिम भरा है और कुछ दिन पहले वहां बम विस्फोट हुए हैं, लेकिन जब मैंने आग्रह किया तो वे चिंतित हुए, चूंकि मैं उनका अतिथि था, इसलिए वे इनकार नहीं कर सके.

  • रहीम दास बोले- अंतर दाव लगी रहै

    प्रेम और विरह की अग्नि अंतर्मन में ही सुलगती है. यह किसी को दिखाई नहीं देती. इसका धुआं भी अदृश्‍य होता है. यह ऐसी असाधारण आग है, जो केवल प्रेमी को पीडित करती है.

  • रहीम दास बोले- अंजन दियो तो किरकिरी

    रहीम कहते हैं, काजल और सुरमा सब व्यर्थ हैं. मैंने तो जब से इन आंखों से ईश्‍वर के दर्शन किये हैं, इन आंखों में ईश्‍वर को बसाकर धन्य हो गया हूं. अर्थात् सौंदर्य-प्रसाधन छोड़कर ईश्‍वर को नयनों में बसाइए.

  • बोधकथा- पढ़ें एक प्रेरक कथा

    एक बार की बात है गौतम बुद्ध अपने भिक्षुओं के साथ विहार करते हुए शाल्यवन में एक वटवृक्ष के नीचे बैठ गये. धर्म चर्चा शुरू हुई और उसी क्रम में एक भिक्षु ने उनसे प्रश्न किया - "भगवन्! कई लोग दुर्बल और साधनहीन होते हुए भी कठिन से कठिन परिस्थितियों को भीमात देते हुए बड़े-बड़े कार्य कर जाते हैं, जबकिअच्छी स्थिति वाले साधन सम्प

  • बोधकथा : छोटों से भी सीख मिलती है

    एक बार कि बात है. स्वामी विवेकानन्द भारत भ्रमण करते हुए खेतरी के राजा के पास गये. राजा ने उनका बहुत सम्मान किया. राजा को उन्होंने अत्यन्त प्रभावित किया. उनके सम्मान में एक भजन गायिका नर्तकी बुलायी गयी. जब उन्होंने नर्तकी को देखा इच्छा हुई, अब यहाँ से चलें.

  • बोधकथा: समय का महत्व

    एक दिन युधिष्ठिर राजभवन में बैठे एक मंत्री से बातचीत कर रहे थे. किसी समस्या पर गहन विचार चल रहा था. तभी एक ब्राह्मण वहां पहुंचा. कुछ दुष्टों ने उस ब्राह्मण को सताया था. उन्होंने ब्राह्मण की गाय उससे छीन ली थी. वह ब्राह्मण महाराज युधिष्ठिर के पास फरियाद लेकर आया था. मंत्री जी के साथ बातचीत में व्यस्त होने के कारण महाराज युधिष्ठिर उस ब्राह्मण की बात नहीं सुन पाये. उन्होंने ब्राह्मण से बाहर इंतजार करने के लिए कहा. ब्राह्मण मंत्रणा भवन के बाहर रूक कर महाराज युधिष्ठिर का इंतज़ार करने लगा.

  • बोधकथा : झोली फैलायें, भगवान बहुत देता है

    एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गांवो में घूम रहा था. घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया. उसने अपने मंत्री को कहा कि, पता करो की इस गांव में कौन सा दर्जी हैं, जो मेरे बटन को लगा दे. मंत्री ने पता किया, उस गांव में सिर्फ एक ही दर्जी था, जो कपडे़ सिलने का काम करता था. उसको राजा के सामने ले जाया गया. राजा ने कहा कि क्या तुम मेरे कुर्ते का बटन लगा सकते हो.

  • बोधकथा : घमंडी का सिर नीचा

    बहुत समय पहले की बात है, कहीं से एक संत एक गांव में आये, गांव की चहारदीवारी के अंदर एक पीपल के पेड़ के नीचे धूनी रमाकर रहने लगे और भगवान का भजन करने लगे, धीरे-धीरे गांव वाले भी उनकी शरण में आने लगे, गांव वालों ने उनके लिए एक झोपड़ी भी बनवा दी, कुछ ही समय में साधू बाबा मशहूर हो गए. उसी गांव में एक सेठ भी रहता था जो काफी घमंडी था, वह बाबा से चिढ़ता था और कहता था कि बाबा तो ढोंगी है, ढोंग करता रहता है.

  • बोधकथा : विषय की पूरी जानकारी के बिना न करें टिप्पणी

    एक बार एक 26 साल का लड़का और उसका पिता रेलगाड़ी में सफ़र कर रहे थे. वह लड़का बार-बार खिड़की से झांक रहा था और बाहर देखते हुए पेड़ पौधों को देखकर जोर-जोर से चिल्ला रहा था और हंस रहा था. पास ही में एक शादी-शुदा जोड़ा बैठा थे वह यह सब देखकर हंस रहे थे.

  • कर्म का महत्व : हीरे की उपेक्षा पर लकड़हारे की कर्मशीलता को राजा का नमन

    किसी समय एक प्रजा हितैषी राजा था, वह नियमित रूप से वेश बदलकर निकलता और प्रजा के हालचाल जानता. प्रजा भी राजा के प्रति बहुत स्नेह व सम्मान रखती थी. प्रजा का कोई संकट, कोई समस्या या आवश्यकता राजा से न छिपी रहती. एक दिन राजा ने विचार किया कि सीमा से सटे गांवों की स्थिति को देखा जाये. वह अपने एक सहायक को लेकर घोड़े पर रवाना हुआ. दो-चार गांवों में राजा ने भ्रमण किया, वहां की समस्याओं को समझकर सहायक को समाधान हेतु दिशा-निर्देश दिये. फिर वह अगले गांव की ओर चला. रास्ते में राजा ने देखा कि एक बुजुर्ग व दुबला-पतला लकड़हारा पसीने में नहाया हुआ लकड़ियां काट रहा था. राजा को उस पर दया आ गयी. राजा उससे बात करने जा ही रहा था कि अचानक उसे पास की चट्टान में कुछ चमकता नजर आया. पास जाने पर पाया कि चट्टान की दीवारों में कई कीमती हीरे धंसे हुए थे. राजा यह सोचकर हैरान हुआ कि पास ही लकड़ी काट रहे लकड़हारे की दृष्टि इन हीरों पर क्यों नहीं पड़ी?

  • आध्यात्मिक नियम

    आध्यात्मिक अनुभव की कुछ झलक मिलते ही आप अपनी साधना बंद न करें. जब तक आप परम ब्रह्म में स्थित नहीं हो जाते, अपना अभ्यास जारी रखें. यदि आप अभ्यास बंद करके संसार में विचरण करेंगे, तो पतन की पूरी संभावना रहेगी. मात्र एक झलक से आप पूर्णत: सुरक्षित नहीं रह सकते. आप नाम और यश से उन्मत्त न हों.

  • सामाजिक बनने का अर्थ

    समाज हित के लिए एकाकी प्रयास भी किये जा सकते हैं. प्राचीन काल में ऋषि महर्षि अपना सारा जीवन ही घने जंगलों में बिता देते थे और समाज का स्तर किस प्रकार ऊंचा उठे, इसके लिए विचार करते और योजनाएं बनाया करते थे. समाज को ऊंचा उठाने के लिए अपना जीवन ही होम देने के आदर्श स्तुत्य हैं, किंतु ककहरा से आरंभ करनेवाले साधक के लिए अचानक उस स्थिति की कल्पना करना अव्यावहारिक ही होगा. इसका अर्थ समाज के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करनेवालों का गौरव घटाना नहीं है. कहा इतना भर जा सकता है कि हमें आरंभ सामाजिक बनने से करना चाहिए. जिसमें समाज के हितों का ध्यान रखने से लेकर समाज में रहने और समाज के अन्य सदस्यों से तालमेल बिठाने के विभिन्न साधना पक्ष है. स्वयं कार्यकुशल और सक्षम होने के बावजूद भी कितने ही व्यक्ति औरों से तालमेल न बिठा पाने के कारण अपनी प्रतिभा का लाभ समाज को नहीं दे पाते. समाज में रह कर अन्य लोगों से तालमेल बिठाने और अपनी क्षमता योग्यता का लाभ समाज को देने की स्थिति भी सामाजिकता से ही प्राप्त हो सकती है.

  • ध्यान और अंतर्दृष्टि

    ध्यान कुछ ऐसा है, जिसका उस तरह से अभ्यास नहीं किया जा सकता, जिस तरह आप वायलिन या पियानो बजाने का अभ्यास करते हैं. आप अभ्यास करते हैं अर्थात् आप पूर्णता के किसी खास स्तर पर पहुंचना चाहते हैं. पर, ध्यान में कोई स्तर नहीं है, कुछ पाना नहीं है.

  • ऊर्जा का उबाल बिंदु

    अपनी इच्छाओं को साकार करने का मतलब क्या है कल्पना करना, सपने देखना, इच्छा को तेज करना, इंतजार करना, प्रार्थना करना और मांगना. परंतु पाने का एक दूसरा तरीका भी है, जिसमें बिना कुछ मांगे, बिना कुछ सोचे सब कुछ अपने आप घटित होता है. इसके पहले कि हम वहां पहुंचे, हमें थोड़े जोश के साथ भिड़ना होगा. जो कभी आग में नहीं जले, वे पानी की ठंडक को नहीं जान पायेंगे. जिन लोगों ने अपना जीवन आधा-अधूरा जिया है, जो अपने जीवन में बस औपचारिक रहे हैं, वे दूसरे तरीके को कभी नहीं जान पायेंगे. अपनी ऊर्जा को उबाल बिंदु तक पहुंचाने और आगे बढ़ने के लिए कम-से-कम थोड़ी देर के लिए उन्मादी होना लाभदायक हो सकता है. तब उसे किसी दूसरे रूप में रूपांतरित करना बहुत आसान हो जाता है. कर्म या क्रिया का सारा मकसद यही है. यही कारण है कि एक साधक कर्म को चुनता है, वैसे भी हमें काम तो करना ही होगा. अब हमारे पास विकल्प यह है कि हम महात्मा गांधी जैसा काम करना चाहते हैं या हिटलर जैसा.

  • जीवन से प्रेम करना

    आत्मप्रशंसा अहंकार का बोधक माना जाता है. लेकिन, आत्मप्रशंसा जब झूठा प्रदर्शन बनता है, तभी उसे अहंकार माना जाता है. अगर मनुष्य प्रतिदिन अपनी आत्मप्रशंसा में यह कहे कि मैं एक अच्छा आदमी हूं, नैतिक जीवन जीता हूं, क्रोध नहीं करता, दूसरे की निंदा नहीं करता हूं, मैं एक सुंदर व्यक्ति हूं, मेरा शरीर काफी स्वस्थ है, मेरी आंखें सुंदर हैं.

  • दायें-बायें का फर्क क्यों

    आपने कभी गौर किया है कि बायें हाथ का उपयोग करनेवाले लोगों को दबा दिया जाता है! अगर कोई बच्चा बायें हाथ से लिखता है, तो तुरंत पूरा समाज उसके खिलाफ हो जाता है. माता-पिता, सगे-संबंधी, परिचित, अध्यापक सभी लोग एकदम उस बच्चे के खिलाफ हो जाते हैं. पूरा समाज उसे दायें हाथ से लिखने को विवश करता है. दायां हाथ सही है और बायां हाथ गलत है. आखिर कैसे? बायें हाथ में ऐसी कौन सी बुराई है? दुनिया में दस प्रतिशत लोग बायें हाथ से काम करते हैं. दस प्रतिशत कोई छोटा वर्ग नहीं है.

  • पाशुपतास्त्र एवं नारायणास्त्र

    तपस्याएं अनेक प्रकार की होती हैं. लेकिन, यहां पर मैं पंचाग्नि तपस्या की चर्चा कर रहा हूं, क्योंकि इसका संबंध पाशुपत विद्या के साथ है. पाशुपतास्त्र में ''फट्'' शब्द का उच्चारण करते हैं.

  • राष्ट्रभक्त में मानवता जरूरी

    मेरे लिए राष्ट्रीयता और मानवता एक ही चीज है. मैं राष्ट्रभक्त इसलिए हूं कि मैं मानव और सहृदय हूं. मेरी राष्ट्रीयता एकांतिक नहीं है, मैं भारत की सेवा करने के लिए इंग्लैंड या जर्मनी को क्षति नहीं पहुंचाऊंगा. मेरी जीवन-योजना में साम्राज्यवाद के लिए कोई स्थान नहीं है. राष्ट्रभक्त का नियम परिवार के मुखिया के नियम से भिन्न नहीं है. जिस राष्ट्रभक्त में मानवतावाद के प्रति उत्साह कम है, वह उतना ही कम राष्ट्रभक्त भी माना जायेगा.

  • ध्यान का पांचवां स्तर

    ध्यान वह अवस्था है, जिससे सब कुछ आया है और जिसमें सब कुछ जाता है. ध्यान आंतरिक मौन है, जहां आप आनंद, खुशी और शांति आदि महसूस करते हैं. क्या जानते हैं कि तीन तरह के ज्ञान होते हैं. एक वह जो हम अपनी इंद्रियों से प्राप्त करते हैं. ज्ञान का दूसरा स्तर होता है बुद्धि से. बुद्धि द्वारा हम जो ज्ञान प्राप्त करते हैं, वह इंद्रियों द्वारा प्राप्त ज्ञान से अधिक श्रेष्ठ होता है.

  • मनुष्य का विश्व समाज

    हमारे मनीषियों ने व्यक्तित्व के विकास का रहस्य समझाते हुए यही उद्घोष किया था कि संपूर्ण वसुधा ही हमारा परिवार है. यदि संसार को एक कुटुंब के रूप में और सभी व्यक्तियों से पारिवारिक स्नेह के संबंध विकसित जा सकें, तो व्यक्तिगत जीवन में जो प्रफुल्लता, आत्मसंतोष, आनंद और शांति की अनुभूति होगी, वह अन्य किसी माध्यम से संभव नहीं है.

  • हमारे जीवन का ध्येय

    आप इसलिए है, क्योंकि आपके माता-पिता ने आपको जन्म दिया है. आप भारत के ही नहीं, विश्व की संपूर्ण मानवता के शताब्दियों के विकास का परिणाम हैं. आप किसी असाधारण अनूठेपन से नहीं जन्में हैं, बल्कि आपके साथ परंपरा की पूरी पृष्ठभूमि है. आप हिंदू या मुसलिम हैं.

  • आदतों का बिगाड़

    इस समाज में आप किस तरह पल कर बड़े हुए? माता-पिता, शिक्षक, बंधु-मित्र इन सभी ने आपकी भलाई करने की नीयत से क्या किया था? वे लोग आस-पास के किसी व्यक्ति से तुलना करते हुए आपकी क्षमता को हमेशा कम ही आंका करते थे. उन्होंने सोचा होगा कि यदि आप खुद अपने को किसी और से कमतर महसूस करेंगे, तभी आपके अंदर वह प्रेरक शक्ति पैदा होगी, जो आपको कामयाबी की ओर भगाये ले चलेगी.

  • मानवमात्र का अस्तित्व

    इतने सारे लोग हैं दुनिया में, जब वे दुनिया से चले जायेंगे, तो लोग उन्हें पहचानेंगे कैसे? क्या उसने अपनी कोई पहचान बनायी? वह तो जीवनभर दिग्भ्रमित होता रहा और ऐसे ही एक दिन उसकी सांसे बंद हो गयीं. आप शून्य से आये थे और शून्य में ही चले गये. न तो आपके किसी कार्य की चर्चा हो रही है और न ही कोई आपको स्वीकृति दे रहा है. ऐसी परिस्थिति में आपके जीवन का क्या होगा? आप चाहते हैं कि जीवन में एक स्टेपनी बन कर रहें या आप समाज की मुख्यधारा में रह कर समाज और अपना नेतृत्व करें. आपको बहुत कुछ देना है, लेकिन आपके पास रहेगा तभी तो दे सकेंगे. हम लोग तो हमेशा इसी चिंता में पड़े रहते हैं कि हम सुखी कैसे रहें? हमारे पास धन कैसे हो? जो जितना सक्षम होगा, उसका अस्तित्व उतने ही लंबे समय के लिए कायम रहेगा. मृत्यु के पश्चात दुनिया उन्हें ही याद करती है, जिन्होंने समाज को कुछ दिया. जिन्होंने लोकहित के लिए कुछ त्याग किया.

  • प्रेम और घृणा का द्वंद्व

    मन जहां तक है, वहां तक द्वंद्व भी रहेगा. मन बिना द्वंद्व के ठहर भी नहीं सकता; पलभर भी नहीं ठहर सकता. मन के होने का ढंग ही द्वंद्व है. वह उसके होने की बुनियादी शर्त है. अगर तुम्हारे मन में प्रेम होगा, तो साथ ही साथ कदम मिलाती घृणा भी होगी. जिस दिन घृणा विदा हो जायेगी, उसी दिन प्रेम भी विदा हो जायेगा. इसलिए तो बुद्ध पुरुषों का प्रेम बड़ा शीतल मालूम पड़ता है. वह उष्णता प्रेम की, जो हम सोचते हैं, दिखाई नहीं देती. वैसा प्रेम गया.

  • अध्यात्म और साधना

    साधना का लक्ष्य जीवन को उन सीमाओं से मुक्त करना है, जिनसे अभी वह घिरा हुआ है. इस संसार में हमारा आगमन साधना करने के उद्देश्य से ही हुआ है. साधना आजीवन चलनेवाली प्रक्रिया है. हमारे जीवन का प्रत्येक दिन, प्रत्येक क्षण आगे बढ़ने का अभियान है.

  • भगवान का स्मरण

    इंसान की मृत्यु के समय ही मस्तिष्क शरीर से अलग होता है. इसलिए, उस समय जो भी छवि इंसान मन में रखता है, वह अगले जन्म का कारण बनता है. यह वैज्ञानिक सत्य है. आप यह स्वयं देख सकते हैं. यदि आप ध्यान दें, सुबह उठने पर जो आपके मन का पहला विचार होता है, वह वही विचार होता है जो रात में सोने से पहले आपके मन में था.

  • दुख के तीन कारण

    अज्ञान, अशक्ति और अभाव, ये दुख के तीन कारण हैं. इन तीनों कारणों को जो जिस सीमा तक अपने आपसे दूर करने में समर्थ होगा, वह उतना ही सुखी बन सकेगा. अज्ञान के कारण मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित हो जाता है, वह तत्वज्ञान से अपरिचित होने के कारण उल्टा-पुल्टा सोचता है, और उल्टे काम करता है, तद्नुसार उलझनों में अधिक फंसता जाता है, और दुखी बनता है. स्वार्थ, लोभ, अहंकार, अनुदारता और क्रोध की भावनाएं मनुष्य को कर्तव्यच्युत करती हैं, और वह दूरदर्शिता को छोड़ कर क्षणिक क्षुद्र एवं हीन बातें सोचता है तथा वैसे ही काम करता है.

  • ईश्वर की थाह

    ईश्वर की गूढ़ता की थाह ले पाना हमारे लिए असंभव है. ईश्वर के सत्य का अनुभव कभी-कभी तब होता है, जब हम पूर्णतः मौन में होते हैं, जब हमारा मन प्रक्षेपण में रत नहीं होता, जब हम अंदर ही अंदर खुद से ही युद्ध और संघर्ष की स्थिति में नहीं होते. जब मन निश्चल होता है शायद तब हम जान पाते हैं कि ईश्वर क्या है?

  • खुशहाल अस्तित्व जरूरी

    बच्चे कुदरती तौर पर खुशमिजाज होते हैं और वे आबादी का ऐसा हिस्सा हैं, जिनके साथ काम करना सबसे आसान होता है. तो फिर सवाल है कि पढ़ाने के लिए माहौल को खुशनुमा बनाना एक मुश्किल काम क्यों हो जाता है? आज हमारे पास ऐसे कई वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रमाण मौजदू हैं, जिनसे साबित होता है कि अगर आप एक खुशनुमा माहौल में होते हैं, तो आपका शरीर व दिमाग सर्वश्रेष्ठ तरीके से काम करता है.

  • ब्रह्मांड और प्रकृति

    इस पूरे ब्रह्मांड को हमारे संत महात्मा रहस्यमय ब्रह्मांड कहते हैं; क्योंकि जिस प्रकार यह विश्व ब्रह्मांड चल रहा है, वह स्वयं में एक रहस्य है, एक महाआश्चर्य है. अनादि काल से यह जगत गतिमान है. इसे न कोई चलानेवाला दिखता है और न कोई ऐसी व्यवस्था दिखती है, जिस व्यवस्था से अंतरिक्ष के सारे ग्रह, नक्षत्र, तारे एक ही गति से चलते चल रहे हैं.

  • धन को चलाते रहो

    धन का शास्त्र समझना चाहिए. धन जितना चले, उतना बढ़ता है. समझो कि यहां हम सब लोग हैं, सबके पास सौ-सौ रुपये हैं. सब अपने सौ-सौ रुपये रख कर बैठे रहें! तो बस प्रत्येक के पास सौ-सौ रुपये रहे. लेकिन सब चलायें, चीजें खरीदें-बेचें, रुपये चलते रहें, तो कभी तुम्हारे पास हजार होंगे, कभी दस हजार होंगे.

  • भीतर का परमानंद

    हम जिस किसी भी परिस्थिति में हो, हमें उसके अनुरूप सफलतापूर्वक उस भूमिका को निभाना चाहिए, फिर जीवन का रंगमय होना तय है. इस संकल्पना को प्राचीन भारत में वर्णश्रम कहते थे. इसका अर्थ था हर कोई यदि वह चिकित्सक, अध्यापक, पिता जो कोई भी या जो कुछ भी हो, उसे अपनी भूमिका को पूर्ण उत्साह से निभाना चाहिए. किसी भी दो व्यवसाय के मिलाप से हमेशा उचित परिणाम नहीं मिलते हैं. यदि किसी चिकित्सक को व्यापार करना है, तो वह उसे अलग से करना होगा और अपने व्यवसाय से अलग रखना होगा और अपने चिकित्सिक व्यवसाय को व्यापार नहीं बनाना होगा. मन के इन भावों को अलग और भिन्न रखना ही सफल और आनंदमय जीवन का रहस्य है. जब आपका मन साफ होता है और चेतना शुद्ध, शांतिपूर्ण, प्रसन्न और ध्यानस्थ होती है, तो फिर विभिन्न रंग और भूमिकाएं प्रकट होने लगती हैं.

  • आत्मज्ञान का प्रकाश

    जिस व्यक्ति की अभिव्यक्ति उच्च शक्तियों के रूप में होकर संसार को प्रभावित करने लगती है, लोग उस व्यक्ति को अवतार, ऋषि, योगी आदि के रूप में पूजने और मनन करने लगते हैं.

  • हमारे जीवन में खुशी

    किसी चौराहे पर चंद मिनट खड़े होकर वहां से गुजरनेवाले लोगों पर गौर कीजिये. कितने लोगों के चेहरे पर खुशी नाच रही है. सौ जने निकल गये, तो उनमें से केवल चार-पांच चेहरों पर आपने हंसी देखी होगी. क्या कारण है, बाकी लोग उदासी में मुंह लटकाये खोये-खोये नजर आये? बाहर क्या देखना है? पांच साल की उम्र में आप बगीचे में तितली के पीछे भाग रहे थे.

  • ईश्वर का वरदान

    जीवन जीने के पश्चात जब जीव मृत्यु में प्रवेश करता है, तो उस अवस्था में उसे फिर जन्म लेने के लिए हजारों, लाखों वर्षो तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है. लेकिन, जो सिद्ध पुरुष परमात्म तत्व में लीन हो जाता है, उसे पुन: गर्भ चुनने का अधिकर रहता है, वह स्वेच्छा से गर्भ चुन सकता है, लेकिन अन्य जीव वैसा नहीं कर सकते.

  • प्रेम के राग रतन

    हमारे देश के लोग बड़े शायरनुमा हैं. देश की मिट्टी शायरी है. इस मिट्टी में कथाएं हैं, कविताएं हैं. उसी कथा-कविता के लोर में आकर ऐसी बातें कही जाती हैं कि जन्म होते ही दाई को उपदेश दिया. अगर सच में ऐसा हुआ होता, तो नानक के पिता कालू को उपदेश क्यों न मिला? वह तो थप्पड़ ही मारते रहे अपने बेटे को. दाई तो समझ गयी, पर बाप नहीं समझा? बाप तो उलाहने ही देता रहा. लड़ता ही रहा. उसके लिए तो निकम्मा बेटा पैदा हुआ, जो कुछ काम नहीं करता. जो दुकान नहीं करता, जो पैसा नहीं कमाता. उसे कहो कि पैसा कमाओ, तो नानक कहता कि मैं नाम कमा रहा हूं. उसे कहो कि दुकान पर ध्यान से काम कर, तो वह कहता कि भीतर सुरत जगा रहा हूं. उसे कहें कि खेत की रखवाली कर, तो वहां भी ध्यानस्थ हो जाता और खेत सारा भैंसें उजाड़ जाती हैं.

  • दान की भावना

    हमारे देश में हर नेता को अपनी जाति और धर्म से आगे जाकर देखना चाहिए. उसकी दृष्टि में संपूर्ण मानवता के लिए स्थान होना चाहिए. एक हिंदू पुजारी को केवल हिंदुओं के लिए ही नहीं, समस्त मानवता के लिए प्रार्थना करनी चाहिए. इसी तरह, एक मुसलिम ईमाम और ईसाई पादरी को भी समस्त मानवता के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, तभी हम धर्म के उद्देश्य को पूरा कर पायेंगे. सभी धर्मों का समान सम्मान और व्यवसायों में सामाजिक कार्य जुड़ा होना चाहिए.

  • अभ्यास का महत्व

    प्रतिभा-योग्यता के विकास में बुद्धि आवश्यक तो है, सर्वसमर्थ नहीं. बुद्धिमान होते हुए भी विद्यार्थी यदि पाठ याद न करे, पहलवान व्यायाम को छोड़ दे, संगीतज्ञ, क्रिकेटर अभ्यास करना छोड़ दें, चित्रकार तूलिका का प्रयोग न करे, कवि भाव-संवेदनाओं को संजोना छोड़ बैठे, तो उसे प्राप्त क्षमता भी क्रमश: क्षीण होती जायेगी और अंतत: लुप्त हो जायेगी, जबकि बुद्धि की दृष्टि से कम पर सतत अभ्यास में मनोयोगपूर्वक लगे, व्यक्ति अपने अंदर असामान्य क्षमताएं विकसित कर लेते हैं.

  • एहसास का अवलोकन

    एक एहसास या भाव स्वतः ही विलीन हो जाता है. लेकिन, जब किसी एहसास के खत्म होने के बाद भी, यदि वहां कोई एहसास को देखनेवाला होता है, एक दर्शक होता है, महसूस करनेवाला या एक एक विचारक होता है, जो उस मूल बीते एहसास से अलग उसकी स्मृति बना रहता है, तो वहां पर भी द्वंद्व होता है.

  • सत्य और विश्वास

    यह दुनिया झूठ और कपट से चल रही है. सबसे ज्यादा भद्दापन सबसे ऊंचे स्तर पर हो रहा है. अगर आप दुनियाभर में होनेवाले चुनाव प्रचारों को देखें, तो आपको लगेगा कि सारी सीमाएं टूट चुकी हैं, मानो लोकतंत्र का मतलब ही हो गया है कमर के नीचे वार करना. अब ऐसा लगता है कि कोरा झूठ बोलना कोई शर्मिंदगी की बात ही नहीं है. आज झूठ मुख्यधारा में आ चुका है, जबकि सच्चाई किनारे जा चुकी है. आज जब पूरी दुनिया में यह हालत है, ऐसे में सत्य के लिए जीने और मरनेवाले लोगों का बड़ा समूह खड़ा करना एक बहुत महत्वपूर्ण काम है. यह हमें करना ही होगा, क्योंकि इसके बिना बहुत कुछ अधूरा रह जायेगा.

  • अभिशाप नहीं है बुढ़ापा

    शरीर जब पैदा होता है, तो वह कभी बचपन, कभी जवानी और उसी तरह बुढ़ापा में प्रवेश करता है. अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम इसे कैसे अनुभव करें. प्रकृति तो अपना काम करती ही है. हमारे चाहने से कुछ नहीं होता. इसलिए जिस प्रकार हमने बचपन को उल्लासपूर्ण बनाया, जवानी को प्रेमपूर्ण बनाया, उसी प्रकार बुढ़ापे को भी सहज रूप से स्वीकार करते हुए आनंदपूर्ण बनाने का प्रयास करना है. दुख तो तभी होगा, जब हम प्रतिरोध करेंगे.

  • दीया से दीया जले

    परमात्मा की सत्ता नित्य है, ब्रह्म नित्य है, निराकार है. नित्य किसको कहते हैं? जो सदा रहे, ऐसे को ही परमात्मा कहा. अब परमात्मा का आकार कैसा है? औरत है? आदमी है? जानवर है? बच्चा है? वृक्ष है? पहाड़ है? क्या आकार है, उसका? वह निराकार है. उस नित्य, परमब्रह्म सर्वरूप में विराजमान ब्रह्म का अनुभव कैसे होता है? वह गुरु से होता है.

  • आत्मनिर्भर नहीं हैं आप

    जीवन में संपूर्ण आत्मनिर्भरता जैसा कुछ नहीं होता. यदि आप सोचते हो कि मैं पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर हो जाऊं, तो ऐसा नहीं होगा. आप आश्रित ही पैदा हुए थे. आप अपने आप उठ भी नहीं सकते थे, और कोई और आपको उठाता था. कोई आपको नहलाता था. कोई खिलाता था. कोई सुलाता था. आप एक आश्रित ही पैदा हुए थे और अंत में भी आश्रित ही रहोगे. जब आपकी मृत्यु हो जाती है, तो आप अपने शरीर को अपने आप नहीं जला या दफना सकते. जब आप बीमार होते हो, तो किसी को आपका ध्यान रखना होता है.

  • हमारा नदी धर्म

    हमारे घर-दफ्तरों की दीवारों पर टंगे कैलेंडर के पन्ने एक वर्ष में बारह बार पलट जाते हैं. लेकिन, प्रकृति का कैलेंडर कुछ हजार नहीं, लाख-करोड़ वर्ष में एकाध पन्ना पलटता है. आज हम गंगा नदी पर बात करते हैं, तो हमें प्रकृति का, भूगोल का यह कैलेंडर भूलना नहीं चाहिए. गंगा मैली हुई है. उसे साफ करना है. सफाई की अनेक योजनाएं पहले भी बनी हैं.

  • पुरुषार्थ का जगना

    किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में पहुंचा हुआ हतप्रभ व्यक्ति क्रमश: अधिक निराश ही होता है, विशेषतया तब, जब प्रगति के नाम पर विभिन्न क्षेत्रों में किये गये प्रयास खोखले लगते हों और महत्वपूर्ण सुधार हो सकने की संभावना पर से विश्वास क्रमश: उठता जाता हो.

  • मन का प्रक्षेपण

    एक आदमी जो ईश्वर में विश्वास करता है, वह ईश्वर को नहीं खोज सकता. ईश्वर एक अज्ञात अस्तित्व है और इतना अज्ञात कि हम ये भी नहीं कह सकते कि उसका अस्तित्व है. यदि आप वाकई किसी चीज को जानते हैं, वास्तविकता के प्रति खुलापन रखते हैं, तो उस पर विश्वास नहीं करते, जानना ही काफी है. यदि आप अज्ञात के प्रति खुले हैं, तो उसमें विश्वास जैसा कुछ होना अनावश्यक है.

  • मन की क्षमता-अक्षमता

    आपने ‘आध्यात्मिकता’ नामक शब्द को सुना है. आध्यात्मिकता नामक शब्द भी आपके अपने मन के कारण ही है. अपने मन के कारण ही आप समझ पा रहे हैं कि मैं आपसे क्या बात कर रहा हूं. अत: जो आपका मित्र है, आप उसे अपना शत्रु मत बनाइये. कृपया आप अपने जीवन को गौर से देखिए और फिर मुझे बताइए कि आपका मन आपका शत्रु है या मित्र?

  • संतुलन का सध जाना

    जादूगर अनेक चमत्कार दिखाते हैं, लेकिन जादूगर के लिए कोई चमत्कार नहीं है. चमत्कार उसके लिए है, जो जादू नहीं जानता. जब साधारण व्यक्ति भी जादू के नियम जान लेता है, तब उसके लिए भी चमत्कार जैसी कोई बात नहीं रह जाती. कुछ रसायनों का प्रयोग कर सफेद पन्नों पर कुछ लिखा. अक्षर नहीं दिखेंगे. पन्ने को पानी में डूबोते ही अक्षर दिख जायेंगे. देखनेवाले को आश्चर्य-सा लगेगा, किंतु जो व्यक्ति इस विधि को जानता है, उसके लिए कोई आश्चर्य नहीं है, चमत्कार नहीं है. जिस दिन पहली बार आग जली होगी, न जाने कितना बड़ा चमत्कार लगा होगा. अरे! यह प्रकाश! यह ताप! लेकिन आज वही आग चमत्कार की वस्तु नहीं है, क्योंकि सभी उसके नियम को जानते हैं. इसी तरह ध्यान कोई चमत्कार नहीं है. अध्यात्म कोई चमत्कार नहीं है. केवल प्रकृति के नियमों की समझ है. जो नियमों को समझ लेता है, वह बहुत सारी नयी बातें करने में सक्षम होता है.

  • ज्ञान-विज्ञान-धर्म

    विज्ञान एकत्व की खोज के सिवा और कुछ नहीं है. ज्यों ही कोई विज्ञान पूर्ण एकता तक पहुंच जायेगा, त्यों ही उसकी प्रगति रुक जायेगी, क्योंकि तब वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा. इसका उदाहरण यह है- रसायन-शास्त्र यदि एक बार उस एक मूल तत्व का पता लगा ले, जिससे और सब द्रव्य बन सकते हैं, तो फिर वह अपने और आगे नहीं बढ़ सकेगा.

  • मनुष्य में विवेकशीलता

    मनुष्य के व्यक्तित्व निर्माण में उसकी सोच का बहुत बड़ा स्थान है. मनुष्य जैसा सोचता है, ठीक वैसा ही बन जाता है. सोच का अर्थ है- विचार. विचार उत्पन्न होता है मस्तिष्क में. वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारे मस्तिष्क में अनंत ग्रंथियां हैं. इनमें कुछ सुशुप्त ग्रंथियां हैं और कुछ सक्रिय ग्रंथियां हैं. जब कभी हम इन ग्रंथियां पर दबाव डालते हैं या उनमें स्पंदन पैदा करते हैं, तो वे सक्रिय हो जाती हैं और अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगती हैं. मनुष्य अपने मस्तिष्क की ग्रंथियों को सक्रिय कर उसके फल को प्राप्त करता है. लेकिन पशु ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पास अपने विवेक को जागृत करने की शक्ति नहीं होती. मनुष्य इस अर्थ में भाग्यशाली है कि वह चिंतन कर सकता है, विचार कर सकता है, अच्छे-बुरे का निर्णय कर सकता है. यह गुण केवल मनुष्य को प्राप्त है.

  • मां के अनेक रूप

    एक माता के भीतर अनंत क्षमा और दया की शक्ति होती है. उसके बालक गलत हो सकते हैं, पर माता कभी गलत नहीं हो सकती. एक मां के लिए उसके सारे बच्चे प्रिय होते हैं. एक माता और उसकी संतान में जो संबंध होता है, वह बहुत गहरा होता है. एक पिता की तुलना में मां अपने बच्चे के अधिक करीब होती है. भारत के मनीषियों ने परमात्मा को माता कहा है.

  • बुद्ध का मौन और बोध

    पौराणिक कथाएं कहती हैं कि एक बार बुद्ध के मौन पर सभी देवता चिंता में पड़ गये. उन्होंने उनसे बोलने की याचना की. मौन समाप्त होने पर वे बोले, जो जानते हैं, वे मेरे कहने के बिना भी जानते हैं और जो नहीं जानते, वे मेरे कहने पर भी नहीं जानेंगे. जिन्होंने जीवन का अमृत ही नहीं चखा, उनसे बात करना व्यर्थ है, इसलिए मैंने मौन धारण किया था.

  • प्रेम से 'मैं' का विनाश

    मूल रूप से प्रेम का मतलब है कि कोई और आपसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुका है. यह दुखदायी भी हो सकता है, क्योंकि इससे आपके अस्तित्व को खतरा है. जैसे ही आप किसी से कहते हैं-‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं,’ आप अपनी पूरी आजादी खो देते हैं. आपके पास जो भी है, आप उसे खो देते हैं. जीवन में आप जो भी करना चाहते हैं, वह नहीं कर सकते. बहुत सारी अड़चनें हैं, लेकिन साथ ही यह आपको अपने अंदर खींचता चला जाता है. यह एक मीठा जहर है, बेहद मीठा जहर. यह खुद को मिटा देनेवाली स्थिति है.

  • छोड़ो कल की चिंता

    दुनिया का प्रत्येक जीव अपने जीवन से प्यार करता है. मरना कोई नहीं चाहता, अपना प्राण सबको प्रिय होने के कारण मृत्यु का भय देखते ही वह भाग खड़ा होता है. लेकिन मृत्यु तो अटल सत्य है, उससे अब कौन भाग सकता है. एक राजा था. उसको ज्योतिषी ने बताया कि अमुख तिथि को तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी. वह मृत्यु से घबरा कर भागने के लिए तैयार हो गया.

  • कैसे केंद्रित हो ध्यान

    ध्यान केंद्रित करने का सूक्ष्म उपाय आसान है. इसके लिए अपने शरीर के किसी भी एक अंग पर अपनी दृष्टि केंद्रित करो. जैसे हाथ को ही मान लीजिए, तो अपनी पूरी दृष्टि अपने हाथों पर रखिये, सिर्फ हाथों पर. आप खाना खा रहे हैं, सो रहे हैं, किसी से मिल रहे हैं या कुछ भी कर रहे हैं; हर समय बस आपके हाथ ही ध्यान में रह जायें, जैसे और कुछ है ही नहीं. जब हाथ शांत पड़ें हों तब भी, जब चल रहें हों तब भी. यही दृष्टि शरीर के दूसरे अंगों, जैसे कभी सिर्फ आंख, कभी कान, कभी शब्द या कभी जिह्वा पर भी रख सकते हैं.

  • आकांक्षा, सुख, दुख

    अक्सर हम जीवन में दूसरों पर दोष लगाते हैं. हमें जीवन में दुख किसी व्यक्ति या किसी चीज से नहीं मिलता. यह तुम्हारा अपना मन है, जो तुम्हें दुखी करता है और तुम्हारा अपना मन है, जो तुम्हें खुश और उत्साहित बनाता है. तुम्हारे पास जो भी है, अगर तुम उससे पूरी तरह से संतुष्ट हो, तो जीवन में कोई आकांक्षा नहीं रह जाती.

  • वाणी के प्रमुख कार्य

    वाणी की शक्ति का जीवन के उत्कर्ष-अपकर्ष में कितना अधिक योगदान है, इसकी जानकारी किसी गूंगे और ओजस्वी वक्ता की स्थिति की तुलना करके देखने से मिल सकती है. संभावना का आदान-प्रदान कितना प्रभावी है, इसका इसलिए पता नहीं चलता कि वह ढर्रा सहज अभ्यास से चलता रहता है और हम उससे कुछ विशेष निष्कर्ष नहीं निकाल पाते.

  • धार्मिक मन की स्थिति

    एक धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं होता, जो भगवान को ढूंढ रहा है. धार्मिक आदमी समाज के रूपांतरण से संबद्ध है, जो कि वह स्वयं है. धार्मिक आदमी वह व्यक्ति नहीं, जो असंख्य रीति रिवाजों-परंपराओं को मानता/करता है. अतीत की संस्कृति, मुर्दा चीजों में जिंदा रहता है. धार्मिक आदमी वह व्यक्ति नहीं है, जो निर्बाध रूप से बिना किसी अंत के गीता या बाइबिल की व्याख्या में लगा हुआ है, या निर्बाध रूप से जप कर रहा है, संन्यास धारण कर रखा है. ये सारे लोग तथ्य से पलायन कर रहे हैं. धार्मिक आदमी का संबंध कुल जमा, संपूर्ण रूप से समाज को, जो कि वह स्वयं ही है, समझनेवाले व्यक्ति से है. वह समाज से अलग नहीं है.

  • मन की सकारात्मकता

    संसार में दूसरों के साथ आपका रिश्ता कैसा है, यह आपके जीवन की गुणवत्ता को निर्णय करनेवाले घटकों में प्रमुख स्थान रखता है. यहां आपको नाना प्रकार के लोगों से पाला पड़ता है. एक छोटे से चौकोर कमरे में केवल एक सहयोगी के साथ बैठ कर काम करना पड़े, तो समस्याओं से निपटना आसान होता है.

  • पंचाग्नि की पांच अग्नियां

    हमारे शास्त्रों में दो मार्ग बताये गये हैं, एक है उत्तर मार्ग और दूसरा है दक्षिण मार्ग. इन्हें उत्तरायण और दक्षिणायन भी कहते हैं. पंचाग्नि की पांच अग्नियां दक्षिणायन से संबंध रखती हैं, लेकिन इनका प्रयोजन है आपको उत्तरायण की ओर ले जाना. पंचाग्नि साधना की यही विचित्रता है. पंचाग्नि की एक अग्नि सूर्य है, जिसे स्वर्ग में माना जाता है.

  • कर्म की प्रधानता

    अपने कर्म से भागनेवाले मनुष्य कायर होते हैं. अर्जुन जब युद्ध से भागने लगा, तो श्रीकृष्ण ने उसे कायर तक कह डाला. कर्म महत्वपूर्ण है. गणिका वेश्या थी, सधना कसाई था, रविदास जूता बनाते थे, लेकिन वे सब संत हो गए. उन्हें स्वर्ग मिला. मगर मंदिर में बैठे पुजारी के विषय में कहना कठिन है कि उसे स्वर्ग मिलेगा या नरक. हाथ का काम कर्म करना है.

  • अनापानसति योग

    मन तो रोज बदलता रहता है, पर असल जड़ है चित्त में. अपने चित्त का शोध करें. अपने चित्त के शोध का उपाय है सजग होकर ध्यान करना. चित्त के शोध करने का उपाय बुद्ध ने दिया- अनापानसति योग. सांस अंदर गयी, सांस बाहर गयी. सांस जब अंदर गयी तो हुआ- अना. सांस जब बाहर गयी तो हुआ- पान. यानी अनापानसति योग- भीतर और बाहर जाती हुई सांस को देखने का योग. यह सबसे सरल विधि है. बहुत से लोग कहते हैं कि तेज सांस चलती ही नहीं, थक जाते हैं. लेकिन आज तक किसी ने नहीं कहा कि साधारण सांस लेते हुए थक जाते हैं. साधारण सांस में तो कुछ करना ही नहीं.

  • निर्णय लेने की कठिनाई

    आपका कोई अस्तित्व नहीं था, फिर अचानक किसी और की वजह से आप अस्तित्व में आये और अब आप यहां मौजूद हैं. अस्तित्वहीनता की स्थिति में वापस जाना एक सरल निर्णय है. जीवन में कोई भी निर्णय कठिन नहीं होते. दरअसल, आप बहुत सारी चीजों से जुड़ाव रखे हुए हैं, इसलिए आपके लिए फैसला लेना कठिन हो जाता है. अन्यथा तलाक हो या मौत, या फिर कोई दूसरा निर्णय; वह आपके लिए कठिन नहीं होना चाहिए. चाहे यह कितना भी मायने रखता हो, लेकिन यह बस जीवन का एक अगला चरण ही तो है, जो किसी न किसी रूप में अवश्य सामने आयेगा.

  • न हो नैराश्य भाव

    हतप्रभ व्यक्ति क्रमश: अधिक निराश ही होता है, विशेषतया तब-जब प्रगति के नाम पर विभिन्न क्षेत्रों में किये गये प्रयास खोखले लगते हों, महत्वपूर्ण सुधार हो सकने की संभावना पर से विश्वास क्रमश: उठता जाता हो.

  • हमारे मन का विकार

    हमारे जीवन का कोई भी पल अगर मनोविकारों से आहत होता है, तो हम मानसिक रूप से अस्त-व्यस्त हो जाते हैं. हमारी थोड़ी-सी भूल हमारे जीवन को कांटों से भर देती है. मनोविकार जिनमें काम, क्रोध, लोभ, मद प्रमुख हैं, वे हमारे संतुलित जीवन में असंतुलन पैदा कर देते हैं. इसका कारण यह है कि जो व्यक्ति रात में पूरी नींद नहीं सोता, वह सुबह अनमना बन उठता है.

  • जब गुस्सा आये तो

    कभी उदास होकर यह मत सोचो कि ‘मेरा कोई नहीं है’. ढेर सारे पेड़ हैं, खुली छत है, आसमान है. किसी पेड़ से ही लिपट जाओ. इनमें बहुत ऊर्जा होती है. रोज इसके पत्ते मर जाते हैं, रोज नये पत्ते पैदा हो जाते हैं. पेड़ों को गले लगाओ, पेड़ को अपना मित्र मान लो. अब आप कहोगे कि हम पेड़ से गले लग रहे हैं, अगर कोई देखेगा, तो हमें पागल ही कहेगा. अगर कह ही लेगा, तो उससे क्या होगा?

  • यथार्थ सिद्धांत

    किसी विचार को दक्षतपूर्वक कार्य रूप में परिणत करना एक बात है और उसके आधारभूत मौलिक अर्थ को हृदयंगम करना एक बिल्कुल दूसरी बात है. किसी कार्य को विवशता में करना और उसको हृदय से स्वीकार करना दोनों अलग-अलग बातें हैं. वर्तमान समय में चाहे कोई राष्ट्र कपितय सिद्धांतों को कार्यान्वित करता हुआ भले ही खुद फल-फूल रहा हो, किंतु यदि कोई राष्ट्रीय मस्तिष्क भली भांति उन सिद्धांतों को समझता नहीं है, यदि उसके पीछे कोई सुनिश्चित ठोस आधार नहीं, तो उस राष्ट्र के पतन की बराबर संभावना बनी रहती है. हर कार्य को करने के लिए उसके पीछे ठोस आधार का होना आवश्यक होता है.

  • ध्यान की सहजता

    निस्तब्ध और सुनसान मार्ग पर ध्यान इस तरह उतरता है, जैसे पहाड़ियों पर सौम्य वर्षा. ध्यान इसी तरह सहज और प्राकृतिक रूप से आता है जैसे रात. वहां किसी तरह का प्रयास या केंद्रीकरण पर किसी भी तरह का नियंत्रण नहीं होता. वहां पर कोई भी आज्ञा या नकल नहीं होती. ना किसी तरह का नकार होता है ना स्वीकार. ना ही ध्यान में स्मृति की निरंतरता होती है. मस्तिष्क अपने परिवेश के प्रति जागरूक रहता है, पर बिना प्रतिक्रिया के शांत रहता है.

  • हर चीज सुंदर है

    बचपन से ही मैं हर तरह के जीव पर काफी ध्यान देता था, इसमें बहुत समय बिताता था. मैंने पाया कि रंग, ज्यामिति और कार्यकलाप की विविधता में एक नन्हे से कीड़े की बनावट भी बहुत शानदार होती है. आप किसी भी जीव को देखें, तो आप पायेंगे कि प्रकृति और क्रमिक विकास ने कितनी सुंदरता से उसका रूप संवारा है. न सिर्फ सूर्योदय या सूर्यास्त जैसी कोई बड़ी चीज, बल्कि छोटे-से-छोटे जीवों की बनावट भी बहुत सुंदर होती है.

  • एक विकार है लोभ

    मनुष्य के जीवन के पराभव का तीसरा पतन द्वार है लोभ. मानव के सभी विकारों में लोभ ऐसा मानसिक विकार है, जो उसके उत्कर्ष में बाधा डालता है. लोभी व्यक्ति आचरण से हीन हो जाता है और वह अपने स्वाभिमान को भुला कर किसी कामना के वशीभूत होकर चाटुकार बन जाता है.

  • समाज बनाने का अवसर

    मेरे विचार से हमारे राष्ट्रीय पतन का वास्तविक कारण यह है कि हम दूसरे राष्ट्रों से नहीं मिलते-जुलते और न ही उनके साथ सामंजस्य स्थापित करते हैं. हमें कभी दूसरों के अनुभवों के साथ अपने अनुभवों के मिलान करने का अवसर नहीं प्राप्त हुआ. इसलिए हम कूपमंडूक बने रहे.

  • आध्यात्मिक प्रगति

    आध्यात्मिक प्रगति नि:शब्द एवं अदृश्य होती है. इसकी तुलना उस कली से की जा सकती है, जो रात्रि की नीरवता में धीरे-धीरे पुष्प रूप में खिलती है. अत: यह सोच कर उदास न हों कि आपकी प्रगति नहीं हो रही है.

  • भीतर की ओर देखना

    जो व्यक्ति अध्यात्म की चेतना में प्रवेश करता है, अध्यात्म की चेतना के जागरण का प्रयास करता है, वह अपने पर बहुत उत्तरदायित्व लेता है. इतना बड़ा दायित्व कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति उतना बड़ा दायित्व नहीं उठाता. एक पूरे साम्राज्य को चलानेवाले सम्राट पर भी उतना दायित्व नहीं होता, जितना बड़ा दायित्व होता है उस साधक पर, जो चेतना के जागरण में लगा हुआ है.

  • हंसना एक औषधि है

    परमात्मा ने मनुष्य को हंसने की शक्ति दी है. इसके पीछे कारण है. चूंकि मनुष्य अपनी विकृतियों के जाल में बुरी तरह फंसा रहनेवाला प्राणी है, इसलिए उसे हंसी की जरूरत है. मनुष्य के स्वस्थ होने की पहली पहचान है- हंसी. हंसनेवाला व्यक्ति जीवन में स्वस्थ व प्रसन्न रहते हुए अपने जीवन को सुखी बना लेता है.

  • डर से मुक्त होना जरूरी

    हमें डर लगता है, केवल बाहरी कारणों से ही नहीं, अपने अंदर से भी. नौकरी-धंधा छूट जाने का डर, भोजन-पानी से महरूम रहने का डर, अपने पद को गंवा देने का डर, अपने से ऊंचे पद पर बैठे अफसरों के वजह-बेवजह फटकारे-लताड़े जाने का डर. यानी तरह-तरह के बाहरी डर बने ही रहते हैं.

  • हमारे मन का पात्र

    मन जब अपने स्थूलरूप में होता है, तो चीजों का संग्रह करना चाहता है, जब यह थोड़ा-सा विकसित होता है तो ज्ञान का संग्रह करना चाहता है. मन की प्रकृति हमेशा ही संग्रह करने की होती है. वे सारी बातें, जिन्हें आप सोचते और महसूस करते हैं और स्वयं के बीच जब एक दूरी बनाने लगते हैं, तो इसे ही हम चेतना कहते हैं. जब इसमें भावना प्रबल होती है, तो यह लोगों का संग्रह करना चाहता है, इसकी मूल प्रकृति बस यही है कि यह संग्रह करना चाहता है. जब कोई व्यक्ति यह सोचने और विश्वास करने लगता है कि वह आध्यात्मिक मार्ग पर है, तो उसका मन तथाकथित आध्यात्मिक ज्ञान का संग्रह करने लगता है.

  • मनुष्य की पात्रता

    छात्रों में से जो उत्तीर्ण होते हैं, वह अगली कक्षा में चले जाते हैं. जो अधिक अच्छे नंबर लाते हैं, वे छात्रवृत्ति पाते हैं. इसके विपरीत जो फेल होते रहते हैं, वे साथियों में उपहासास्पद बनते, घरवालों के ताने सहते, अध्यापकों की आंखों में गिरते और अपना भविष्य अंधकारमय बनाते हैं.

  • आध्यात्मिक मार्ग

    प्रारंभ में ऐसा लग सकता है कि आध्यात्मिक मार्ग कठिन, खतरनाक एवं फिसलनभरा है. शुरू में वस्तुओं का त्याग दुखदायी होता है. किंतु यदि आप दृढ़ संकल्प ले लेते हैं और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने हेतु निरंतर प्रयास करते हैं, तो यह कार्य बहुत आसान हो जाता है. अपने प्रयास में आप रुचि लेने लगते हैं तथा एक नये आनंद का अनुभव करते हैं. आपके हृदय का विस्तार होता है तथा जीवन के प्रति आप एक नया, व्यापक दृष्टिकोण प्राप्त करते हैं. आप अपने हृदय-स्थित अंतर्यामी के अदृश्य हाथों के सहारे का भी अनुभव करते हैं. आपके सभी प्रश्नों का उत्तर अपने अंदर से ही मिलने लगता है तथा समस्त प्रकार के संदेह स्वत: दूर होते जाते हैं. आप दिव्य आनंद की अनुभूति से भावविह्वल हो जाते हैं. आप गहरी शांति का अनुभव करते हैं. आपको नया सामर्थ्य प्राप्त होता है.

  • दुनिया में आपका होना

    आप इसलिए हैं, क्योंकि आपके माता-पिता ने आपको जन्म दिया है, और आप भारत के ही नहीं, विश्व की संपूर्ण मानवता के शताब्दियों के विकास का परिणाम हैं. आप किसी असाधारण अनूठेपन से नहीं जन्मे हैं, बल्कि आपके साथ परंपरा की पूरी पृष्ठभूमि है.

  • योगिक प्रक्रिया

    हमारा शरीर सौर कुम्हार के चाक से बन कर निकला एक घड़ा है. सौर प्रणाली के घूमने से यह तय होता है कि शरीर कैसा होगा. सौर प्रणाली में जो भी होता है, वह शरीर में भी होता है. आदियोगी ने कहा था कि हमारा शरीर एक ऐसे बिंदु तक विकसित हो चुका है, जहां आगे विकास संभव नहीं है, जब तक कि सौर प्रणाली में कोई बुनियादी बदलाव नहीं होता.

  • विजयादशमी

    दशहरा शौर्य का, शक्ति का, स्वास्थ्य का पर्व है. इस दिन हम अपनी भौतिक शक्ति, मुख्यतया शस्त्र और स्वास्थ्य बल का लेखा-जोखा करते हैं. अपनी शक्तियों को विकसित एवं सामर्थ्ययुक्त बनाने के लिए दशहरा पर्व प्रेरणा देता है.

  • अरूप से प्रेम

    जार्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा है, दुनिया में दो ही दुख हैं- एक तुम जो चाहो वह न मिले और दूसरा तुम जो चाहो वह मिल जाये. मेरी नजर में दूसरा दुख पहले से बड़ा है, क्योंकि मजनूं को लैला न मिले, तो भी विचार में तो सोचता ही रहता है कि काश मिल जाती, तो कैसा सुख होता! मिल जाती, तो उड़ता आकाश में, करता सवारी बादलों की, करता बातें चांद-तारों से. नहीं मिल पायी इसलिए दुखी हूं. मजनू को मैं कहूंगा, जरा उनसे पूछो जिनको लैला मिल गयी है.

  • सब कुछ एक ही है

    बहुत से लोग भगवान को देखना चाहते हैं. यदि आप भी चाहते हैं, तो आपको चाहिए कि आप दुनिया को देखना छोड़ दीजिये. यदि आप दुनिया को देखेंगे, तो आप भगवान को नहीं देख पायेंगे. या तो आप भगवान को देख सकते हैं या फिर दुनिया को देख सकते हैं. आप दोनों नहीं देख सकते. आपको एक ही चुनना पड़ेगा. यदि आप भगवान को देखना चाहते हैं, तो मैं आपको फौरन दिखा सकता हूं. क्वाॅन्टम भौतिकी भगवान को देख सकती है. बस यह जानिये कि सब कुछ एक ही है और सब कुछ एक से ही बना है.

  • अनर्थ स्तर का स्वार्थ

    इन दिनों लोकमानस पर उपभोग की व्याकुलता ऐसे उन्माद के रूप में छायी हुई है कि केवल धन ही स्वार्थ सिद्धि का आधार प्रतीत हो गया लगता है. मानवी दिव्य चेतना के लिए इस प्रचलन को अपनाना सर्वथा अवांछनीय है. ऐसा कुछ तो कृमि-कीटक और पशु-पक्षी भी नहीं करते.

  • शतायु होने के लिए

    हमारा जीवन ईश्वर का अद्भुत वरदान है. परमात्मा ने हमें इतना सुंदर शरीर दिया है. इस संसार को देखने के लिए आंख दी. प्रकृति के संगीत सुनने के लिए कान दिये. प्रकृति ने अपनी गोद में भिन्न-भिन्न प्रकार के मनोरम फूल खिलाये. कल-कल करते झरने बनाये. पहाड़ रेगिस्तान, नदियां, वनस्पति, चांद, तारे, नक्षत्र, ग्रहमंडल एक साथ तमाम सौंदर्य से भरे दृश्यों को इस मनुष्य जाति के उपयोग के लिए निर्मित किये. इतना सब कुछ प्रकृति ने इसलिए दिया कि मनुष्य अपने शरीर को स्वस्थ एवं सुरक्षित रखते हुए सद्कर्म की ओर प्रेरित होता रहे.

  • सत्य और अहिंसा

    मैं सोचता हूं कि वर्तमान जीवन से ''संत'' शब्द निकाल दिया जाना चाहिए. यह इतना पवित्र शब्द है कि इसे यूं ही किसी के साथ जोड़ देना उचित नहीं है. मेरे जैसे आदमी के साथ तो और भी नहीं, जो बस एक साधारण-सा सत्यशोधक होने का दावा करता है, जिसे अपनी सीमाओं और अपनी त्रुटियों का एहसास है और जब-जब उससे त्रुटियां हो जाती है, तब-तब बिना हिचक उन्हें स्वीकार कर लेता है. जो निस्संकोच इस बात को मानता है कि वह किसी वैज्ञानिक की भांति, जीवन की कुछ ''शाश्वत सच्चाइयों'' के बारे में प्रयोग कर रहा है, किंतु वैज्ञानिक होने का दावा भी वह नहीं कर सकता. मुझे संत कहना यदि संभव भी हो, तो अभी उसका समय बहुत दूर है.

  • आध्यात्मिक मार्ग

    साधना का लक्ष्य जीवन को उन सीमाओं से मुक्त करना है, जिनसे अभी वह घिरा हुआ है. इस संसार में हमारा आगमन साधना करने के उद्देश्य से ही हुआ है. साधना आजीवन चलनेवाली प्रक्रिया है. हमारे जीवन का प्रत्येक दिन, प्रत्येक क्षण आगे बढ़ने का अभियान है.

  • हमारा नाकुछपना

    जब कोई हमारी खुशामद करता है, हमें अपमानित या दुखी करता है या हमें चोट पहुंचाता है या प्यार जताता है, तो इन सब बातों को हम संग्रह क्यों कर लेते हैं? इन अनुभवों को ढेर और इनकी प्रतिक्रियाओं के अलावा हम क्या हैं? हम कुछ भी नहीं हैं अगर हमारा कोई नाम ना हो, किसी से जुड़ाव ना हो, कोई विश्वास या मत ना हो. यह ना कुछ होने का भय ही हमें बाध्य करता है कि हम इन सब तरह के अनुभवों को इकट्ठा करें, संग्रह करें. और यह भय ही, चाहे वो जाने में हो या अनजाने में, यह भय ही है जो हमारी एकत्र करने, संग्रह करने की गतिविधियों के बाद हमें अंदर ही अंदर तोड़ने, विघटन और हमारे विनाश के कगार पर ले आता है.

  • शुद्ध शारीरिक विकास

    सौर प्रणाली जिस तरह घूमती है, उससे यह तय होता है कि शरीर कैसा होगा और सौर प्रणली में जो भी होता है, वह शरीर में भी होता है. आदियोगी ने कहा था कि शरीर एक ऐसे बिंदु तक विकसित हो चुका है, जहां आगे विकास संभव नहीं है, जब तक कि सौर प्रणाली में कोई बुनियादी बदलाव नहीं होता.

  • भगवान और शैतान

    हमारे पास दो शब्द हैं- भगवान और शैतान. जब किसी चीज को हम पसंद नहीं करते, तो हम कहते हैं- शैतान से जुड़ा है; और किसी चीज को जब हम पसंद करते हैं, तो हम कहते हैं- भगवान से जुड़ा है.

  • पदार्थ और गुण

    भाषण के चार स्तर होते हैं- पर, पश्यंति, मध्यमा और विकारी. जो भाषा हम इस्तेमाल करते हैं, वह विकारी है. यह भाषा का सबसे प्रचलित रूप है. मनुष्य केवल चौथी प्रकार की भाषा बोलते हैं. विकारी से सूक्ष्म है मध्यमा. इसको बोलने से पहले ही आपको विचार के रूप में सतर्कता आ जाती है. जब आप इसे उस स्तर पे पकड़ लेते हो, तो यह मध्यमा है.

  • कर्मफल व्यवस्था नहीं

    इस संसार में इतने साधन मौजूद हैं कि यदि उनका मिल-बांट कर उपयोग किया जाये, तो किसी को किसी प्रकार के संकटों का सामना न करना पड़े. प्राचीनकाल में इसी प्रकार की सुद्धि को अपनाया जाता रहा है. कोई कदम उठाने से पहले यह सोच लिया जाता था कि उसकी आज या कल-परसों क्या परिणति हो सकती है? औचित्य को अपनाये रहने से वह सुयोग बना रह सकता है, जिसे पिछले दिनों सतयुग के नाम से जाना जाता था.

  • न हो पीढ़ियों का टकराव

    हमारे युवाओं को लगता है कि माता-पिता हमारी समस्याओं, संवेदनाओं व सपनों को नहीं समझ पा रहे हैं. यों ही, माता-पिता भी सोचते हैं कि आज का युवा आवारा, गैर-जिम्मेवार और आलसी हो गया है. यही सोच दो पीढ़ियों में टकराव और विवाद पैदा करती है.

  • विचार और संवेदना

    आपने किसी खूबसूरत कार को देखा, उसको छुआ, उसके रूप-आकार को देखा. इससे जो उपजा, वह संवेदन है. उसके बाद विचार का आगमन होता है, जो कहता है, ‘कितना अच्छा हो कि यदि यह मुझे मिल जाये. कितना अच्छा हो कि मैं इसमें बैठूं और इसकी सवारी करता हुआ कहीं दूर निकल जाऊं.’ इस तरह विचार दखल देता है, संवेदना को रूप आकार देता है.

  • धरती से जुड़ने के दिन

    हमारी आधुनिक शिक्षा और आधुनिक संस्कृति का पूरा फोकस इस पर है कि हम अपने भौतिक पर्यावरण व उसके हर तत्व का कैसे इस्तेमाल और दोहन कर सकें. हम अपनी बुद्धि के प्रभाव व जागरूकता का इस्तेमाल करते हुए जीवन को अनुभव करने के तरीके को कैसे बेहतर बना सकते हैं, इसे नहीं बताया जा रहा है.

  • आवेशित भावावेश

    सभी आवेगों में निश्चित ही बहुत समानता है: वह है भावावेशित हो जाना. यह चाहे प्रेम हो, चाहे यह घृणा हो, चाहे यह क्रोध हो. यदि ये बहुत अधिक हो जायें, तो यह तकलीफ और दर्द का अनुभव पैदा करते हैं. यह विशेष रूप से एक भावावेशित व्यक्तित्व का सूचक है. जब यह क्रोध है, तब यह पूरी तरह क्रोध है. और जब यह प्रेम है, यह पूरी तरह प्रेम है.

  • साम, दाम, दंड, भेद

    एक बुद्धिमान व्यक्ति के पास चार तकनीक होती है, जो आंतरिक और ब्राह्य दोनों ही है- साम, दाम, भेद और दंड. लोगों से व्यवहार के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण जीवन जीने के लिए, पहली तकनीक साम है- जिसका अर्थ है शांति और समझदारी भरा मार्ग. जब यह तकनीक काम ना करे, तो आप दूसरी तकनीक पर जायें, जिसे दाम कहते हैं. इसका अर्थ है इसे होने देना, क्षमा कर देना, स्थान देना. यदि लोग आपकी उदारता को नहीं पहचान पाते हैं, तो तीसरी तकनीक भेद काम में आती है. इसका अर्थ है तुलना करना, दूरी उत्पन्न करना. यदि कोई व्यक्ति आपसे उलझता है, तो पहले आप उस से बात करें. यदि इस से बात नहीं बने, तो प्रेम से उनकी उपेक्षा कर दें. उन्हें स्वयं ही समझने का अवसर दें.

  • विपन्नताओं से छुटकारा

    कांच को हथौड़े से तोड़ने पर वह छर-छर होकर बिखर तो सकता है, पर सही जगह से इच्छित स्तर के टुकड़ों में विभाजित नहीं हो सकेगा. चट्टानों में छेद करना हो, तो सिर्फ हीरे की नोंकवाला बरमा ही काम आता है. पहाड़ में सुरंगें निकालने के लिए डायनामाइट की जरूरत पड़ती है. कुदालों से खोदते-तोड़ते रहने पर तो सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी.

  • हमारी प्रकृति का नियम

    आपके कंधों पर भारत देश की समृद्धि का दायित्व है और संस्कृति का गौरव बढ़ाने की जिम्मेवारी भी. जिम्मेवारी जितनी बड़ी है, आपको अपने कंधे भी उतने ही मजबूत रखने होंगे. आप युवा हो. पूरी तरह परिपक्व हो. आपको पता है कि क्या करना है और क्या छोड़ना. कौन-सी प्रवृत्ति फायदेमंद है और किसमें नुकसान. फिर भी, अध्ययन आपकी प्राथमिकता होना चाहिए.

  • हमारी प्रकृति का नियम

    संसार का निर्माण परमात्मा ने बहुत ही सोच-समझ कर संतुलन के आधार पर किया है. पूरे ब्रह्मांड की एक-एक वस्तु, एक-एक कण परमात्मा द्वारा निर्धारित नियमों के अंतर्गत चल रहा है.

  • इच्छा की सड़ांध

    जब तक भी हमारे भीतर कुछ हासिल करने की इच्छा है, कुछ उपलब्धि पाने की इच्छा है, कुछ होने-बनने की इच्छा है, भले ही वह इच्छा किसी भी स्तर पर हो, तब तक वहां पर क्षोभ, गुस्सा, शोक, भय अवश्य होगा. हमारे अंदर से अमीर होने की आकांक्षा, ये और वो होने की महत्वाकांक्षा तभी गिर सकती है, जब हम इस शब्द में निहित सड़ांध या महत्वाकांक्षा की भ्रष्ट प्रकृति को समझ लें.

  • अनिष्ट नहीं चाहते कृष्ण

    वैदिक आदेशानुसार आततायी छह प्रकार के होते हैं- विष देनेवाला, घर में अग्नि लगानेवाला, घातक हथियार से आक्रमण करनेवाला, धन लूटनेवाला, दूसरे की भूमि हड़पनेवाला तथा पराई स्त्री का अपहरण करनेवाला. वैदिक आदेशानुसार ऐसे आततायियों का तुरंत वध कर देना चाहिए, क्योंकि इनके वध से कोई पाप नहीं लगता. आततायियों का इस तरह वध करना सामान्य व्यक्ति को शोभा दे सकता है, किंतु अर्जुन सामान्य व्यक्ति नहीं है. वह स्वभाव से साधु है. अत: वह उनके साथ साधुवत व्यवहार करना चाहता था. किंतु इस प्रकार का व्यवहार क्षत्रिय के लिए उपयुक्त नहीं है. यद्यपि राज्य के प्रशासन के लिए उत्तरदायी व्यक्ति को साधु प्रकृति का होना चाहिए, किंतु कायर नहीं होना चाहिए.

  • पृथ्वी से हमारा जुड़ाव

    हमारा भौतिक शरीर बुनियादी रूप से धरती, जल, वायु, अग्नि और आकाश तत्वों का एक मेल है. धरती इन पांचों तत्वों में सबसे बुनियादी और स्थायी तत्व है. अधिकतर लोग वास्तव में अपने शरीर और मन का ही अनुभव करते हैं. पृथ्वी तत्व को अपने भीतर से जानना और महसूस करना भी योगिक प्रकिया का हिस्सा है. जब भी आप खाना खाते हैं, तो आप धरती के एक हिस्से को निगल रहे होते हैं.

  • सृजन करो, प्रसन्न रहो

    प्रसन्नता सृजनात्मकता की ही उपज है. केवल सृजनात्मक व्यक्ति ही प्रसन्न होते हैं. किसी भी चीज का सर्जन करो, तुम प्रसन्नता का अनुभव करोगे. तुम एक बगीचे का निर्माण करो और बगीचे में कोंपलें लगने दो, तब तुम देखोगे कि तुम्हारे अंदर भी कोंपल उगने लगेगी.

  • शिक्षा एक शक्ति है

    हमारा पूरा विश्व एक विद्यालय की तरह है. यहां हर कहीं से भी शिक्षा ली जा सकती है. शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सकारात्मक सदुपयोग किया जा सकता है. इसलिए पूरे विश्व को एक ही इकाई मान कर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए. सही मायने में यदि समाज में और बच्चों में सही प्रकार से शिक्षा दी जाये, तो मैं समझता हूं कि हमारे समाज से अनेकों बुराइयों को मिटाया जा सकता है.

  • धर्म और धन

    हमारे वेदों के साहित्य में लिखा है- धर्म सच्चाई है. तब अर्थ आता है, जिसका मतलब है माध्यम. धन एक माध्यम है. तब इच्छाएं आती हैं. और फिर मोक्ष आता है. इसका अर्थ है धार्मिकता समृद्धि पर निर्भर करती है. यदि सभी समृद्ध होंगे, तो कोई भी चोरी नहीं करेगा. धर्म का आधार समृद्धि है. और धन का आधार राष्ट्र है. धन महत्वपूर्ण है, परंतु धन केवल एक साधन है. धन सब कुछ नहीं है. धन को कभी भी खुशी से नहीं जोड़ना चाहिए. आप गौर करें कि गरीब लोग भी खुश होते हैं. धन सुरक्षा की एक गलत धारणा बन जाता है.

  • बुढ़ापे से निजात

    बुढ़ापा को लेकर देश-विदेश की विभिन्न शोधशालाओं में गहन अनुसंधान कार्य चल रहे हैं. अधिकांश मामलों में देखा जाता है कि व्यक्ति की बायोलॉजिकल एज (कायिक आयु) उसकी क्रोनोलॉजिकल एज (मियादी आयु) से बढ़ी चढ़ी होती है. बुढ़ापा असमय क्यों आ धमकता है?

  • बोध का पदार्पण

    महात्मा बुद्ध के शिष्य हुए बोधिधर्म. बुद्ध के शरीर छोड़ देने के बहुत समय बाद बोधिधर्म बुद्ध के ज्ञान का उपदेश देने के लिए चीन की ओर गये. जहां वे पहुंचे, वहां के राजा ने उनका सत्कार किया. बोधिधर्म ने कुछ दिन वहां बिताये. उसके बाद पहाड़ की एक कंदरा में रहने लग गये.

  • प्राण ऊर्जा का उद्गम

    हमारे शरीर में जो प्राण है, उसका उद्गम स्थान अंतरिक्ष है. अंतरिक्ष से हमारे प्राण ऊर्जा का तार शरीर से जुड़ा रहता है, इसलिए जीवधारी जीवित रहता है. उस तार के टूटते ही जीव मर जाता है. यही तथ्य हमारे जीवन और मृत्यु का रहस्य है. योग हमें यही सिखाता है कि मनुष्य किस तरह से अंतरिक्ष से प्राण ऊर्जा ग्रहण करता है. जिसके शरीर में जितनी अधिक प्राण ऊर्जा रहती है, वह उतना ही अधिक शक्तिशाली, उत्साहित, प्रसन्न और स्वस्थ रहता है.

  • मन में समस्या की पैठ

    हमारी रोजाना की आम जिंदगी में छोटी-छोटी परेशानियां रहती हैं. हमें कोई प्यार नहीं करता- इस बात का दुख और अगर प्यार किया जा रहा है, तो उसका अपार आनंद. यदि आप जीवन की इन छोटी-छोटी चीजों को समझ सकें, तो आप इनमें अपने दिल-दिमाग के काम करने के ढंग को देख सकेंगे.

  • भक्त का एकनिष्ठ भाव

    शुद्धभक्त सदैव भगवान कृष्ण के विभिन्न रूपों में से किसी एक की भक्ति में लगा रहता है. भगवान कृष्ण के अनेक स्वांश तथा अवतार हैं. जिनमें से एक शुद्धभक्त उनके किसी एक रूप को चुन कर उसकी प्रेमाभक्ति में अपने मन को व्यापक रूप से स्थिर कर सकता है.

  • कृष्ण का आभामंडल

    कृष्ण की हर छवि में एक नीलिमा जरूर दिखायी जाती है. एक व्यक्ति या एक व्यक्तित्व के रूप में उनके साथ आखिर क्यों जुड़ा है यह रंग? क्या है इस रंग की खासियत? दरअसल, नीला रंग विस्तार को दर्शाता है. इस जगत में जो कोई भी चीज बेहद विशाल और आपकी समझ से परे है, उसका रंग आमतौर पर नीला है, चाहे वह आकाश हो या समंदर.

  • अकेलेपन की पीड़ा

    अकेले होकर स्वयं का सामना करना भयावह है और प्रत्येक को इसका कष्ट भोगना पड़ता है. हर एक को यह कष्ट, यह पीड़ा भोगना होगा और इससे गुजरना होगा. यह अच्छा संकेत है कि तुम एक नये जन्म के नजदीक हो, क्योंकि हर जन्म के पूर्व पीड़ा अवश्यंभावी है.

  • जिम्मेवारी और अध्यात्म

    हम तत्व और आत्मा दोनों से बने हैं. आत्मा को आध्यात्मिकता की आवश्यकता है! शरीर (तत्व) की कुछ भौतिक चीजों की आवश्यकता होती है और हमारी आत्मा का पोषण अध्यात्म से होता है. आप जीवन को आध्यात्मिकता के बिना जी नहीं सकते. क्या आप शांति चाहते हैं?

  • श्वसन-प्रक्रिया का महत्व

    कोई भी प्राणायाम सीखने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि हमारी श्वसन क्रिया कैसे कार्य करती है. हम जो श्वसन करते हैं, यानी सांस लेते हैं, वह हम तीन तरह से कर सकते हैं.

  • जीवन के विकारों से बचाता है अध्यात्म

    रक्षाबंधन उत्सव के दिन भाई-बहन से लेकर सियाचिन जैसे दुर्गम क्षेत्र में तैनात भारतीय सैनिकों को राखी बांधे जाने की खबरें खूब चर्चित रहीं. इनमें एक खबर ने और भी कई लोगों का ध्यान खींचा होगा कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने पीपल के पेड़ को राखी बांधी.

  • अमृत है प्रसन्नता

    प्राण का उद्गम स्थान केवल अंतरिक्ष है. जब तक अंतरिक्ष से प्राण ऊर्जा का तार शरीर से जुड़ा रहता है, तब तक मनुष्य जीवित रहता है, उस तार के टूटते ही जीव मर जाता है, यही जीवन और मृत्यु का रहस्य है.

  • रक्षा का बंधन है रक्षाबंधन

    रक्षाबंधन पर्व अनादि काल से वसुधैव कुटुंबकम् की स्नेहमयी भावना का मंत्र फूंक रहा है. भाई-बहन के पवित्र प्रेम का यह भावनाप्रधान पर्व संस्कृति की विजय का भी उद्घोष करता है. यही कारण है कि मानवीय संबंधों की मधुरता के प्रतीक इस त्योहार को पूरा देश आत्मीयता के साथ मनाता चला आ रहा है. राखी बांधते समय बहन के भाव होते हैं कि उसके भाई के द्वारा रक्षा सदैव होती रहे. रक्षा सूत्र वैसे तो केवल कच्चा धागा ही होता है, लेकिन इसमें जब श्रद्धा-भावना की शक्ति समाहित हो जाती है, तो यह साधारण धागा मात्र नहीं रह जाता है, उसे तोड़ना असंभव होता है.

  • संपूर्ण गीता का सार

    भक्तियोग में कहा गया है कि मनुष्य को वही धर्म स्वीकार करना चाहिए, जिस धर्म से अंतत: भगवद्भक्ति हो सके. एक मनुष्य समाज में अपनी स्थिति के अनुसार कोई एक विशेष कर्म कर सकता है, लेकिन यदि अपना कर्म करने से कोई कृष्णभावनामृत तक नहीं पहुंच पाता है, तो उसके सारे कार्यकलाप व्यर्थ हो जाते हैं. जिस कर्म से कृष्णभावनामृत की पूर्णावस्था न प्राप्त हो सके, उससे बचना चाहिए. मनुष्य को विश्वास होना चाहिए कि कृष्ण समस्त परिस्थितियों में उसकी सभी कठिनाइयों से रक्षा करेंगे. इसके विषय में सोचने की कोई आवश्यकता नहीं कि जीवन-निर्वाह कैसे होगा.

  • स्वतंत्रता का महत्व

    भारत का स्वतंत्रता दिवस ऐतिहासिक महत्व रखता है, क्योंकि इस दिन हम राजनीतिक तौर पर आजाद हुए और हमने लोगों के दिल और दिमाग में राष्ट्रीयता का विचार पैदा करना शुरू किया. अगर ऐसा न होता, तो लोग अपनी जाति, समुदाय व धर्म आदि के आधार पर ही सोचते रह जाते. हालांकि, भारतीय होने का यह गौरव केवल एक भौगोलिक सीमा के ऊपर खड़ा था.

  • प्रेम उठे तो बांटना

    प्रेम परमात्मा है, इसे बांटो! जब तुम्हारी झोली भर जाये, तो बांटना सीखो, क्योंकि जितना तुम बांटोगे, उतनी झोली भरती जायेगी. यह जीवन का अंतस का गणित बड़ा अनूठा है. बाहर की दुनिया में, बाहर के अर्थशास्त्र में तुम अगर बांटोगे, तो आज नहीं कल दीन-दरिद्र हो जाओगे. मुल्ला नसरुद्दीन ने एक भिखारी को किसी धुन-मग आकर पांच सिक्के दे दिया. मुल्ला मस्ती में था कि आज दिल देने का था. भीखारी को भी भरोसा नहीं आया.

  • साथ चलने का संबल

    किसी कार्य की सिद्धि सत्व से होती है, वस्तुओं से नहीं. अब सत्व के लिए क्या करें? सही आहार, सही व्यवहार और अपने मन को विश्राम देना सबसे पहले है. अगर इसके बावजूद भी कभी कोई हार हाथ लगे, तो सत्वगुण उत्साह तो कम होने नहीं देता और फिर छोड़ने का प्रश्न ही मन में नहीं उठता. जब एक बार जीतने का चस्का लग जाये, तो फिर बार-बार खेलने का मन करता है. इधर-उधर कोई हार भी हाथ लगे, तो फिर भी मन में कुछ अच्छा करने का विश्वास तो बना ही रहता है. और यह विश्वास तब आता है, जब काम के प्रति श्रद्धा हो. जैसे मन में शांति और कृत में जोश से कितने लोग आजादी के लिए लड़ते रहे. ऐसे लोगों को कोई पैसा नहीं मिलता था, पर वे लोग पीछे नहीं हटे.

  • अब तो आंखें खोलो

    अगर ऐसी मुश्किल आ जाये िक मुझे ईश्वर और गुरु, इन दोनों में से किसी एक को अंतत: चुनना ही पड़ जाये, तो मैं गुरु को चुनूंगी, क्योंकि गुरु के द्वारा ही मैं ईश्वर को समझ लूंगी. अगर मेरे पास गुरु नहीं है, तो मुझे कुछ भी पता नहीं चल पायेगा. क्योंकि ईश्वर तो गूंगा है, वह बोल ही नहीं सकता है. सत्य तो गूंगा है, सत्य को जुबान चाहिए होता है, और जुबान तो गुरु ही देता है. जिस तरह से सवाल उठता है कि राग बांसुरी के भीतर होते हैं क्या?

  • भाषा से समझना

    सर्वसाधारण को शिक्षित बनाइये एवं उन्नत कीजिए, तभी एक राष्ट्र का निर्माण हो सकता है. यथार्थ राष्ट्र जो झाेंपड़ियों में निवास करता है, अपना पौरुष विस्मृत कर बैठा है, अपना व्यक्तित्व खो चुका है. हिंदू, मुसलमान या ईसाई के पैरों से रौंदे वे लोग यह समझ बैठे हैं कि जिस किसी के पास पैसा हो, वे उसी के पैरों से कुचले जाने के लिए ही हुए हैं.

  • ज्ञानकेंद्र एवं कामकेंद्र

    हमें यात्रा-पथ इस शरीर में ही चुनना होगा. हमारे इस दृश्य शरीर में दो केंद्र हैं- ज्ञानकेंद्र और कामकेंद्र. नाभि के ऊपर मस्तिष्क तक का स्थान ज्ञानकेंद्र है, चेतनाकेंद्र है और नाभि के नीचे का स्थान कामकेंद्र है. हमारी चेतना इन दो वृत्तियों के आसपास उलझी रहती है.

  • परमात्म तत्व से ऐक्य

    इस संसार में जब एक व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है, तब उसका संबंध परमात्म तत्व से प्रकट हो जाता है. लोग उस व्यक्ति को अवतार, ऋषि, योगी आदि के रूप में पूजने और मनन करने लगते हैं. तब वह दिव्य पुरुष बन जाता है. परमात्म तत्व वह अनंत जीवन, वह सर्वव्यापी चैतन्य और वह सर्वोपरि सत्ता है, जो इस जगत के पीछे अदृश्य रूप से काम करती है और इसका नियमन करती है. इसी अनंत, असीम और अनादि ज्ञान और शक्ति के भंडार से संबंध स्थापित हो जाने से साधारण मनुष्य असाधारण बन कर अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञाता हो जाता है. अणु-अणु का मूलाधार वह परमात्म तत्व ही है, जिससे सब कुछ बनता है और उसी चेतन शक्ति से गतिशील होता है.

  • कृष्ण का प्रछन्न रूप

    भगवान का अवतरण उनकी अंतरंगा शक्ति का प्राकट्य है. वे भौतिक शक्ति अर्थात माया के स्वामी हैं. भगवान का दावा है कि यद्यपि भौतिक शक्ति अत्यंत प्रबल है, किंतु वह उनके वश में रहती है और जो भी उनकी शरण ग्रहण कर लेता है, वह इस माया के वश से बाहर निकल आता है.

  • अच्छी और बुरी आत्मा!

    आत्मा कोई इकाई नहीं है. लोगों में बस थोड़ी समझ पैदा करने के लिए हिंदू संस्कृति में, ‘जो असीमित है,’ उसके लिए एक शब्द का इस्तेमाल किया गया, लेकिन दुर्भाग्य से इसे अब गलत अर्थ में समझा जाता है. जो असीमित है वह कभी भी एक इकाई नहीं हो सकता. लेकिन जैसे ही आप इसे एक नाम दे देते हैं, यह एक इकाई बन जाता है.

  • भगवान की संपत्ति

    यह अवधारणा कि वास्तविकता में संसार ही केवल एक सत्य है, यह हमारे चेतना को सोचने की इजाजत देता है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जो हम चाहते हैं, वह जब तक हम पाते नहीं, तब तक हम क्या करते हैं. जब हम इस बात पर विश्वास करते हैं कि संसार ही केवल एक वास्तविकता है, तो हमारे तथाकथित नैतिक सिद्धांत कमजोर

  • सारभूत ज्योतिष

    ज्योतिष के नाम पर सौ में से निन्यानबे धोखाधड़ी है. और वह जो सौवां आदमी है, निन्यानबे को छोड़ कर, उसे समझना बहुत मुश्किल है. मेरा प्रयोजन है कि मैं उस पूरे-पूरे विज्ञान को आपको बहुत तरफ से उसके दर्शन करा दूं. कुछ आपके जीवन में अनिवार्य है. और वह आपके जीवन में और जगत के जीवन में संयुक्त और लयबद्ध है. उसमें पूरा जगत भागीदार है.

  • भगवान के नाम का जाप

    इनसान की मृत्यु के समय ही मस्तिष्क शरीर से अलग होता है. इसलिए, उस समय जो भी छवि इनसान मन में रखता है, वह अगले जन्म का कारण बनता है. यह वैज्ञानिक सत्य है. आप यह स्वयं देख सकते हैं. यदि आप ध्यान दें, सुबह उठने पर जो आपके मन का पहला विचार होता है, वह वही विचार होता है जो रात में सोने से पहले आपके मन में था.

  • परमात्मा का प्रकाश

    मनुष्य ने इस अंधकार से अपने आपको मुक्ति दिलाने के लिए पहले आग जलायी, लैंप जलाये और बिजली के बल्ब या ट्यूब जलाते हैं, पर सोने के समय फिर रोशनी बाधा पहुंचाती है. इसलिए फिर हमें अंधकार चाहिए. आदमी बहुत बढ़िया घर बनाये, बेशकीमती फानूस लगाये, कीमती लाइटें लगवाये, लेकिन नींद के समय ये सब बंद कर देता है. महंगे साउंड सिस्टम का कुछ समय मजा लेता है, फिर कहता कि बंद करो इसको. अब संगीत भी शोर लगने लगा. लाइट भी बंद. अंधकार पहले भी, अंधकार बाद में भी. अंधकार दिन के पहले भी, अंधकार दिन के अंत में भी. अंधकार जन्म से पहले भी, अंधकार मृत्यु की घड़ी से फिर शुरू हो जाता है.

  • गलत-सही खाने के आदी

    काया को निरोग या रोगी रखना बहुत कुछ जिह्वा की गतिविधियों पर निर्भर है. जन्मजात रूप से हर किसी की जीभ को प्रकृति-अनुशासन का स्मरण रहता है. उसे चटोरी तो बाद में जबरन बनाया जाता है. बुरी आदतें तो प्रयत्न करने पर किसी में भी डाली जा सकती हैं.

  • हमारा समाज खराब नहीं

    अपने व्यापारी हिसाब-किताब करनेवाले विचारों को छोड़ दो. यदि तुम किसी एक वस्तु से भी अपनी आसक्ति तोड़ सकते हो, तो तुम मुक्ति के मार्ग पर हो. किसी वेश्या या पापी अथवा साधु को भेद-दृष्टि से मत देखो. वह कुलटा नारी भी दिव्य मां है.

  • इष्टदेव के प्रेम में

    एक देवता होते हैं और एक इष्ट देवता होते हैं. इष्ट देवता का मतलब है आपकी पसंद का देवता. इसका मतलब है कि आपने देवता को बनाया. हो सकता है कि आपने भावनात्मक रूप से कोई देवता बना लिया. दरअसल, आपने ऊर्जा का एक स्वरूप तैयार कर लिया, जिसके साथ आप एक खास तरीके से जुड़े रहते हैं. लेकिन यह कोई ऐसे देवता नहीं होते, जो स्वर्ग से उतर कर आये हों. आप एक माइक्रोफोन के जरिये अपनी बात दूर तक पहुंचा सकते हैं. माइक्रोफोन आपके लिए तभी कारगर हैं, जब आप बोल सकते हैं. लेकिन ये सभी स्वरूप ऊर्जा-पिंड नहीं हैं.

  • गुरु पूर्णिमा का उजाला

    आषाढ़ पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा के रूप में मानने का क्या अर्थ है? धर्म जीवन को देखने का काव्यात्मक ढंग है. सारा धर्म एक महाकाव्य है. अगर यह तुम्हें खयाल में आये, तो आषाढ़ की पूर्णिमा बड़ी अर्थपूर्ण हो जायेगी. अन्यथा आषाढ़ में पूर्णिमा दिखायी भी न पड़ेगी. बादल घिरे होंगे.

  • तीन आदि शक्तियां

    वर्तमान में टीवी धारावाहिकों में देवी-देवताओं को जिस तरह से दिखाया जा रहा है, यह कहीं से भी मुझे उचित नहीं लगता. मां पार्वती का उदाहरण लें, जो भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं और ईश्वरीय शक्ति हैं. मां पार्वती को एक ऐसी महिला के रूप में दिखाया जाता है, जो अक्सर आवेश में आ जाती है और जरा-जरा सी बात पर परेशान हो जाती है. ये सब दैवी गुण नहीं हैं.

  • गुरु बिनु ज्ञान कहां से पाऊं

    दो दिन बाद गुरु पूर्णिमा का पर्व देश भर में पूरी श्रद्धा से मनाया जायेगा. भारतीय जीवन दर्शन में गुरु की महिमा बार-बार गायी और बतायी गयी है. वेद-पुराण-उपनिषद इससे भरे पड़े हैं. गृधातु से गुरु शब्द की रचना बतायी गयी है. निरुक्त में कहा गया है- यो धम्यान् शब्दान गृनात्युपरदशिति स गुरु:/स पूर्वेषामणि गुरु: कालेनानवच्छेदात्. अर्थात जो धर्म का प्रतिपादक है, सकल विद्या युक्त वेदों का उपदेशकर्ता है, सृष्टि के आदि में अग्नि-वायु-सूर्य-अंगिरा और ब्रह्मा जैसे गुरुओं का भी गुरु है, जिसका नाश कभी नहीं होता उस परमेश्वर का नाम गुरु है. इसीलिए कबीर ने गुरु को परमेश्वर (गोविंद) से भी ज्यादा महत्व दिया है क्योंकि उस तक पहुंचने का मार्ग गुरु ही बताता है.

  • प्रेम खुद में ध्यान है

    प्रेम अपने आप में ही एक ध्यान विधि है. हार्दिक गहरी श्रद्धा भी अपने आप में एक ध्यान ही है. जिनके अंदर ऐसी गहरी श्रद्धा और ऐसा गहरा प्रेम उजागर हो जाता है, वे अपने आप में बिना किये हुए ही ध्यान जैसी स्थिति में रहते हैं. इसी कारण से ध्यान करने पर जो किसी के शरीर में अनुभूतियां उठती हैं, वे उनको सहज से ही अनुभव में आने लग जाती हैं.

  • सतयुगी व्यवस्था आयेगी!

    इन दिनों अकसर परिस्थितियों की विपन्नता पर चर्चा होती है. कुछ तो मानवीय स्वभाव ही ऐसा है कि वह आशंकाओं, विभीषिकाओं को बढ़-चढ़ कर कहने में सहज रुचि रखता है. कुछ सही अर्थों में वास्तविकता भी है, जो मानव जाति का भविष्य निराशा एवं अंधकार से भरा दिखाती है.

  • सत्य का सही रूप

    गुरु, साधु तथा शास्त्र एक ही प्रकार से आज्ञा देते हैं. इन तीनों स्रोतों में कोई विरोध नहीं होता. इस प्रकार से किये गये सारे कार्य इस जगत के शुभाशुभ कर्मफलों से मुक्त होते हैं. कर्म संपन्न करते हुए भक्त की दिव्य मनोवृत्ति वैराग्य की होती है, जिसे संन्यास कहते हैं. जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है- जो भगवान का आदेश मान कर कोई कर्तव्य करता है और जो अपने कर्मफलों की शरण ग्रहण नहीं करता, वही असली संन्यासी है.

  • अपने आदर्श को न भूलें

    आदर्श बहुत से हैं. मुझे कोई अधिकार नहीं कि मैं आपको बताऊं कि आपका आदर्श क्या होना चाहिए, या कि आपके गले जबरदस्ती कोई आदर्श मढ़ दूं. मेरा तो यह कर्तव्य होगा कि आपके सम्मुख मैं इन विभिन्न आदर्शों को रख दूं, और आपको अपनी प्रकृति के अनुसार जो आदर्श सबसे अधिक अनुकूल जंचे, उसे ही आप ग्रहण करें और उसी ओर अनवरत प्रयत्न करें. वही आपका ''इष्ट'' है, वही आपका विशेष आदर्श है.

  • यह तुम हो

    तुम्हें इस सत्य को स्वीकारना होगा कि तुम अकेले हो- हो सकता है कि तुम भीड़ में होओ, पर तुम अकेले जी रहे हो. हो सकता है कि अपनी पत्नी के साथ, गर्लफ्रेंड के साथ, ब्वॉयफ्रेंड के साथ, लेकिन वे अपने अकेलेपन के साथ अकेले हैं, तुम अपने अकेलेपन के साथ अकेले हो, और ये अकेलेपन एक-दूसरे को छूते भी नहीं हैं, एक-दूसरे को कभी भी नहीं छूते हैं.

  • ईद की खुशी के मायने

    अल्लाह की तरफ से तमाम मुसलमानों के लिए ईद-उल-फितर का दिन खुशियां मनाने का दिन है. ईद के माने ही खुशी के होते हैं. जिन मोमिनों ने अल्लाह का हुक्म माना और रमजान महीने के सारे रोजे रखे, उनके लिए तो सबसे ज्यादा खुशी का दिन है. आखिरी रोजे के दिन इफ्तार के बाद मगरिब के वक्त ईद का चांद देखने के बाद ही अगले दिन ईद मनायी जाती है.

  • अष्टांग योग का चतुर्थांश

    स्वस्थ शरीर एवं स्वस्थ मन, दोनों का एक-दूसरे से घनिष्ठ संबंध हैं. दोनों के सही रहने पर दुर्बलता और रुग्णता से पीछा छूटता है और मनुष्य कोई कहने लायक पुरुषार्थ कर सकने में समर्थ होता है. इस दृष्टि से जो गयी गुजरी स्थिति में रहेगा, वह अपने तथा दूसरों के लिए भार बन कर रहेगा.

  • वाक शुद्धि का तरीका

    यदि आप इस मानव शरीर को एक अधिक ऊंची संभावना के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो सही किस्म की ध्वनियों या गूंजों की एक नींव जरूरी है. वरना आपका सिस्टम हमेशा आपके पीछे घिसटता ही रहेगा. अगर आप उसे एक अधिक बड़ी संभावना बनाना चाहते हैं, तो जरूरी है कि बुनियाद सही तरीके की ध्वनियों की हो और इसके लिए वाक शुद्धि एक महत्वपूर्ण अंग है.

  • विचार क्रांति आवश्यक

    इन दिनों सबसे आवश्यक कार्य यह है कि विचार क्रांति का व्यापक आयोजन किया जाये. अवांछनीयता के विरुद्ध संघर्ष खड़ा किया जाये और मानवीय गरिमा के अनुरूप मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं का अनुशासन अपनाने के लिए हर किसी को बाधित किया जाये. नवयुग के अवतरण का- सतयुग की वापसी का यही एकमात्र उपाय है. यही है धर्म की धारणा और सत्य, प्रेम, न्याय की आराधना.

  • कर्म और कर्मफल

    हम किसी मनुष्य की भूख अल्प समय के लिए भले ही शांत कर दें, परंतु बाद में वह फिर भूखा हो जायेगा. किसी व्यक्ति को हम जो कुछ भी सुख दे सकते हैं, वह क्षणिक होता है. सुख और दुख के सतत ज्वार का कोई भी सदा के लिए उपचार नहीं कर सकता. प्रत्येक देश में कुछ ऐसे नर-रत्न होते हैं, जो केवल कर्म के लिए ही कर्म करते हैं. वे नाम-यश अथवा स्वर्ग की भी परवाह नहीं करते. वे केवल इसलिए कर्म करते हैं कि उसमें कुछ कल्याण होगा.

  • सात्त्विक तप करें

    जैन रामायण में प्रसंग आता है कि रावण को युद्ध करने के लिए शक्ति की अपेक्षा थी. रावण ने युद्ध में विजयी बनने के लिए तपस्या की. वह कई दिनों तक भूखा रहा. खूब जप किया उसने. यहां तक कि इंद्रिय-संयम तक किया, किंतु तपस्या का उद्देश्य अच्छा नहीं था. उसका उद्देश्य था शत्रु की सेना का विनाश. रावण ने तपस्या करके बहुरूपिणी विद्या प्राप्त की.

  • जगत्पत्ति कृष्ण

    भगवद्गीता का ज्ञान परंपरा विधि से करना चाहिए. परंपरा विधि के लुप्त होने पर उसके सूत्रपात के लिए अर्जुन को चुना गया. हमें चाहिए कि हम अर्जुन का अनुसरण करें, तभी हम भगवद्गीता का सार समझ सकेंगे और तभी कृष्ण को भगवान के रूप में जान सकेंगे.

  • योग-चित्त-वित्त-निरोध

    हमारा दिमाग निरंतर सुख और दुख से प्रभावित रहता है. सुख या खुशी प्यार और रिश्तों से मिलता है, जबकि दुख या पीड़ा नफरत से जन्म लेती है. इसलिए यह घुमक्कड़ मन हमेशा खुशी और गम के बीच और चीजों और इच्छाओं के बीच अटक जाता है. लेकिन मन जब ध्यान और स्व-जागृति के द्वारा अपने अंदर झांकने लगता है, तो यह मुक्ति की ओर बढ़ने लगता है.

  • प्रेम में होने का अर्थ

    मूल रूप से प्रेम का मतलब है कि कोई और आपसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुका है. यह दुखदायी भी हो सकता है, क्योंकि इससे आपके अस्तित्व को खतरा है. जैसे ही आप किसी से कहते हैं, ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं’, आप अपनी पूरी आजादी खो देते हैं. आपके पास जो भी है, आप उसे खो देते हैं.

  • परमात्मा की परिभाषा

    परमात्मा तो उसी का नाम है, जिसकी कोई परिभाषा नहीं है. परमात्मा अर्थात अपरिभाष्य. इसलिए परमात्मा की परिभाषा पूछोगे, तो उलझन में पड़ोगे. जो भी परिभाषा बनाओगे, वही गलत होगी. और कोई परिभाषा पकड़ ली, तो परमात्मा को जानने से सदा के लिए वंचित रह जाओगे.

  • परामानसिक व्यक्तित्व

    हमारे समूचे व्यक्तित्व के पीछे, व्यक्तित्व में घटित होनेवाली घटनाओं के पीछे जो रहस्यमय सत्ता छिपी हुई है, वह है सूक्ष्म शरीर या कर्मशरीर की सत्ता या सूक्ष्म शरीरीय चेतना की सत्ता. इसे हम परामानसिक सत्ता कहते हैं. इस तक पहुंचे बिना किसी भी कार्य या घटना की व्याख्या नहीं की जा सकती. कर्म का संबंध परामानसिक है. एक व्यक्ति उसी भूखंड में रहता है, जहां दूसरे लोग रहते हैं.

  • हमारा दूसरा मस्तिष्क

    जीवन का उच्चतम ध्येय है अनंत का अनुभव करना. बिना अनंत के अनुभव के मनुष्य जीवन पशु के जीवन के समान है. आत्मा की अनंतता की एक झलक मात्र पा जाने से जीवन में बदलाव आ जाता है.

  • विपन्नताओं से छुटकारा

    चट्टानों में छेद करना हो, तो सिर्फ हीरे की नोंक वाला बरमा ही काम आता है. पहाड़ में सुरंगें निकालने के लिए डायनामाइट की जरूरत पड़ती है. कुदालों से खोदते-तोड़ते रहने पर तो सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी. वर्तमान में संव्याप्त असंख्य अवांछनीयताओं से जूझने में प्रचलित उपाय पर्याप्त नहीं हैं. दरिद्रता को सभ

  • उपकार का अर्थ

    इस पृथ्वी को कर्मभूमि कहा जाता है. अच्छे-बुरे सभी कर्म यहीं करने होते हैं. मनुष्य स्वर्गकाम होकर सत्कार्य करने पर स्वर्ग में जाकर देवता हो जाता है. इस अवस्था में वह कोई नया कर्म नहीं करता- वह तो बस, पृथ्वी पर किये हुए अपने सत्कर्मों के फलों का ही भोग करता है.

  • कृष्ण की शरण

    भगवान चैतन्य ने कहा है कि जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत के विज्ञान में दक्ष हो, जो व्यक्ति कृष्णतत्त्ववेत्ता हो, चाहे वह जिस किसी भी जाति का हो, वही व्यक्ति वास्तविक गुरु है. अत: कृष्णतत्त्ववेत्ता हुए बिना कोई भी प्रामाणिक गुरु नहीं हो सकता.

  • अहिंसा की आवश्यकता

    शांति केवल अहिंसा से ही संभव है. पर अहिंसा का अर्थ इतना ही नहीं है कि किसी जीव की हत्या न की जाये. दूसरों को पीड़ा न पंहुचाना, उनके अधिकारों का हनन करना भी अहिंसा है. इस अहिंसा की पहले भी आवश्यकता थी और आज भी है. पर आज विनाशक शस्त्रों के अंबार लगे हुए हैं. गरीबी एवं अभाव के कारण लोग नारकीय जीवन जीने के लिए विवश है.

  • भीतर का उजाला है गुरु

    अगर आप बिना किसी मार्ग-दर्शन के आगे बढ़ेंगे तो इधर-उधर ही भटकते रह जायेंगे, भले ही आपकी मंजिल अगले कदम पर ही हों. बस इसी मार्ग-दर्शन के लिए आपको गुरु की जरूरत पड़ती है.

  • आनंद प्रसन्नता

    अगर बच्चा पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करे, तो तुम क्या करोगे? तुम तत्काल डर जाओगे- हो सकता है कि वह गिर जाये, हो सकता है वह अपना पैर तोड़ ले, या कुछ गलत हो जाये. इस भय से तुम भागते हो और बच्चे को रोक लेते हो. यदि तुमने जाना होता कि पेड़ पर चढ़ने में कितना आनंद आता है, तुमने बच्चे की मदद की होती, ताकि बच्चा पेड़ पर चढ़ना सीख जाता. और यदि तुम डरते हो, तो उसे सिखाओ. उसकी मदद करो, ताकि वह गिरे नहीं.

  • एक बीमार मानसिकता

    बहुत से माता-पिता को लगता है कि बिना प्रतिस्पर्द्धा की भावना के बच्चों में आगे बढ़ने की प्रेरणा ज्यादा देर तक कायम नहीं रखी जा सकती. मुकाबले का सीधा सा मतलब है कि आप जो कुछ भी काम कर रहे हैं, उसमें आपकी रुचि नहीं है. हमें अपने बच्चों को ऐसी परवरिश देनी चाहिए, ताकि वे आगे चल कर जो भी करें, इसलिए करें कि उन्हें उसे करने में कुछ अर्थ नजर आता है.

  • भगवान की महान रचना

    माया का अर्थ भगवान कि ऊर्जा होती है और माया को दो प्रकार से वर्गीकृत किया गया है- महामाया और योगमाया. यह भी समान ऊर्जा है. संसार का भौतिक रूप भगवान की ऊर्जा है. इस ऊर्जा के भीतर की सारी अभिव्यक्ति समय के प्रभाव में है और इसलिए ये अस्थायी हैं. ये तीन अवस्था के अंतर्गत आते हैं- अच्छाई, जुनून और अज्ञानता. आध्यात्मिक ऊर्जा तो सद-चित-आनंद है, जो आंतरिक है और ज्ञान और आनंद से भरा है.

  • व्यवहारकुशलता

    मृदु वचनों का उपयोग करने से यह संसार अपने वश में किया जा सकता है. ऐसा करने में आपकी फूटी कौड़ी भी खर्च नहीं होती और न ही कुछ नुकसान होता है, बल्कि आपका अध्यक्ष, आपका पति, आपकी पत्नी, आपका ग्राहक और आपके मित्र आपके दास बन जाते हैं. उनके दिलों में आपके प्रति एक हार्दिक भावना बनी रहती है. आप उनके अपने हो सकते हैं.

  • कर्तव्य की व्याख्या

    प्रकृति हमारे लिए जिस कर्तव्य का विधान करती है, उसका विरोध करना व्यर्थ है. यदि कोई मनुष्य छोटा कार्य करे, तो उसी कारण वह छोटा नहीं कहा जा सकता है. कर्तव्य के केवल ऊपरी रूप से ही मनुष्य की उच्चता या नीचता का निर्णय करना उचित नहीं, अपितु देखना तो यह चाहिए कि वह अपना कर्तव्य किस भाव से करता है.

  • विपन्नताओं से छुटकारा

    कांच को हथौड़े से तोड़ा जाये, तो वह बिखर तो सकता है, पर सही जगह से इच्छित स्तर के टुकड़ों में विभाजित न हो सकेगा. चट्टानों में छेद करना हो, तो सिर्फ हीरे की नोंक वाला बरमा ही काम आता है. पहाड़ में सुरंगें निकालने के लिए डायनामाइट की जरूरत पड़ती है.

  • जीवात्मा की स्थिति

    जीवात्मा के साथ निरंतर रहनेवाला परमात्मा परमेश्वर का ही प्रतिनिधि है. वह सामान्य जीव नहीं है. चूंकि अद्वैतवादी चिंतक शरीर के ज्ञाता को एक मानते हैं, अतएव उनके विचार से परमात्मा तथा जीवात्मा में कोई अंतर नहीं है. इसका स्पष्टीकरण करने के लिए भगवान कहते हैं कि वे प्रत्येक शरीर में परमात्मा रूप में विद्यमान हैं. वे जीवात्मा से भिन्न हैं, पर हैं, दिव्य हैं. जीवात्मा किसी विशेष क्षेत्र के कार्यों को भोगता है, लेकिन परमात्मा किसी सीमित भोक्ता के रूप में या शारीरिक कर्मों में भाग लेनेवाले के रूप में विद्यमान नहीं रहता. अपितु वह साक्षी, अनुमतिदाता तथा परम भोक्ता के रूप में स्थित रहता है.

  • मनोबल का चमत्कार

    जिस प्रकार शरीर बल को बढ़ाने के लिए आहार, व्यायाम एवं विशेष उपचारों का सहारा लिया जाता है, उसी प्रकार मनोबल के लिए भी ध्यान, धारणा आदि यौगिक अभ्यासों की जरूरत होती है. चिंतन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता और व्यवहार में शालीनता का समावेश करने से मनोबल की अभिवृद्धि होती है. मन का शरीर पर पूरी तरह नियंत्रण है.

  • प्रेम-बंधन या मुक्ति?

    मूल रूप से प्रेम का मतलब है कि कोई और आपसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुका है. यह दुखदायी भी हो सकता है, क्योंकि इससे आपके अस्तित्व को खतरा है. जैसे ही आप किसी से कहते हैं-‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं,’ आप अपनी पूरी आजादी खो देते हैं. आपके पास जो भी है, आप उसे खो देते हैं. जीवन में आप जो भी करना चाहते हैं, वह नहीं कर सकते. बहुत सारी अड़चनें हैं, लेकिन साथ ही यह आपको अपने अंदर खींचता चला जाता है.

  • संसार तो एक भ्रम है

    इस संसार के तीन आधारभूत दृष्टिकोण हैं. पहला दृष्टिकोण भौतिकवाद का है, जिसमें लोग इस संसार को वास्तविक रूप में देखते हैं. दूसरा वह है, जिसमें दुनिया पूरी तरह से एक भ्रम है. तीसरा यह है कि संसार भगवान की पवित्र संपत्ति है. यह वास्तविक है, लेकिन यह प्रत्यक्षीकरण में अस्थायी है.

  • जीवात्मा और विज्ञान

    जीवात्मा क्या और इसका लक्षण, स्वरूप, स्वभाव तथा लक्ष्य क्या है? इस सवाल पर विज्ञान शुरू में विरोधी था, वह कहता था जड़ तत्त्वों के, अमुक रसायनों के एक विशेष संयोग-सम्मिश्रण का नाम ही जीव है. उसकी सत्ता वनस्पति वर्ग की है. मनुष्य एक चलता-फिरता पेड़ है. रासायनिक संयोग उसे जन्म देते, बढ़ाते और बिगाड़ देते हैं.

  • व्यवहारपटुता का अर्थ

    हिल-मिल कर रहने की कला को समुन्नत करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति के स्वभाव में कोमलता का आना अनिवार्य है. जिस तरह रबर लचीला होता है, उसी तरह व्यक्ति का स्वभाव भी लचीला होना चाहिए, ताकि आवश्यकतानुसार जैसे चाहें वैसे उसे मोड़ा जा सके. व्यवहारपटुता के लिए अधिक ज्ञान का अर्जन करना आवश्यक नहीं.

  • आत्मा की उपस्थिति

    गुणात्मक दृष्टि से परमात्मा का अणु अंश परम से अभिन्न है. वह शरीर की भांति विकारी नहीं है. कभी-कभी इस आत्मा को स्थायी या कूटस्थ कहा जाता है. हमारे शरीर में छह प्रकार के रूपांतर होते हैं.

  • शरीर की सुनो

    शरीर के साथ लड़ना नहीं है, तुम्हें उसे केवल समझना है. शरीर बहुत प्राचीन है, कभी तुम एक पत्थर की तरह जीते थे. तब शरीर तो था लेकिन मन सोया हुआ था. फिर तुम एक पेड़ हुए; शरीर था, उसकी पूरी हरियाली और फूलों के साथ. लेकिन मन अभी भी गहरी नींद सोया था. फिर तुम बाघ हुए, पशु हुए; शरीर ऊर्जा से इतना ओत-प्रोत था, लेकिन मन काम नहीं कर रहा था. तुम पक्षी हुए, मनुष्य हुए. शरीर लाखों साल से कार्यरत है.

  • कर्तव्य का स्वरूप

    अपनी सामाजिक अवस्था के अनुरूप एवं हृदय तथा मन को उन्नत बनानेवाले कार्य करना ही हमारा कर्तव्य है. कर्तव्य का पालन शायद ही कभी मधुर होता हो! कर्तव्य-चक्र तभी हलका और आसानी से चलता है, जब उसके पहियों में प्रेम रूपी चिकनाई लगी होती है, अन्यथा वह एक अविराम घर्षण मात्र है. यदि ऐसा न हो तो माता-पिता अपने बच्चों के प्रति, बच्चे अपने माता-पिता के प्रति, पति अपनी पत्नी के प्रति तथा पत्नी अपने पति के प्रति अपना-अपना कर्तव्य कैसे निभा सकें? कर्तव्य वहीं तक अच्छा है, जहां तक कि यह पशुत्व भाव को रोकने में सहायता प्रदान करता है.

  • प्रतिद्वंद्वी अवस्थाओं में

    इन दिनों निरंतर दो दबाव बढ़ते जा रहे हैं. एक है- व्यापक अवांछनीयताओं से जूझना और उन्हें परास्त करने का दबाव, और दूसरा है- नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता का दबाव. निजी और छोटे क्षेत्र में भी यह दोनों कार्य अति कठिन पड़ते हैं. प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए तदनुरूप योग्यता एवं कर्मनिष्ठा उत्पन्न करनी पड़ती है. इनके बिना सामान्य स्थिति में रहते हुए किसी प्रकार दिन काटते ही बन पड़ता है. अनेकों समस्याएं और कठिनाइयों, आये दिन त्रास और संकट भरी परिस्थितियों बनी रही रहती हैं.

  • घर का अर्थ है सहजता

    अगर हम किसी जगह को घर कहते हैं, तो उसके पीछे का भाव एक ऐसी जगह से होता है, जहां आप अपने मूल रूप में रह सकें, जहां आप निश्चिंत होकर सहज रूप से रह सकें, जहां आप वह सब कर सकें, जो आपके लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रिय हो. मैं अक्सर लोगों को शिकायत करते सुनता हूं कि, ‘मेरे जीवन में जो मेरे लिए सबसे ज्यादा अहम होता है, मैं जब घर आता हूं, तो सब खत्म हो जाता है.’

  • कायाबल के लिए ध्येय

    ध्यान दो प्रकार के होते हैं- स्वरूपालंबी ध्यान और पररूपालंबी ध्यान. साधक को पहले यह निर्णय करना होता है कि वह क्या बनना चाहता है? यदि यह वीतराग बनना चाहता है, तो उसे स्वरूपालंबी ध्यान करना होगा. कोई दूसरा ध्यान वहां तक नहीं पहुंच पाता. शुद्ध चेतना को प्राप्त करने के लिए केवल वीतराग स्वरूप का आलंबन

  • निर्विकार सुनना

    यदि तुम सब तरह के पूर्वाग्रहों के साथ सुन रहे हो, तो यह सुनने का गलत ढंग है. तुम्हें लगता है कि सुन रहे हो, पर तुम्हें बस सुनाई दे रहा है, तुम सुन नहीं कर रहे. सही सुनने का मतलब होता है मन को एक तरफ रख देना. इसका यह मतलब नहीं होता कि तुम बुद्धू हो जाते हो कि जो कुछ भी तुम्हें कहा जा रहा है, उस पर तुम विश्वास करने लगते हो.

  • भीतर से मुस्कुराना

    हम जन्म के साथ इस जीवन में बहुत उत्साह लाते हैं, पर धीरे-धीरे वह कहीं खो जाता है. जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती जाती है, हम सकारात्मक दृष्टिकोण से नकारात्मक दृष्टिकोण की ओर खुद को मोड़ लेते हैं. हर घटना, जिससे हम परेशान होकर शिकायत करने लगते हैं, वह एक मौका है अपने ज्ञान को और गहरा बनाने के लिए.

  • आदर्श का मापदंड

    आदर्श बहुत से हैं. मुझे कोई अधिकार नहीं कि मैं आपको बताऊं कि आपका आदर्श क्या होना चाहिए, या कि आपके गले जबरदस्ती कोई आदर्श मढ़ दूं. मेरा तो यह कर्तव्य होगा कि आपके सम्मुख मैं इन विभिन्न आदर्शों को रख दूं, और आपको अपनी प्रकृति के अनुसार जो आदर्श सबसे अधिक अनुकूल जंचे, उसे ही आप ग्रहण करें और उसी ओर अनवरत प्रयत्न करें.

  • आपने आज क्या किया?

    अगर आप एक सच्चे खोजी हैं तो यही काफी है. सिर्फ यह सोच लेने से कि आप खोजी हैं, आप खोजी नहीं बन जाते और न ही आसपास के लोगों के ऐसा कह देने से आप खोजी बन जायेंगे. जब आप अज्ञानता की पीड़ा से गुजरते हैं, केवल तभी आप असली खोजी बनते हैं.

  • आसुरी अज्ञानता

    असुरों में काम कभी तृप्त नहीं होता. वे भौतिक भोग के लिए अपनी अतृप्त इच्छाएं बढ़ाते चले जाते हैं. यद्यपि वे क्षणभंगुर वस्तुओं को स्वीकार करने के कारण सदैव चिंतामग्न रहते हैं, तो भी मोहवश ऐसे कार्य करते जाते हैं. उन्हें कोई ज्ञान नहीं होता. अत: वे यह नहीं कह पाते हैं कि वे गलत दिशा में जा रहे हैं.

  • प्रकृति प्रेम का विस्तार

    यू नान के प्रसिद्ध हकीम लुकमान पेड़ों-पौधों से उनकी उपयोगिता पूछ कर मनुष्य का इलाज किया करते थे. आज भी भारत में आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति प्रकृति के आशीर्वाद पर ही निर्भर है. इसका एक कारण यह भी है कि मनुष्य का शरीर और प्रकृति की वनस्पति, दोनों एक ही तत्व से बने हुए हैं. जो तत्व इन वृक्षों और वादियों में हैं, वही तत्व मनुष्य में भी हैं.

  • सत्य की खुशबू

    अगर एक व्यक्ति भीड़ के विपरीत जाता है- जीसस या बुद्ध- भीड़ इस व्यक्ति के साथ अच्छा महसूस नहीं करती. भीड़ उसे नष्ट कर देगी या यदि भीड़ बहुत सभ्य है, तो उसकी पूजा शुरू कर देगी. लेकिन दोनों ही ढंग एक जैसे हैं. यदि भीड़ थोड़ी-सी असभ्य है, जंगली है, जीसस को सूली दे देगी.

  • मुक्ति और अज्ञानता

    मनुष्य के लिए मुक्ति को प्राप्त करने का केवल एक ही उपाय है और वह है इस जीवन का त्याग, इस जीवन यानी इस क्षुद्र जगत का त्याग, शरीर का त्याग एवं सीमाबद्ध सभी वस्तुओं का त्याग. यदि हम मन एवं इंद्रियगोचर इस छोटे से जगत से अपनी अासक्ति हटा लें, तो उसी क्षण मुक्त हो जायेंगे. बंधन से मुक्त होने का एकमात्र उपाय है- सारे नियमों के बाहर चले जाना, कार्य-कारण शृंखला के बाहर चले जाना. मुक्ति का अर्थ है- पूर्ण स्वाधीनता, शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाना. मनुष्य की मुक्ति के लिए सबसे आवश्यक वस्तु है- मनुष्यत्व.

  • समस्या और तनाव

    यदि आपको कभी कोई समस्या हुई हो और आप दिन भर उसके बारे में सोचते रहे हों, ऐसा क्या आपने कभी गौर किया है? और उस समस्या के बारे में आपका सोचना रात भर भी जारी रहा हो. उस समस्या के बारे में चिंता करना और फिर आप दूसरे दिन भी सोचते-सोचते से थके हुए उठें, फिर दिन भर उसके बारे में चिंता करें वैसे ही जैसे एक कुत्ता सारा दिन हड्डी को चबाता रहता है.

  • आप खुद बनें कल्पवृक्ष

    एक इंसान के तौर पर हमने इस धरती पर जो कुछ भी बनाया है, असल में उसकी रचना पहले हमारे मन में हुई. आप देख सकते हैं कि इंसान द्वारा किये गये हर काम का विचार पहले उसके मन में आया, उसके बाद ही वह चीज बाहरी दुनिया में हुई. इस धरती पर जो भी खूबसूरत या भयानक काम हुए हैं, वे दोनों ही हमारे मन की उपज हैं.

  • समस्या की जड़ में

    हमारे समाज में इन दिनों एक बड़ी समस्या यह है कि समाज-परिवार में छाई विपन्नताओं से किस प्रकार छुटकारा पाया जाये और उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए क्या किया जाये, जिससे सुविकसित जीवन जी सकना संभव हो सके? समाज विज्ञानियों द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों का कारण अभावग्रस्तता को मान लिया गया है.

  • विस्मित होने का ज्ञान

    विस्मय आध्यात्मिक उद्घाटन का आधार है. यह कितना अद्भुत है कि सृष्टि सर्वत्र आश्चर्यजनक वस्तुओं से भरी पड़ी है, लेकिन हम इन्हें अनदेखा कर देते हैं, तभी हम में जड़ता का उदय होने लगता है और सुस्ती भी आती है. तमस का कार्य शुरू हो जाता है, निष्क्रियता आने लगती है और अज्ञानता घर कर लेती है.

  • जीवन का सृजन

    एक महान सम्राट अपने घोड़े पर बैठ कर हर दिन सुबह शहर में घूमता था. यह सुंदर अनुभव था कि कैसे शहर विकसित हो रहा है, कैसे उसकी राजधानी अधिक से अधिक सुंदर हो रही है.

  • प्रकृति से खिलवाड़

    मनुष्य का जीवन सुरक्षित रहे, इसके लिए ही हरे पेड़-पौधे बनाये गये. उन्हीं से ऋणायन बना है, जो मनुष्यों के स्वास्थ्य की रक्षा करता है. ऋणायन हरे-भरे वृक्ष, पहाड़ की चोटी और समुद्र की लहरों से पैदा होता है. हरे-भरे पेड़ों की कमी के चलते जब बड़े शहरों के लोग बीमार पड़ने लगते हैं, तब डॉक्टर उन बीमार व्यक्तियों को किसी हिल स्टेशन पर जाने की सलाह देते हैं. यही वजह है कि लोग हिल स्टेशनों, जंगलों, पहाड़ों और समुद्र के किनारे स्वास्थ्य लाभ करने के उद्देश्य से जाते हैं. हमारा शरीर प्रकृति का एक छोटा अंश है.

  • ध्यान का सूत्र

    ध्यान दो प्रकार के होते हैं- स्वरूपालंबी ध्यान और पररूपालंबी ध्यान. साधक को पहले यह निर्णय करना होता है कि वह क्या बनना चाहता है? यदि वह वीतराग बनना चाहता है, तो उसे स्वरूपालंबी ध्यान करना होगा. कोई दूसरा ध्यान वहां तक नहीं पहुंच पाता. शुद्ध चेतना को प्राप्त करने के लिए केवल वीतराग स्वरूप का आलंबन ही कार्यकारी होता है. दूसरे आलंबन उसकी उपलब्धि नहीं करा सकते.

  • सत्य, तर्क, बुद्धि, हृदय

    एकमात्र ईश्वर ही सत्य है, एकमात्र आत्मा ही सत्य है और एकमात्र धर्म ही सत्य है. इन्हें ही सत्य समझो. यह निश्चय जानो, यदि तुम प्रलोभनों को ठुकरा कर सत्य के सेवक बनोगे, तो तुममें ऐसी दैवी शक्ति आ जायेगी, जिसके सामने लोग तुमसे उन बातों को कहते डरेंगे, जिन्हें तुम सत्य नहीं समझते.

  • प्रगति नहीं अवगति

    मनुष्य तुरत-फुरत परिणाम मिलने में विलंब होने के कारण प्राय: चूक करता रहता है. अदूरदर्शिता अपनाता है और यह भूल जाता है कि विवेकशीलता की उपेक्षा करने पर अगले ही दिनों किन दुष्परिणामों को भुगतने के लिए बाधित होना पड़ेगा. यह वह भूल है, जिसके कारण मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक गलतियां करता है. फलत: उलझनों-समस्याओं-विपत्तियों का सामना भी उसे ही अधिक करना पड़ता है.

  • अनासक्ति का अर्थ

    अनासक्ति को आप सही संदर्भ में समझ लीजिए. मैं एक कथा बताता हूं. एक था लल्लू महतो और दूसरा था कल्लू महतो. दोनों सगे भाई थे. एक दिन ये लोग बाजार गये और वहां से आम की दो सौ कलमें खरीद लाये.

  • होली हो तो नये कपड़े में

    आज हम भारत के समाज को गरीब कह सकते हैं, हालांकि यहां बहुत अमीर भी मिलेंगे. लेकिन अमीरों के कारण भारत का समाज अमीर नहीं हो सकता. भारत में पहले बहुजन, समाज का पूरा ढांचा संपन्न था. संपन्न समाज में ही उत्सव प्रवेश कर सकता है, गरीब समाज में उत्सव प्रवेश नहीं कर सकता. गरीब समाज में उत्सव धीरे-धीरे विदा होता जाता है. गरीब समाज उत्सव भी मनाता है, तो कर्ज लेकर मनाता है. इसीलिए वह होली के लिए पिछले वर्ष के पुराने कपड़े बचा कर रखता है. होली के दिन फटे-पुराने कपड़ों को निकालता है, यानी जब होली ही खेलनी है, तो फटे-पुराने कपड़ों से खेली जा सकती है.

  • एक धार्मिक मन

    एक धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं है, जो भगवान को ढूंढ रहा है. धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं है, जो असंख्य रीति-रिवाजों-परंपराओं को मानता है. धार्मिक व्यक्ति वह व्यक्ति नहीं है, जो निर्बाध रूप से बिना किसी अंत के गीता, बाइबिल या कुरान की व्याख्या में लगा हुआ है, या निर्बाध रूप से जप कर रहा है, संन्यास धारण कर रखा है- ऐसा करनेवाले सारे व्यक्ति तथ्य से पलायन कर रहे हैं, भाग रहे हैं. धार्मिक व्यक्ति का संबंध संपूर्ण रूप से समाज को समझनेवाले व्यक्ति से है. वह समाज से अलग नहीं है.

  • प्रकृति का शात नियम

    हम सभी को ब्रह्मांडीय एकत्व भाव की ओर ही अग्रसर होना है. वह है- वसुधैव कुटुंबकम्. जीवन को सुगमता व शांति से झेलने के लिए सभी को कोई-ना-कोई या किसी-ना किसी आध्यात्मिक संबल की आवश्यकता होती ही है.

  • कौन है आपका पूज्य?

    आप जिसे पूजते हैं, उस पर विचार कर लेना. आपकी पूजा आपका मनोविश्लेषण है. किसे आप पूजते हैं? आपकी जीवन-दिशा कहां जा रही है? अगर आप सफल हो जायें, तो आप वही हो जायेंगे. अगर असफल हो जायें, तो बात अलग है. लेकिन असफल भी आप उसी मार्ग पर होंगे. अपने हृदय के कोने में इसकी जांच-पड़ताल कर लेना जरूरी है कि कौन है मेरा पूज्य?

  • जीत की ओर कदम है हार

    भारत में एक कहावत है- कार्य की सिद्धि सत्व से होती है, वस्तुओं से नहीं. किसी कार्य को सिद्ध करने के लिए सत्व गुण बढ़ना चाहिए और सत्व बढ़ाने के लिए क्या करें? सही आहार, सही व्यवहार और अपने मन को विश्राम देना सबसे पहले है.

  • विचार गढ़ता है छवि

    आप ने किसी खूबसूरत कार को देखा, उसकी पॉलि‍श को छुआ, उसके रूप-आकार को देखा. इससे जो उपजा वह संवेदन है. उसके बाद विचार का आगमन होता है, जो कहता है ‘कितना अच्छा हो कि यदि यह मुझे मिल जाये. कितना अच्छा हो कि मैं इसमें बैठूं और इसकी सवारी करता हुआ कहीं दूर निकल जाऊं’, तो इस सब में क्या हो रहा है? विचार दखल देता है, संवेदना को रूप आकार देता है.

  • प्रगति नहीं, अवगति!

    कर्म करने में मनुष्य स्वतंत्र है, किंतु फल प्राप्त करने में वह सृष्टि के नियमों के बंधनों में बंधा हुआ है. अन्य जीवधारी इस तथ्य को अपनी स्वाभाविक प्रेरणा से समझते हुए तदनुरूप आचरण करते रहते हैं, पर मनुष्य है जो तुरत-फुरत परिणाम मिलने में विलंब होने के कारण प्राय: चूक करता रहता है.

  • शिक्षा किसे कहते हैं?

    मैं परिभाषाएं देने के विरुद्ध हूं. परंतु शिक्षा के संबंध में यह कहा जा सकता है कि सच्ची शिक्षा वह है, जिसे मनुष्य की मानसिक शक्तियों का विकास हो. वह शब्दों को रटना मात्र नहीं है. वह व्यक्ति की मानसिक शक्तियों का ऐसा विकास है, जिससे वह स्वयमेव स्वतंत्रतापूर्वक विचार कर ठीक-ठीक निश्चय कर सके.

  • प्राणधारा का प्रवाह

    अस्तित्ववादी धारणा और आत्मवादी धारणा में दो बातें फलित होती हैं- एक है ज्ञान दर्शन और दूसरी है शक्ति. शक्ति के बिना ज्ञान दर्शन का उपयोग नहीं हो सकता. कर्मशास्त्रीय परिभाषा में कहा जा सकता है- जब तक अंतराय कर्म का क्षयोपशम नहीं होता, तब तक न ज्ञान का उपयोग हो सकता है और न दर्शन का उपयोग हो सकता है. न जाना जा सकता है और न देखा जा सकता है. जानने और देखने का आवरण नहीं है. ज्ञानवरण का क्षयोपशम है, दर्शनावरण का क्षयोपशम है.

  • अध्यात्म का कैप्सूल

    कई बार दवाई की एक छोटी गोली भी दवाई की बड़ी गोली से ज्यादा असरदार होती है. अपनी भारतीय संस्कृति में बहुत-सी ऐसी विधियां हैं, जो मनुष्य के जीवन से सारे दुखों को दूर करने में सहायक हैं और सुख-शांति एवं समृद्धि लाने में भी बहुत सहायक होती हैं. लेकिन, हम लोग आधुनिकता के सम्मोहन में धीरे-धीरे इन सारी परंपराओं को भूल रहे हैं.

  • जहां प्रभु, वहीं वृंदावन

    भक्तियोग में भक्त कृष्ण के अतिरिक्त और कोई इच्छा नहीं करता. शुद्धभक्त न तो स्वर्गलोग जाना चाहता है और न ब्रह्मज्योति से तादात्म्य या मोक्ष या भवबंधन से मुक्ति ही चाहता है. शुद्धभक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं करता. चैतन्यचरितामृत में शुद्धभक्त को निष्काम कहा गया है. उसे ही पूर्ण शांति का लाभ होता

  • ईश्वर परिपूर्ण है

    आप जो कुछ भी देखते हैं, वह ईश्वर है. आप जो कुछ भी सुनते हैं, वह ईश्वर है. आप जो कुछ चखते या सूंघते हैं, वह ईश्वर है. आप जो कुछ भी अनुभव करते हैं, वह ईश्वर है. यही ईश्वर का व्यक्त स्वरूप है. ईश्वर प्रकाशों का प्रकाश है. ईश्वर सर्वव्यापी बुद्धि और चेतना है.

  • भय का कारण है विचार

    कोई कैसे किसी चीज को पूरा का पूरा, संपूर्णता में देखे? कोई कैसे भय को पूरा का पूरा देखे, ना कि भय को विभिन्न रूप और आकारों में बंटा हुआ? कोई कैसे भय को पूरा का पूरा, संपूर्णता में देखे? कोई कैसे ‘मैं’, ‘अहं’ या ‘स्व’ को पूरा का पूरा, संपूर्णता में देखे? अहं जो विचार से बना है, जो विचार से अलग कर दिया गया है, विचार जो कि खुद टुकड़े-टुकड़े में बंटा हुआ है.

  • विश्व जाल, मन मकड़ियां

    अपने व्यापारी हिसाब-किताब करनेवाले विचारों को छोड़ दो. यदि तुम किसी एक वस्तु से भी अपनी आसक्ति तोड़ सकते हो, तो तुम मुक्ति के मार्ग पर हो. किसी वेश्या या पापी अथवा साधु को भेद-दृष्टि से मत देखो.

  • आत्मा हैं मन और शरीर

    आत्मा को देखने का पहला द्वार है- श्वास. भीतर की यात्रा का पहला द्वार है- श्वास. हम बाहर की ओर दौड़ता है. जब भीतर की यात्रा शुरू करनी होती है, तब प्रथम प्रवेशद्वार श्वास से गुजरना होता है. जब श्वास के साथ मन भीतर जाने लगता है, तब अंतर्यात्रा शुरू होती है.

  • शिक्षा की आवश्यकता

    हमारे अखाड़े के सामने अगर हम चार ईंट डाल दें, तो कुछ ही देर में वे ईंट गायब हो जायेंगे. हम यहां के पड़ों की छंटाई करके बाहर डालते हैं. एक घंटे के बाद आओ तो उन कटी डालों को यहां नहीं पाओगे. हम तो कहते हैं उठाओ, हमें खुशी होती है. उनके जीवन का यही काम है.

  • खेल की तरह कल्पना

    यदि तुम कल्पना के साथ बिना किसी कामना के खेलते हो, न कहीं पहुंचने के लिए, न कुछ पाने के लिए, बस एक खेल की तरह, तब तुम्हारी वह कल्पना कामना नहीं होती, बंधन नहीं होती. यदि तुम गंभीर हो गये, तो सारी बात ही चूक गये. तुम सोच ही नहीं सकते कि बिना कामना के कुछ किया जा सकता है. तुम तो अगर खेलते भी हो, तो कहीं पहुंचने के लिए, कुछ पाने के लिए, जीतने के लिए खेलते हो. यदि भविष्य में कुछ भी मिलनेवाला न हो तो तुम्हारा सारा रस खो जायेगा. तुम कहोगे, ‘फिर खेलें ही क्यों?’ हम इतने परिणाम-उन्मुख हैं कि हर चीज को साधन बना लेते हैं. भविष्य के लिए वर्तमान में काम करने को ही कामना कहते हैं.

  • सब पर कृपालु हैं भगवान

    चैतन्यचरितामृत में शुद्धभक्त को निष्काम कहा गया है. शुद्धभक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं करता. उसे ही पूर्ण शांति का लाभ होता है. उन्हें नहीं जो स्वार्थ में लगे रहते हैं. एक ओर जहां ज्ञानयोगी, कर्मयोगी या हठयोगी का अपना-अपना स्वार्थ रहता है, वहीं पूर्णभक्त में भगवान को प्रसन्न करने के अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा नहीं होती.

  • जीवन का हर क्षण पवित्र

    जब तुम किसी प्रतीक, काल व्यक्ति या कार्य को पवित्र मानते हो, तब तुम्हारा ध्यान अविभाजित और परिपूर्ण होता है. जब सभी चीजें सामान्य और एक जैसी हो रही होती हैं, तब तुम असजगता और जड़ता की ओर प्रवृत्त हो जाते हो और जैसे ही तुम किसी चीज को पवित्रता की दृष्टि से देखते हो, तुम्हारी जड़ता लुप्त हो जाती है. तुम फिर सजीव हो उठते हो. जब तुम अपने संपूर्ण मन और आत्मा को पवित्र कार्य में लगा देते हो, जब तुम्हारा हर कार्य पवित्र होने लगता है, तो तुम ईश्वर के साथ एक हो जाते हो. तब तुम्हारे जीवन का हर मिनट, हर एक जगह, हर कार्य पवित्र होते हैं और जिन व्यक्तियों से तुम मिलते हो.

  • एकांत-ध्यान नहीं है साधना

    साधना का अर्थ केवल एकांतवास या ध्यान नहीं होता. वह साधना का एक पक्ष है, लेिकन साधना का यह भी अर्थ होता है िक हम अपने मन में संतोष और शांित के भाव को चौबीस घंटे कायम रखें. असली साधना वह है. आप ध्यान करते हो तो अिधक-से-अिधक एक घंटे के िलए करोगे.

  • ध्यान और मौन

    जब आप अपना सिर क्षितिज को देखते हुए, दूसरी ओर घुमाते हैं, तो आप की आंखें एक वृहत आकाश देखती हैं, जिसमें धरती और आसमान की सारी चीजें नजर आती हैं. लेकिन यह रिक्त आकाश वहां बहुत ही सीमित हो जाता है, जहां आकाश से धरती मिलती है. हमारे मन का आकाश बहुत ही छोटा है, जिसमें हमारी सारी गतिविधियां घटित होती हैं. इसी सीमित आकाश में मन स्वतंत्रता ढूंढता है और हमेशा अपना ही बंदी बना रहता है.

  • पदों का दायित्व

    मनुष्य दुखी क्यों होता है? इसलिए कि वह अनुचित महत्त्वाकांक्षाएं पालता है. वह आवश्यकताएं कम करे और सीमित साधनों पर निर्वाह की सोचे, तो उतना दुखी नहीं रहेगा, जितना रहता है. स्वभावत: जीवन की आवश्यकताएं बड़ी सीमित और स्वल्प हैं. बुद्धिहीन और अनगढ़ काया वाले प्राणी शरीर यात्रा के साधन सरलतापूर्वक जुटा लेते हैं.

  • सच्ची प्रार्थना का अर्थ

    प्रार्थना के भीतर जाकर कोई प्रार्थना के बाहर नहीं आ सकता. मंदिर के भीतर जाकर कोई मंदिर के बाहर नहीं आ सकता, अगर सही-सही मंदिर के भीतर गया हो. क्योंकि फिर वह जहां होगा वहीं मंदिर होगा. वह जो करेगा वही प्रार्थना होगी. फिर जो भी उसके जीवन में होगा, सब प्रार्थनापूर्ण होगा.

  • समृद्धि और शिक्षा

    समृद्धि मनुष्य को सदा नम्रता के साथ रखती है. आज तुमने एक कमरा बना दिया, अगले साल एक बेडरूम जोड़ दो. इस साल तुमने फूस लगाया, अगले साल टिन लगा देना, इसके बाद एक बाथरूम बना दो. इसको समृद्धि कहते हैं. जो लोग रातों-रात अमीर बनना चाहते हैं, वे गलत रास्ते पर जा रहे हैं, क्योंकि संपत्ति आने पर दुर्गुण आयेंगे, व्यसन आयेंगे, बुराइयां आयेंगी, फिजुलखर्ची आयेगी.

  • अनन्य भाव से कृष्ण-चिंतन

    शुद्धभक्त सदैव कृष्ण के विभिन्न रूपों में से किसी एक की भक्ति में लगा रहता है. कृष्ण के अनेक स्वांश तथा अवतार हैं. जिनमें से भक्त किसी एक रूप को चुन कर उसकी प्रेमाभक्ति में मन को स्थिर कर सकता है.

  • संकल्प और इच्छा के बीच

    दो विचारधाराएं हैं. एक के अनुसार, आप अपना लक्ष्य रखते हैं और उसके लिए काम करते हैं. दूसरी के अनुसार, इस विश्वास के साथ कि ईश्वर जो करेगा, आपकी बेहतरी के लिए होगा, आप सब कुछ ईश्वर पर समर्पण कर देते हैं. दोनों विचारधाराएं एक-दूसरे की विरोधी लगती हैं, पर ऐसा नहीं है. संकल्प या लक्ष्य रखना अच्छा है, पर 24 घंटे हम उसी के बारे में नहीं सोचते रहते. बिना किसी ज्वर के उसके लिए कार्यरत रहते हुए उसको ईश्वर पर छोड़ देते हैं.

  • कारण और कर्म

    वास्तव में ऐसी कोई चीज नहीं, जिसे कि हम कर्म कहते हैं. कारण और प्रभाव दो अलग या भिन्न चीजें नहीं हैं. आज का प्रभाव ही कल का कारण है. ऐसा कोई अलग-थलग पड़ा हुआ कारण जैसा कुछ नहीं होता, जो प्रभाव पैदा करे.

  • क्षुद्रता को बाहर निकालो

    कृपण और क्षुद्र स्वभाव वालों काे जीवन में कभी आनंद या शांति प्राप्त नहीं होती. वे हमेशा ही परेशान रहते हैं, क्योंकि वे कंजूसी और लालची हो जाते हैं. जेब में सैकड़ों रुपयों के नोट होंगे, किंतु रेलवे स्टेशन पर कुली के साथ कुछ रुपयों के लिए निर्लज्जतापूर्वक आधे घंटे बहस करना उनका स्वभाव-सा हो जाता है. स्वयं स्वादिष्ट पदार्थ खायेंगे, लेकिन यदि नौकरों को उनका उपभोग करते हुए देख लें, तो उनका हृदया जलने लगता है.

  • अभी जागो और देखो

    वर्तमान क्षण में अभी जागो! यह केवल एक बहता हुआ क्षण नहीं है. वर्तमान क्षण में अनंत की गहराई है. पूरा अतीत और भविष्य वर्तमान में मौजूद है. आपका पूरा कृत वर्तमान क्षण का पूर्ण रूप से अनुभव करना ही होना चाहिए. किसको परवाह है कि आप कैसा महसूस करते हो?

  • द्वैत को ऐक्य करता है प्रेम

    हम अपनो से प्रेम करते हैं. जिसे हम अपना नहीं मानते, उससे प्रेम करना बहुत मुश्किल होता है. उससे दोस्ती भले ही हो सकती है, लेकिन उस प्रकार का प्रेम हम नहीं कर पायेंगे, जैसा प्रेम हम अपनों से करते हैं. हमारे गुरुजी कहते हें कि वही व्यक्ति अपने जीवन को सुधार सकता है, जो दूसरों के दुखों को समझता है. जो दूसरों के दुखों के प्रति संवेदनशील है और दूसरों को दुखों से मुक्त करने के लिए प्रयासरत है, वही व्यक्ति अपने जीवन को प्रगति के पथ पर आगे ले जा सकता है और अपने भीतर ईश्वर का अनुभव कर सकता है.

  • प्रकृति के कर्म

    जो मानव, युग चेतना से जुड़ कर सत्ययोगी तथा आत्मज्ञानी होकर दृष्टा बन हर घटना को सृष्टि के संपूर्णता वाले विधान से जोड़ कर देखता है, वह ही यह रहस्य जान पाता है. अब सबको अग्नि-परीक्षा से गुजरना ही होगा-आंतरिक बीमारियां, अग्नियां ऐसी कि कोई विज्ञान पकड़ न पाये. बाह्य अग्नियां, प्राकृतिक प्रकोप, भूचाल, दुर्घटनाएं, दावानल आदि. मनुष्य को यह सत्य एक क्षण को भी नहीं भुलना है कि हम सब यहां केवल माध्यम हैं.

  • आत्मा की उपस्थिति

    हम शरीर के प्रभाव में आकर आत्मा के जन्म-मरण आदि का इतिहास खोजते हैं. आत्मा शरीर की तरह कभी वृद्ध नहीं होती. अत: तथाकथित वृद्ध पुरुष भी अपने में बाल्यकाल या युवावस्था जैसी अनुभूति पाता है. शरीर के परिवर्तनों का आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. आत्मा वृक्ष या किसी भौतिक वस्तु की तरह क्षीण नहीं होती. आत्मा की कोई उपसृष्टि नहीं होती. शरीर की उपसृष्टि संताने हैं.

  • मानव सृजन का उद्देश्य

    संसार में प्रत्येक आस्तिक को मनुष्य जीवन की गरिमा और जिम्मेवारी समझनी चाहिए तथा उसी के अनुरूप अपने चिंतन तथा कर्त्तव्य का निर्धारण करना चाहिए. उसे अपनी विशेषताओं का उपयोग इसी महान प्रयोजन के लिए करना चाहिए. जीवन दर्शन की यह उत्कृष्ट प्रेरणा ईश्वर विश्वास के आधार पर ही मिलती है.

  • खुद को जानने के लिए

    अपने ही बारे में सीखने और जानने के लिए नम्रता की अत्यंत आवश्यकता होती है. अगर आप यह कहते हुए सीखना चाहते हैं कि मैं अपने को जानता हूं, तो वहीं पर आप अपने को सीखने-जानने की प्रक्रिया का अंत कर रहे हैं.

  • पूर्ण स्वराज का अर्थ

    स्वराज एक पवित्र शब्द है, जिसका अर्थ है स्वशासन. इसका अर्थ सब प्रकार के संयमों से मुक्ति नहीं है, जैसा प्राय: स्वाधीनता का अर्थ लगाया जाता है. पूर्ण स्वराज यानी अपने सर्वाधिक दीनहीन देशवासियों की स्वतंत्रता. मैं भारत को सभी पराधीनताओं से मुक्त कराने के लिए कटिबद्ध हूं. मुझे एक शासक के स्थान पर दूसरे शासक को लाने की इच्छा नहीं है.

  • अंतरबोध देता है ज्ञान

    सूर्य प्राचीन है, पर आज भी सूर्य की किरणें ताजी हैं. वे पुरानी या बासी नहीं होती हैं. यही पानी के साथ भी है. गंगा नदी कितनी प्राचीन है, पर उसका पानी आज भी ताजा है. इसी प्रकार, ज्ञान वह है जो हमारे जीवन पर लागू होता है, जो प्राचीन है, फिर भी नवीन और ताजा है. ज्ञानी लोग नये और पुराने को जोड़ना और जीवन को जीना जानते हैं.

  • ईश्वरीय स्मृतिरूपी योग

    भगवान की स्मृति में स्थित होकर कर्म करनेवाला ही स्थितिप्रज्ञ अर्थात् अटल निश्चयवाला कहलाता है. उसमें ही दिव्य बुद्धि, जो कि कर्तव्य की पारखी होती है, का उदय होता है. योग में स्थित हुआ मनुष्य ही सभी सांसारिक रसों के आकर्षणों से ऊपर उठ कर प्रभु ही के प्रेम-रस, आत्म-रस तथा कर्मातीत स्थिति के परम-रस में लवलीन रहता है.

  • कर्म को सेवा का रूप दो

    सेवा किसलिए करनी चाहिए? स्वामी शिवानंद जी का मानना था कि मनुष्य जीवन भर कर्म करता है, जिसका प्रयोजन स्वार्थपूर्ति होता है. लेकिन, जब उसी कर्म को हम स्वार्थपूर्ति के लिए नहीं, बल्कि परोपकार की भावना से जुड़ कर करें, तब वही कर्म सेवा का रूप ले लेता है.

  • समष्टिगत देवता

    इस सृष्टि रचना में सर्वप्रथम प्रकृति व चेतन ब्रह्म के संयोग से पांच भूतों की उत्पत्ति हुई तथा इन पांचों भूतों के संयुक्त भाव के साथ चेतनाशक्ति के कारण ही अंत:करण का निर्माण हुआ, जिसमें संकल्प-विकल्प के कारण उसे मन कहा गया. संकल्प-विकल्प के कारण जो अनिश्चय होता है, उसका निश्चय करनेवाली शक्ति का नाम बुद्धि है.

  • फूलों की तरह हैं उपदेश

    उपदेश फूलों की तरह हैं, वे बोझ नहीं होते. नानक एक गांव में आकर ठहरे. गांव बड़े फकीरों का गांव था, सूफियों की बस्ती थी. सूफियों के प्रधान ने एक कटोरे में दूध भर कर भेजा. कटोरा पूरा भरा था. नानक बैठे थे गांव के बाहर एक कुएं के पाट पर. मरदाना और बाला गीत गा रहे थे.

  • सतत अभ्यास का महत्व

    प्रतिभा के विकास में बुद्धि आवश्यक तो है, लेकिन सर्वसमर्थ नहीं. बुद्धिमान होते हुए भी विद्यार्थी पाठ याद न करे, पहलवान व्यायाम छोड़ दे, संगीतज्ञ, क्रिकेटर अभ्यास छोड़ दें, चित्रकार तूलिका का प्रयोग न करे, कवि भाव-संवेदनाओं को संजोना छोड़ बैठे, तो उसे प्राप्त क्षमता भी क्रमश: क्षीण होती जायेगी. जबकि, बुद्धि की दृष्टि से कम परंतु सतत अभ्यास में मनोयोगपूर्वक लगे व्यक्ति अपने भीतर असामान्य क्षमताएं विकसित कर लेते हैं.

  • ‘जो है’ का वास्तविक अवलोकन

    जब हम आलोचना करते हैं या किसी चीज के बारे में किसी तरह के फैसले करने लगते हैं, तो हम उसे स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते, ना ही उस समय जब हमारा दिल दिमाग बिना रुके बक-बक में ही लगा रहता है. तब हम ‘जो है’ का वास्तविक अवलोकन नहीं कर पाते, हम अपने बारे में अपने पूर्वानुमान ही देख पाते हैं, जो अपने बारे में स्वयं हमने ही बनाये हैं. हममें से प्रत्येक ने अपने बारे में एक छवि बना रखी है कि हम क्या सोचते हैं या हमें क्या होना है और यह छवि ही हमें हमारी वास्तविकता के दर्शनों से परे रखता है.

  • ऊर्जा का प्रतीक है सूर्य

    हमारी सृष्टि का आधार सूर्य ही है. सूर्य के चारों ओर यह पृथ्वी नित्य भ्रमण कर रही है. इसी के आधार पर ऋतुओं का तथा दिन-रात का परिवर्तन होता है. वनस्पतियों का तथा औषधियों का भी सूर्य के बिना अस्तित्व समाप्त हो जाता है. सूर्य ऊर्जा का प्रतीक है. परमात्मा ने बहुत सोच-समझ कर इसका निर्माण किया होगा. सूर्य की शक्ति से ही विश्वभर में ऊर्जा का सागर लहरा रहा है. हम शरीर के जिस अंग के माध्यम से सूर्य से ऊर्जा ग्रहण करते हैं, हमारे उस अंग में शक्ति बढ़ जाती है.

  • ज्ञान-तंतुओं की क्षमताएं

    हमारे शरीर में अरबों-खरबों न्यूरॉन हैं, जीव कोशिकाएं हैं. ये न्यूरॉन हमारी अनेक प्रवृत्तियों का नियमन करते हैं. जो संकल्प न्यूरॉन तक पहुंच जाता है, वह सफल हो जाता है. न्यूरॉन बड़े-बड़े काम संपादित करते हैं. इनकी कार्य-प्रणाली को समझना बहुत ही कठिन है. अरबों-खरबों की संख्या में ये ज्ञान-तंतु हमारे मस्तिष्क में बिखरे पड़े हैं. इनका मन की शक्ति के जागरण में बहुत बड़ा उपयोग है.

  • पुनर्जन्मवाद का नियम

    हमारी आत्मा एक ऐसा वृत्त है, जिसकी परिधि कहीं भी नहीं है, पर जिसका केंद्र किसी शरीर में है. मृत्यु इस केंद्र का स्थानांतर मात्र है. परमात्मा एक ऐसा वृत्त है, जिसकी परिधि कहीं भी नहीं है और जिसका केंद्र सर्वत्र है.

  • आध्यात्मिक विचारधारा

    हर साल मैं किसी बेरोजगार आदमी को ढूंढ लेता हूं और अपने गुरु के जन्मदिन पर उसके लिए दुकान खोल देता हूं. एक छोटा-सा जनरल स्टोर, जहां बिस्किट, चॉकलेट, पेन-पेंसिल जैसी छोटी-मोटी चीजें रखवा देता हूं. ऐसी ही एक दुकान एक अपाहिज के लिए खुलवायी. एक दिन मैं उसकी बेटी से मिला.

  • साधना के लिए मार्गदर्शन

    साधना के मार्ग में बहुत उतार-चढ़ाव आते हैं. उन्हें तटस्थ भाव से पार करने के लिए हर गतिविधि के समुचित मूल्यांकन की अपेक्षा है. अन्यथा अकस्मात उत्पन्न होनेवाली स्थिति में साधक का चित्त डांवाडोल हो सकता है. अस्थिरता की स्थिति में वह साधक अपनी समस्या का समाधान पा लेता है, जिसे गुरु का सानिध्य प्राप्त होता है. अपने आप साधना करनेवाला उलझ जाता है.

  • ज्ञान की शालीनता

    बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो स्वयं अज्ञानी होते हुए भी अपने को सर्वज्ञ समझने का अहंकार पाले रहते हैं. इस अहंकार के कारण ही वे दूसरों को अपने कंधों पर ले जाने को तैयार रहते हैं. इसका परिणाम यह होता है कि एक अंधा, दूसरे अंधे का अगुआ बनते हैं और दोनों ही गड्ढे में गिर पड़ते हैं.

  • डर का जनक है विचार

    हमारे भीतर डर का जन्म विचार से होता है. मैं अपनी नौकरी व काम-धंधा छूट जाने के बारे में या इसकी आशंका के बारे में सोचता हूं और यह सोचना, यह विचार डर को जन्म देता है. इस प्रकार विचार खुद को समय में फैला देता है, क्योंकि विचार समय ही है. मैं कभी किसी समय जिस रोग से ग्रस्त रहा, मैं उस विषय में सोचता हूं, क्योंकि उस समय का दर्द है.

  • श्रद्धा और अश्रद्धा

    किसी ने मुझसे पूछा-जब बुद्धि असफल हो जाती है, तो क्या हम श्रद्धा का सहारा लें. मैंने कहा- श्रद्धा भी बुद्धि है. श्रद्धा बौद्धिक होती है. हम समझते हैं कि अश्रद्धा बौद्धिक होती है और श्रद्धा बौद्धिक नहीं होती है.

  • ब्रह्म की शक्ति और आत्मा

    ब्रह्म एक चेतन शक्ति है. ईश्वर भी वही चेतन शक्ति है तथा शरीर में वही चेतन शक्ति आत्मा कहलाती है. ब्रह्म शुद्ध चेतनतत्व है तथा ईश्वर उस ब्रह्म की मायाशक्ति से आवृत्त है. इस मायारूपी उपाधि के कारण ही उस ब्रह्म की संज्ञा ईश्वर हो जाती है अन्यथा दोनों में कोई भेद नहीं है. जिस प्रकार एक व्यक्ति अपने पुत्र के लिए पिता, पत्नी के लिए पति, रेल में यात्रा करने पर यात्री, उपासना करने पर भक्त, मांग कर खाने पर भिखारी आदि कहलाता है, ये उसकी उपाधियां हैं, जिससे उसको विभिन्न नाम दे दिये हैं, किंतु वास्तव में वह व्यक्ति तो एक ही है.

  • नये साल का संकल्प

    दूसरों का सहारा तकने की अपेक्षा हमें अपना सहारा तकना चाहिए, क्योंकि वे सभी साधन अपने भीतर प्रचुर मात्रा में भरे पड़े हैं, जो सुव्यवस्था और प्रगति के लिए आवश्यक हैं. यदि सूझ-बूझ की वस्तुस्थिति समझ सकने योग्य यथार्थवादी बनाने की साधना जारी रखी जाये, तो सबसे उत्तम परामर्शदाता सिद्ध हो सकती है.

  • ज्ञानवाही और क्रियावाही

    हमारे शरीर में ज्ञानवाही और क्रियावाही दोनों नाड़ी-मंडल हैं. यदि इन दोनों मंडलों को निकाल दिया जाये, तो न ज्ञान होगा न क्रिया होगी. हमारी चेतना और शक्ति- इन दोनों के संभाव्य केंद्र इस नाड़ी-संस्थान में हैं. आप यह न भूलंे कि हमारे अस्तित्व के दो मूल स्रोत हैं- चेतना और शक्ति. उनका संवादी केंद्र है हमारा स्थूल शरीर. सूक्ष्म शरीर में जो स्पंदन होंगे, उनके संवादी केंद्र इस स्थूल शरीर में हैं. बिना संवादी केंद्रों के अभिव्यक्ति नहीं हो सकती. अभिव्यक्ति के लिए माध्यम चाहिए. क्योंकि जब भीतर से बाहर आना होता है, तब वह बिना माध्यम के नहीं हो सकता. यह माध्यम है- नाड़ी संस्थान.

  • ज्ञान-ध्यान जरूरी

    जो ध्यान करते हैं, उनके सानिध्य में सब वैर छूट जाता है. ध्यान और साधना से हिंसा को खत्म किया जा सकता है. योगासूत्र में दिया गया ज्ञान, तत सानिध्य वैर त्याग:, ध्यान करनेवालों के सानिध्य में किसी भी तरह का वैर छूट जाता है.

  • पैदा होने का उद्देश्य

    आज के समय में विषय बिल्कुल विपरीत हो गया है. राह चलते अथवा आते-जाते आपको हजारों-हजार ऐसे लोग मिल जायेंगे, जो केवल दूसरों के पास दौड़ते ही रह जाते हैं. राजनीति में भी देखें, इस दल के नेता उस दल वालों के सिर फोड़ने पर उतारू रहते हैं. ऐसे विषय में नेता लोग कुछ नहीं करते, उनके पीछे-पीछे दौड़नेवाले जो लोग हैं, बस वही सारा काम कर रहे हैं. उनका जीवन केवल पीछे-पीछे दौड़ने और दूसरे का सिर फोड़ने में ही व्यतीत हो रहा है.

  • हारे को हरिनाम

    जिस दिन तुम्हारा अहंकार परिपूर्ण रूप से गिर जाता है और तुम्हें लगता है कि मेरे किये कुछ भी न होगा, क्योंकि मेरे किये अब तक कुछ न हुआ; जब तुमने कुछ किया और हर बार असफलता हाथ लगी, जब कर-करके तुमने सिर्फ दुख ही पाया, कर-करके नर्क ही बनाया और कुछ न बनाया.

  • यज्ञों का प्रयोजन

    यह धरातल नित्य आकाश या ब्रह्म आकाश में है. हमारे द्वारा किये गये यज्ञों से संसार से पापकर्मों से विलग हुआ जा सकता है. जीवन में इस प्रगति से मनुष्य न केवल सुखी बनता है अपितु अंत में निराकार ब्रह्म के साथ तादात्म्य द्वारा भगवान कृष्ण की संगति प्राप्त करता है.

  • एकाग्रता की शक्ति

    एकाग्रता समस्त ज्ञान का सार है. उसके बिना कुछ नहीं किया जा सकता. साधारण मनुष्य अपनी विचार-शक्ति का 90 प्रतिशत अंश व्यर्थ नष्ट कर देता है और इसलिए वह निरंतर भारी भूलें करता रहता है. प्रशिक्षित मनुष्य अथवा मन कभी कोई भूल नहीं करता. जब मन एकाग्र होता है और पीछे मोड़ कर स्वयं पर ही केंद्रित कर दिया जाता है, तो हमारे भीतर जो भी है, वह हमारा स्वामी न रह कर हमारा दास बन जाता है.

  • महापाप है अनिष्ट करना

    तामस तप में अज्ञानता होती है. मूढ़ आदमी तपस्या तो करता है, किंतु वह ठीक विधि से नहीं करता. उसके द्वारा किया जानेवाला तप तामस तप होता है. इस तप में शरीर को खूब कष्ट दिया जाता है, परंतु तपस्या में विवेक नहीं होता है.

  • सूक्ष्म शरीर की महत्ता

    हमारे स्थूल शरीर में जो क्रियाएं हो रही हैं, विज्ञान उनको जानता है. किंतु वह यह नहीं जानता कि वे क्रियाएं क्यों हो रही हैं. वह यदि इस बात को समझ पाता कि स्थूल शरीर से आगे सूक्ष्म शरीर का भी अस्तित्व है, जिसके द्वारा सारी व्यवस्थाएं हो रही हैं, जो एक कंट्रोल-रूम की तरह है, जो सारे नियंत्रण कर रहा है, तो बहुत सारी समस्याएं सुलझ जातीं. शरीर नामकर्म अनेक शरीरों का निर्माण करता है.

  • तनाव के कारण हम स्वयं

    यदि तुम्हारे जीवन में सिर्फ सुखद घटनाएं ही मिलें, तो तुम्हारा पूरा जीवन विरक्ति से गतिहीन हो जायेगा. तब तुम पत्थर-से बन जाओगे. इसलिए तुम्हें सचेतन रखने के लिए प्रकृति तुम्हें समय-समय पर छोटी-छोटी चुभन देती रहती है. अकसर हम जीवन में दूसरों पर दोष लगाते हैं.

  • विचार छवि बनाता है

    हम वैचारिकता की पूजा करते हैं. जितना ज्यादा और तीव्रता से हम सोचते हैं, उतने ही बड़े माने जाते हैं. सभी दार्शनिकों ने असंख्य संकल्पनाएं दी हैं. पर यदि हम अपने ही भ्रम का निरीक्षण करें, अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में संकीर्ण ढंग से देखने के रवैये को देखें, घर पर रोजमर्रा की दिनचर्या में देखें. इन सब के प्रति जागरूक रहें, तो देखें कि कैसे विचार अविरत समस्याएं बनाने में ही लगा रहता है. विचार छवि बनाता है और छवि बांटती है. यह देखना बुद्धिमत्ता है.

  • धर्म का सच्चा पालक

    एक राजा थे शिबि. वे बहुत ही नेक और न्यायप्रिय राजा थे. देवराज इंद्र और अग्निदेव ने राजा शिबि की परीक्षा लेने का निर्णय लिया. इंद्र एक बाज तथा अग्नि एक कबूतर का रूप बन कर उस स्थान पर पहुंच गये, जहां राजा शिबि यज्ञ कर रहे थे. शिबि यज्ञ की वेदी पर बैठे हुए थे कि अचानक एक कबूतर उनकी गोद में आ गिरा. एक बाज उसका पीछा कर रहा था.

  • बुद्धपुरुषों संग ध्यान

    यदि किसी बुद्धपुरुष के वचनों को पूरा-पूरा समझना हो, तो उसे ध्यान के द्वारा ही समझा जा सकता है. हालांकि, ध्यान के बिना भी उन वचनों के अर्थ की थोड़ी-थोड़ी झलक मिल सकती है.

  • परम पुरुषोत्तम भगवान

    यदि हम अस्वस्थ हैं, तो हम मनमाने ढंग से या अपने किसी मित्र की सलाह से कोई औषधि नहीं ले सकते. किसी औषधि का सेवन लिखे हुए निर्देशों या कुशल चिकित्सक के आदेश के अनुसार ही करना होता है. इसी प्रकार भगवद्गीता को इसके वक्ता द्वारा दिये गये निर्देशानुसार ही ग्रहण या स्वीकार करना चाहिए. भगवद्गीता के वक्ता भगवान श्रीकृष्ण हैं.

  • मुक्ति के लिए संघर्ष

    एक परमाणु से लेकर मनुष्य तक, जड़ तत्व के अचेतन प्राणहीन कण से लेकर इस पृथ्वी की सर्वोच्चता-मानवता तक, जो कुछ हम इस िवश्व में देखते हैं, वे सब मुिक्त के िलए संघर्ष कर रहे हैं. वास्तव में यह समग्र िवश्व इस मुिक्त के िलए संघर्ष का ही परिणम है.

  • देश के कायाकल्प के लिए

    हमारा मानना है कि देश का शासन सरकार करती है, पर देश की उन्नति सरकार के बस की बात नहीं है. राष्ट्र और समाज की उन्नति के लिए राष्ट्र में संस्थाओं का जन्म होना चाहिए. हमारे देश में ऐसी संस्थाओं की बहुत कमी है. लोग शिक्षा, सुरक्षा, पानी, बीज, अस्पताल, सब चीजों के लिए सरकार पर जो निर्भर रहते हैं, वह पद्धति गलत है.

  • सात्त्विक त्याग

    जो व्यक्ति एक परिवारवाला होता है, उसके ऊपर अपने परिवार का दायित्व भी होता है. वह यदि गृहस्थ के दायित्व को छोड़ दे, तो उचित बात नहीं होती. घर के प्रमुख व्यक्ति पर अर्थार्जन का भी दायित्व होता है. यदि वह अर्थार्जन नहीं करता है और घर में निठल्ला बैठा रहता है, तो वह व्यक्ति अपने कर्तव्य से च्युत हो जाता है. संसार में कर्तव्य को निभाना बड़ी बात है.

  • जीवन में सच्ची साधना

    मनुष्य विधि-व्यवस्था तोड़ता-छोड़ता रहता है, पर ईश्वर के लिए यह संभव नहीं कि अपनी बनायी कर्मफल व्यवस्था का उल्लंघन करे या दूसरों को ऐसा करने के लिए उत्साहित करे. तथाकथित भक्त लोग ऐसी ही आशा किया करते हैं. अंतत: उन्हें निराश होना पड़ता है.

  • वाक्शक्ति का रूप

    वाक्शक्ति से संपन्न व्यक्ति जब बोलता है, तब सुननेवाले को लगता है कि मानो वह दूध पी रहा है, मधु चाट रहा है. शब्द इतने मीठे होते हैं. हर व्यक्ति इस शक्ति को प्राप्त कर सकता है. इसके लिए उसे संयम अपनाना होगा और अपनी जिह्वा को पवित्र बनाना होगा. एक राजा एक आचार्य के पास आकर बोला- गुरुदेव! देवताओं की आयु बहुत लंबी होती है.

  • आंतरिक अभिषेक

    अभिषेक शिव-पूजा का एक अभिन्न अंग है. इसके बिना शिव-आराधना अधूरी है. अभिषेक के दौरान विशेष लय और सुर के साथ रुद्रीपाठ, पुरुषसुक्त पाठ, महामृत्युंजय जप आदि किये जाते हैं. सोमवार भगवान भगवान शिव का विशेष महत्वपूर्ण दिन है और प्रदोष का दिन बहुत पवित्र माना जाता है. इन दिनों में भक्त भगवान शिव की विशेष आराधना करते हैं.

  • भारत की सेवा का अर्थ

    हमने नियति को मिलने का एक वचन दिया था, और अब समय आ गया है कि हम अपने वचन को निभाएं. इतिहास के आरंभ के साथ ही भारत ने अपनी अंतहीन खोज प्रारंभ की, और ना जाने कितनी ही सदियां इसकी भव्य सफलताओं और असफलताओं से भरी हुई हैं. भारत ने कभी इस खोज से अपनी दृष्टि नहीं हटाई और कभी भी अपने उन आदर्शों को नहीं भूला, जिसने इसे शक्ति दी.

  • हमारी आदतों का द्वंद्व

    बहुत से लोग शारीरिक रूप से असंवेदनशील हैं, क्योंकि जरूरत से ज्यादा भोजन करते हैं, धूम्रपान करते हैं, और कई तरह के ऐंद्रिक रसों में आकंठ डूबे हैं. लेकिन इस तरह तो मन कुंद ही होता है.

  • रोशनी का त्योहार दीपावली

    यह त्यौहार बहुत रूपों में शुभ है. इस दिन यदि किसी को धन की जरूरत हो, तो उसके घर लक्ष्मी आती है. अगर किसी को सेहत चाहिए, तो शक्ति आती है. अगर किसी को शिक्षा चाहिए, तो सरस्वती उसके घर पधारती हैं. दीपावली रोशनी का त्यौहार है. दीपावली पर शहर और गांव हजारों दीयों की रोशनी में जगमगा जाते हैं. मगर यह सिर्फ बाहर दीये जलाने का उत्सव नहीं है, आपको अपने अंदर रोशनी लानी होगी. रोशनी यानी स्पष्टता.

  • ससीम एवं असीम कृष्ण

    भगवान कृष्ण असीम तथा ससीम को नियंत्रित करते हैं, किंतु वे इस जगत से विलग रहते हैं. वे एक साथ ससीम तथा असीम को वश में रख सकते हैं. तो वे भी उनसे पृथक रहते हैं.

  • नवीनता अतिआवश्यक

    जो नियम और कानून तात्कालिक सामाजिक स्थिति पर पूर्णतया आधारित हैं, उन्हें देश और काल की परिवर्तित परिस्थितियों के अनुसार अवश्य बदलना चाहिए. तभी समाज की प्रगति सुनिश्चित हो पायेगी. अगर हम पुरातन नियमों में ही बंधे रहे, तो हमारे समाज की प्रगति नहीं हो सकती.

  • भ्रष्ट करती है महत्वाकांक्षा

    जब तक भी कुछ हासिल करने की इच्छा है, तब तक वहां पर क्षोभ, गुस्सा, शोक, भय होगा. अमीर होने की आकांक्षा, यह या वह होने की महत्वाकांक्षा तभी गिर सकती है, जब हम इस शब्द में निहित सड़ांध या महत्वाकांक्षा की भ्रष्ट प्रकृति को समझ लें.

  • अतिमानव एवं अतिमानस

    विकास की मानवीय परत में उभरते ही मनुष्य को आत्मबोध की नयी उपलब्धि हस्तगत होती है. उसके भीतर रहनेवाली चेतना मनुष्य को ऊंचा उठाती, नीचे गिराती है. अन्य प्राणियों की तरह मात्र निर्वाह ही उसकी एकमात्र आवश्यकता नहीं है.

  • आदर्श पाने का यत्न करो

    आदर्श बहुत से हैं. मुझे कोई अधिकार नहीं कि मैं आपको बताऊं कि आपका आदर्श क्या होना चाहिए, या कि आपके गले जबरदस्ती कोई आदर्श मढ़ दूं मेरा तो यह कर्तव्य होगा कि आपके सम्मुख मैं इन विभिन्न आदर्शों को रख दूं, और आपको अपनी प्रकृति के अनुसार जो आदर्श सबसे अधिक अनुकूल जंचे, उसे ही आप ग्रहण करें और उसी ओर अनवरत प्रयत्न करें.

  • प्रशंसा और आलोचना

    आलोचना करने पर आदमी अपना बचाव ही करेगा, लेकिन जब उसको बोला जायेगा कि तुम बहुत अच्छा गाते हो, उस वक्त वह फूल जायेगा, उसमें अहंकार आ जायेगा. आदमी की ये दो बहुत बड़ी समस्याएं हैं, आलोचना में बचाव और प्रशंसा में अहंकार.

  • जीवन का आनंद प्रार्थना

    प्रार्थनाएं जरूर परिणाम लाती हैं, मगर तभी जब परिणाम की कोई आकांक्षा नहीं होती. यह विरोधाभास तुम्हें समझाना ही होगा. यह धर्म की अंतरंग घटना है. जिसने मांगा, वह खाली रह गया. जिसने नहीं मांगा, वह भर गया. प्रार्थना हमें सिखाई ही गयी हैं मांगने के लिए. जब मांगना होता है कुछ, तभी लोग प्रार्थना करते हैं, नहीं तो कौन प्रार्थना करता है?

  • मेहनत की संपत्ति

    एक शिक्षाप्रद कहानी है. दो भाई थे. दोनों को अपनी पैतृक संपत्ति में समान भाग मिला था. किंतु कुछ समय बाद एक भाई दरिद्र हो गया और दूसरे ने अपनी पैतृक संपत्ति दसगुनी बढ़ा ली.

  • कृष्ण का व्यक्तिगत तेज

    अपनी निजी विधि का निर्माण करके कोई स्वरूपसिद्ध नहीं बन सकता है. गीता का कथन है- धर्मपथ का निर्माण स्वयं भगवान ने किया है. अतएव मनोधर्म या शुष्क तर्क से सही पद प्राप्त नहीं हो सकता है. न ही ज्ञानग्रंथों के स्वतंत्र अध्ययन से कोई आध्यात्मिक जीवन में उन्नति कर सकता है. ज्ञान प्राप्ति के लिए उसे प्रामाणिक गुरु की शरण में जाना ही होगा.

  • अचेतन का विश्लेषण

    अचेतन में अतीत का जबरदस्त जोर रहता है, जो आपको एक विशेष दिशा में धकेलता है. अब अचेतन से अतीत को तुरंत ही कैसे साफ किया जाये? विश्लेषक सोचता है कि विश्लेषण द्वारा, जांच पड़ताल करके, इसके घटकों को तलाश करके, स्वीकार करके, या सपनों की व्याख्या इत्यादि करके अचेतन को थोड़ा-थोड़ा करके, टुकड़ों में या, यहां तक कि, पूरी तरह साफ किया जा सकता है, ताकि हम एक सामान्य आदमी रहें.

  • सृष्टि शिरोमणि मानव

    विकास की मानवीय परत में उभरते ही मनुष्य को आत्मबोध की नयी उपलब्धि हस्तगत होती है. उसके भीतर रहनेवाली चेतना मनुष्य को ऊंचा उठाती, नीचे गिराती है. अन्य प्राणियों की तरह मात्र निर्वाह ही उसकी एक मात्र आवश्यकता नहीं है. वरन व्यक्तित्व का स्तर उठा कर जीवन सज्जा को, अनेक उपलब्धियों से अलंकृत करना भी एक विशिष्ट उद्देश्य है.

  • पुनर्जन्मवाद का नियम

    हमारी आत्मा एक ऐसा वृत्त है, जिसकी परिधि कहीं भी नहीं है, पर जिसका केंद्र किसी शरीर में है. मृत्यु इस केंद्र का स्थानांतर मात्र है. परमात्मा एक ऐसा वृत्त है, जिसकी परिधि कहीं भी नहीं है और जिसका केंद्र सर्वत्र है. जब हम शरीर के इस समीप केंद्र से बाहर निकलने में समर्थ हो सकेंगे, तभी हम परमात्मा की- अपने वास्तविक स्वरूप की उपलब्धि कर सकेंगे. आत्मा न कभी आती है, न जाती है, यह न तो कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है.

  • असूया और अनुसूया

    कोई-कोई व्यक्ति ऐसा होता है कि यदि उसको बढ़िया से बढ़िया चीज दो, फिर भी उसे उसमें त्रुटि ही नजर आती है. ऐसी विचारधारा को असूया कहते हैं. ऐसे व्यक्ति दिव्यज्ञान नहीं जान सकते. ‘असूया’ का अर्थ है दोष ढूंढ़ना. जैसे तुम्हारी किसी से मित्रता है और दस वर्षों बाद कोई दोष देख कर तुम इसे तोड़ना चाहते हो. जब तुम तोड़ते हो, तुम पूरे संबंध में कुछ अच्छा नहीं देखते, त्रुटियां ही त्रुटियां खोजते हो. यह असूया है.

  • आत्म-निरीक्षण

    इस दुनिया में कोई आदमी ऐसा नहीं है, जो अपने को देख सकता है. हां, दूसरों को देखना सबको आता है. हमको मालूम है कि तुम्हारा चेहरा कैसा है, तुम्हारे बाल कैसे हैं, तुम्हारी नाक कैसी है, तुम कैसा बोलते हो, मीठा बोलते हो या कड़वा, अच्छा गाते हो या खराब, हम