• जन्मदिन विशेष : राष्ट्रीयता माखन लाल चतुर्वेदी के काव्य का कलेवर एवं रहस्यात्मक प्रेम उसकी आत्मा

    बचपन में एक कविता पढ़ी थी – चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं........इस कविता को पढ़ते – पढ़ाते हमारे हिंदी के अध्यापक काफी भाव विभोर हो उठते थे. अभी पुलवामा हमले के बाद मुझे ऐसा लगा कि शायद इसी दिन के लिए इस कविता की रचना की गयी होगी. यह कविता कालजयी हो गयी है. तभी अचानक इस कविता के जनक, साहित्य जगत के प्रखर कवि पंडित माखनलाल चतुर्वेदी जी की याद आ गयी. चार अप्रैल 1889 को मध्यप्रदेश के होशंगाबाद में इनका जन्म हुआ था .

  • पाश की पुण्यतिथि : सबसे खतरनाक होता है...

    आज क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह संधू जिन्हें हम ‘पाश’ के नाम से ज्यादा जानते हैं उनकी जयंती है. वे पंजाबी कवि और क्रांतिकारी थे, उनके शब्दों में क्रांति की आग थी, आज उनकी पुण्यतिथि पर पढ़ें उनकी कुछ चुनिंदा कविताएं-

  • जयंती चार मार्च पर विशेष : फणीश्वर नाथ रेणु का कथा-संसार कई रहस्यों को खोलता है...

    हिंदी के कालजयी कथाकार स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु को पहला आंचलिक कथाकार माना जाता है. हिंदी कहानी में देशज समाज की स्थापना का श्रेय उन्हें प्राप्त है. उनके उपन्यास ''मैला आंचल'', ''परती परिकथा'' और उनकी दर्जनों कहानियों के पात्रों की जीवंतता, सरलता, निश्छलता और सहज अनुराग हिंदी कथा साहित्य में संभवतः पहली बार घटित हुआ था. हिंदी कहानी में पहली बार लगा कि शब्दों से सिनेमा की तरह दृश्यों को जीवंत भी किया जा सकता है.

  • डॉ नामवर सिंह के निधन पर रास के उपसभापति हरिवंश ने कहा, ज्ञान की दुनिया में हमेशा जीवंतता के साथ रहेंगे मौजूद

    नयी दिल्ली : हिंदी साहित्य के प्रख्यात आलोचक डॉ नामवर सिंह के निधन पर राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने गहरा दु:ख जताया है. उन्होंने अपने शोक संदेश में कहा है कि नामवर सिंह का जाना हिंदी साहित्य समेत संपूर्ण भारतीय साहित्य जगत के लिए एक बड़ी क्षति तो है ही, यह निजी क्षति भी है. डॉ सिंह से वर्षों से निकटवर्ती और आत्मीय संबंध रहा.

  • श्रद्धांजलि : आज हिंदी आलोचना अपना शिखर पुरुष खोकर और दरिद्र हुई...

    हिंदी साहित्य के शिखर पुरुष नामवर सिंह के निधन से साहित्य जगत में शोक है. एक सन्नाटा घर कर गया, किसी को अनाथ होने का बोध है तो कोई गुरु के जाने से मर्माहत. नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य में ‘दूसरी परंपरा की खोज'' की. उन्होंने आलोचना के माध्यम से हिंदी साहित्य को नयी दिशा दी. उनके निधन पर प्रभात खबर डॉट कॉम के साथ बातचीत में झारखंड-बिहार के कुछ प्रसिद्ध साहित्यकारों ने अपनी प्रतिक्रिया दी.

  • आखिर क्यों नामवर सिंह ने खुद को कहा था, मैं फरमाइशी लेखक हूं...

    नामवर आलोचना में शास्त्रीय शब्दावली घुसने नहीं देते. उनकी आलोचना ‘सजर्नात्मक’ है. आलोचना उनके लिए ‘एकेडमिक कर्म’ न होकर ‘सामाजिक कार्य’ है. ‘कॉमन रीडर’ उनके लिए महत्वपूर्ण है, न कि विश्वविद्यालयों के ‘हिंदी प्रोफेसर.’

  • कवि प्रदीप की जयंती : सूरज रे जलते रहना !

    हिंदी कविता और हिंदी सिनेमा में भी देशभक्ति और मानवीय मूल्यों का अलख जगाने वाले गीतकारों में कवि स्व प्रदीप उर्फ़ रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी का बहुत ख़ास मुक़ाम रहा है. वे अपने दौर में हिंदी कविता और कवि सम्मेलनों के नायाब शख्सीयत रहे हैं. उनकी जनप्रियता ने सिनेमा के लोगों का ध्यान उनकी तरफ आकर्षित किया. सिनेमा में उनकी पहचान बनी 1943 की फिल्म ''किसमत'' के गीत ''दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है'' से.

  • शरतचंद्र जिन्होंने अपनी रचनाओं में नारी को इंसान के रूप में जगह दी और माना सतीत्व ही मर्म नहीं जीवन का

    साहित्य जगत में महिला अधिकारों की बात करने वाले साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की आज पुण्यतिथि है. उन्होंने इस बात को स्थापित किया कि सतीत्व ही एक नारी के जीवन का मर्म नहीं है. अपने लेखन से शरतचंद्र ने बांग्ला साहित्य को नयी दिशा दी. शरत की नायिकाएं मुखर हैं.

  • 100@ कैफी आजमी : कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी

    अवामी जिंदगी के दुख व जज्बातों को अपने कलम की स्याही बना देने वाले शायर कैफी आजमी का कद शायरी और सिनेमा के क्षेत्र में बहुत बड़ा माना जाता है. उनका दखल केवल शायराना ही नहीं था, जब भी सियासतदानों के सताये मजलूमों के हक-ओ-हुकूक की बात आती थी, कैफी आजमी सड़क पर उतरने से भी पीछे नहीं हटते थे. अवाम के शायर कैफी आजमी को उनकी 100वीं सालगिरह पर हम याद कर रहे हैं...

  • सफदर हाशमी की पुण्यतिथि आज: पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो...

    इन जादुई पंक्तियों से आप जरूर रूबरू होंगे, लेकिन अगर यह भूल गये हैं कि इनके रचनाकार कौन हैं, तो हम आपको याद दिलाते हैं. जीहां, इन पंक्तियों के रचनाकार हैं मशहूर नाटककार और गीतकार सफदर हाशमी. इस गीत का प्रयोग साक्षरता मिशन के एक विज्ञापन में किया गया था, जो लोगों की जुबां पर चढ़ गया था.

  • यौमे पैदाईश राहत इंदौरी, पढ़ें कुछ दिलकश शायरी

    ऐसी दिलकश शायरी के शायर हैं मशहूर राहत इंदौरी साहब. आज उनकी यौमे पैदाईश यानी जन्मदिन है. उनका जन्म एक जनवरी 1950 में इंदौर में हुआ था.उनके पिता कपड़ा मिल के कर्मचारी थे. वे उर्दू साहित्य में एमए थे. वे जब 19 वर्ष के थे उसी वक्त से शायरी कहा करते थे. उन्होंने कई हिंदी फिल्मों के लिए गाने भी लिखे हैं. आज के खास दिन पर पढ़ें उनकी कुछ खास शायरी-

  • #MirzaGhalib 221वीं जयंती : कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और...

    मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां यानी मिर्जा गालिब की आज जयंती है. यह उनकी 221वीं जयंती है. उन्हें उर्दू एवं फ़ारसी भाषा का महान शायर माना जाता है. उनकी शायरी सर्वकालिक हैं. उन्होंने शायरी को आम लोगों के बीच पहुंचाने का काम किया. चूंकि गालिब खुद कहते हैं कि “हैं और भी दुनिया में सुख़न्वर बहुत अच्छे कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और” , तो आज उनकी जयंती पर पढ़ें उनकी कुछ चुनिंदा शायरी-

  • आज पद्मश्री डॉ धर्मवीर भारती का जन्मदिन है, आप जानते हैं उन्हें...?

    नयी दिल्ली : आज हिंदी पत्रकारिता जगत के विद्रोही स्वभाव और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के सिद्धांत को चरितार्थ करने वाले डॉ धर्मवीर भारती का जन्म दिन है. एक बात और. वह यह कि अगर आप डॉ धर्मवीर भारती का नाम ले रहे हों और धर्मयुग की चर्चा न करें, तो हिंदी पत्रकारिता के इस योद्धा के साथ बेमानी होगी. अक्सर, जब कभी भी हम धर्मवीर भारती का नाम लेते हैं, तो हमारी जेहन में धर्मयुग (धर्मवीर भारती और धर्मयुग के जानने वाले लोगों के जेहन में) अक्स खुद ही उभरकर सामने आ जाता है.

  • 119वीं जयंती : शराब से नफरत करते थे रामवृक्ष बेनीपुरी, मधुशाला छपी तो हरिवंश राय से हुए थे नाराज

    मुजफ्फरपुर : ''कलम के जादूगर'' रामवृक्ष बेनीपुरी शराबबंदी के पक्षधर थे. बेनीपुरी को शराब के नाम से भी नफरत थी. उनका मानना था कि शराब समाज व परिवार को खोखला बनाती है.

  • कवि हरिवंश राय बच्चन की जयंती पर विशेष : ...आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला

    हिंदी साहित्य के उत्तर छायावाद काल के कवियों में हरिवंश राय बच्चन को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है. उन्होंने ना सिर्फ बेहतरीन कविताएं लिखीं,बल्कि गद्य के क्षेत्र में भी अपने लेखन से लोगों को अपना मुरीद बनाया. आज उनकी जयंती पर पढ़ें उनकी एक प्रशंसक मुक्ति शाहदेव की श्रद्धांजलि, जो पेशे से शिक्षिका हैं और मन से कवयित्री.

  • महाकवि आरसी प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि पर पढ़ें , ‘आरसी’ होने के मायने...

    आज 15 नवंबर को मैथिली और हिंदी के महाकवि आरसी प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि है. उन्हें रूप, यौवन और प्रेम के कवि के रूप में जाना जाता है. उनका जन्म बिहार के समस्तीपुर में हुआ था. उनकी प्रमुख रचनाएं हैं-माटिक दीप, पूजाक फूल, सूर्यमुखी,कागज की नाव और अनमोल वचन. उनके पौत्र त्रिपुरारि, जो खुद एक युवा शायर और अफ़्साना निगार हैं ने इस मौके पर उनके संग बिताये कुछ पलों को साझा किया है, पढ़ें और जानें अपने इस महाकवि की शख्सीयत को:-

  • #HappyDeepavali : पढ़ें कुछ प्रसिद्ध कविताएं

    मधुर मधुर मेरे दीपक जल! युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल; प्रियतम का पथ आलोकित कर!

  • अद्‌भुत रचनाकार थीं अमृता, सौ से अधिक किताबें लिखीं, पाकिस्तान में रहता था उनका खास दोस्त...

    अमृता प्रीतम एक ऐसी साहित्यकार हैं जिन्होंने अपने जीवन में कुल सौ पुस्तकें लिखीं और उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ. उन्होंने मुख्यत: पंजाबी में ही रचनाएं कीं, लेकिन वे हिंदी में भी लिखती थीं. उन्हें 1956 में साहित्य अकादमी पुस्कार से नवाजा गया. 1969 में पद्मश्री,1982 में साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार और 2004 में उन्हें देश का दूसरा सबसे बड़ा पुरस्कार पद्मविभूषण भी मिल चुका है. उन्होंने ना सिर्फ स्त्री मन को अभिव्यक्ति दी बल्कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के दर्द को भी बखूबी अपनी रचनाओं में उकेरा. उन्हें अपनी पंजाबी कविता ‘अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ’ के लिए बहुत प्रसिद्धि मिली.

  • स्मृति-शेष निर्मल वर्मा, जिन्होंने अपनी कहानियों से बनायी बेजोड़ पहचान

    निर्मल वर्मा भारतीय मनीषा के प्रतीक पुरुष हैं. जिनके जीवन में कर्म , चिंतन और आस्था के बीच कोई द्वंद्व नहीं था. स्वतंत्र भारत की आधी से अधिक सदी निर्मल वर्मा की लेखकीय उपस्थिति बनी रही.उनके रचनाकाल का श्रेष्ठ समय चेकोस्लोवाकिया के विदेश प्रवास में बीता. उन्हें हिंदी खड़ी बोली का सबसे बड़ा गद्यकार माना जाता है.

  • संकलित होंगी महान साहित्यकार रामानुजन की अप्रकाशित रचनाएं, अगले साल आयेगी किताब

    नयी दिल्ली : भारत के महान कवि, लोककथाओं के विशेषज्ञ और विद्वान अट्टीपट कृष्णस्वामी रामानुजन के अप्रकाशित लेखनों को संकलित कर इसे एक नयी किताब का रूप दिया जायेगा, जिसका प्रकाशन अगले साल किया जायेगा. शिकागो विश्वविद्यालय में इन लेखनों को संरक्षित और सूचीबद्ध किया जा रहा है.

  • 11 सितंबर महादेवी की पुण्यतिथि: यह व्यथा चन्दन नहीं है !

    प्रेम, विरह, करुणा, रहस्य और गहन आंतरिक अनुभूति की प्रतिनिधि कवयित्री महादेवी वर्मा की कविताओं की निजता, काव्यात्मक समृद्धि और दार्शनिक गंभीरता आज भी पाठकों को हैरान करती है. जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महाप्राण निराला के बाद हिंदी कविता की छायावादी धारा का चौथा स्तंभ मानी जाने वाली महादेवी ने बहुत अधिक नहीं लिखा.

  • जयंती पर विशेष: जब अमृता ने लिखा-साहिर मेरी जिंदगी के आसमान हैं और इमरोज मेरे घर की छत

    जी हां, अमृता. इन पंक्तियों के शब्दों से जो खुशबू बिखर रही है वो लगातार इसी नाम का जिक्र कर रही है. आज मशहूर साहित्यकार अमृता प्रीतम की जयंती है. अमृता की रचनाओं में प्रेम झलकता है तो प्रगतिशील चिंतन भी. उन्होंने शुरुआत तो प्रेम कविताओं से किया था, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रगतिशील चिंतन को शामिल किया.

  • वीएस नायपॉल का 85 साल की उम्र में निधन, लंदन में ली अंतिम सांस

    लंदन : भारतीय मूल के लेखक और साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल का 85 साल की उम्र में निधन हो गया. उन्होंने लंदन स्थित अपने घर में आखिरी सांस ली.

  • आज जयंती : हिंदी साहित्य के ‘दद्दा’ मैथिलीशरण गुप्त जिन्होंने ‘यशोधरा’ और ‘उर्मिला’ के पात्र को उभारा

    हिंदी साहित्य के दद्दा मैथिलीशरण गुप्त की आज जयंती है. उन्हें इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने खड़ी बोली को हिंदी साहित्य में स्थापित किया. साथ ही उन्हें इस बात का श्रेय भी दिया जाता है कि उन्होंने भारत की दो महत्वपूर्ण महिला किरदार ‘यशोधरा’ और ‘उर्मिला’ को अपने लेखन से उभारा, जबकि इतिहास ने उन्हें उपेक्षित कर दिया था.

  • आज मुंशी प्रेमचंद की जयंती : जानिए कैसे उनके नाम से जुड़ा ‘मुंशी’ शब्द

    कहानी सम्राट और आधुनिक हिंदी के प्रवर्तक मुंशी प्रेमचंद का नाम आते ही उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की उत्सुकता हर किसी के मन में उत्पन्न होती है. आज 31 जुलाई है मुंशी प्रेमचंद की जयंती. आम तौर तो लोग यह बखूबी जानते हैं कि मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के पास लमही गांव में हुआ था. उनके पिता अजायब राय लमही गांव के डाकघर में बतौर मुंशी काम किया करते थे.

  • लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में...

    मंच के कवियों में ऐसे कई नाम हैं, जिन्हें फिल्मों ने भी अपनाया और साहित्य ने भी कभी उन्हें हिकारत वाली नजर से नहीं देखा, उनमें नीरज का नाम सबसे ऊपर की पंक्ति में आयेगा. मंच पर बगैर कोई हल्की बात किये भारतीय काव्य परंपरा के आधुनिक रूप को नीरज ने जिया. जिन लोगों ने उन्हें मंच पर देखा-सुना है, वे गर्व से बता सकते हैं कि हमने नीरज को सुना. जिन लोगों ने नहीं देखा, वे उनके फिल्मी गीतों से उस गहरायी का अंदाजा लगा सकते हैं, जिसके लिए नीरज को जाना जाता रहा.

  • पुण्यतिथि : भीष्म साहनी ने अपने लेखन से मानवीय मूल्यों को स्थापित किया

    आज शीर्षस्थ साहित्यकार भीष्म साहनी की पुण्यतिथि है. भीष्म साहनी की कालजयी रचना ‘तमस’ के लिए पूरा साहित्यजगत उन्हें हमेशा याद करेगा. इस उपन्यास का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है. भीष्म साहनी की यह रचना भारत-पाकिस्तान के विभाजन पर आधारित थी. भीष्म को इस उपन्यास के लिए 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था.

  • 13 जून मेहदी हसन की पुण्यतिथि : आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ !

    -ध्रुव गुप्त- भारतीय उपमहाद्वीप के महानतम गायकों में एक ''शहंशाह-ए-ग़ज़ल'' मेहदी हसन ने अपनी भारी, गंभीर और रूहानी आवाज़ में मोहब्बत और दर्द को जो गहराई दी थी, वह ग़ज़ल गायिकी के इतिहास की सबसे दुर्लभ घटना थी.

  • रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती पर विशेष : मैं बचा रहना चाहता हूं !

    बंगला साहित्य के उत्कर्ष के पर्याय गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर देश के महानतम कवियों, कथाकारों, उपन्यासकारों, नाटककारों, चित्रकारों, संगीतकारों और शिक्षाविदों में एक थे. भारतीय मनीषा के इस शिखर पुरूष का व्यक्तित्व किसी किसी प्राचीन ऋषि के जैसा था जिसमें न सिर्फ हमारे प्राचीन विवेक में गहराई तक उतरने का विवेक था, बल्कि भविष्य की आशावादी दृष्टि भी थी. उन्हें पढ़ते हुए मानवीय अनुभव और विवेक के उच्च शिखर के सामने खड़े होने की विरल अनुभूति होती है.

  • स्मृति शेष: पद्मश्री गजेंद्र नारायण सिंह

    पटना : 10 सितंबर, 1939 को बिहार में जन्‍में एक बच्‍चे के बारे में शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही बच्‍चा बड़ा होकर संगीत की दुनिया का ऐसा पुरोधा बनेगा, जिसके सजदे में पूरी दुनिया झुक जाएगी. ये ऐसा फनकार बनेगा जिसके आगे संगीत की परंपराएं अपना अर्थ ढ़ूंढ़ेगी. जी हां... हम बात कर रहे हैं भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान फनकार पद्मश्री गजेंद्र नारायण सिंह की. पद्मश्री गजेंद्र नारायण सिंह संगीत की दुनिया के ऐसे नायक हैं जिन‍के पास आकर संगीत की परंपरायें अपना अर्थ खोजती हैं.

  • साहित्यकार महादेवी वर्मा को गूगल ने डूडल बनाकर यूं किया याद

    नयी दिल्ली : गूगल ने आज सहित्याकार महादेवी वर्मा पर डूडल बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है. महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य के छायावाद युग की चार प्रमुख स्तंभ में एक थीं. महादेवी वर्मा को हिंदी साहित्य में योगदान के लिए 27 अप्रैल 1982 को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था. ऐसे में गूगल ने इसी दिन उन पर डूडल बना कर उनके योगदान के प्रति सम्मान प्रकट किया है. इस डूडल को कलाकार सोनाली जोहरा ने बनाया है, जिसमें वे एक पेड़ के नीचे बैठकर दोपहर बाद अपने भाव के कविता लिखती दिखती हैं.

  • पुण्यतिथि पर विशेष : आज भी मानवीय संवेदनाओं को झंझोरता है 'रेणु साहित्य'

    अपने उपन्यास ''मैला आंचल'' से रातों-रात ख्याति अर्जित कर हिंदी साहित्य जगत में अपना विशेष मुकाम बनानेवाले कालजयी कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की कमी आज भी साहित्यकारों को महसूस होती है. आज भी स्थानीय लोग उन्हें महसूस करते हैं. पुण्यतिथि पर साहित्यकारों ने उन्हें याद करते हुए कहा कि रेणु पूरी तरह सामाजिक परिवेश के लेखक थे. उनकी रचनाएं अपनेपन का एहसास दिलाती हैं. अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत समाज से परिचय कराती हैं. मानवीय संवेदनाओं को झंकृत करती हैं, झंझोरती हैं.

  • राहुल सांकृत्यायन की 125वीं जयंती पर श्रद्धांजलि: जीवन के 45 साल घुमक्कड़ी में गुज़ारे

    राहुल सांकृत्यायन हिंदी साहित्य के एक ऐसे महापंडित थे, जिन्होंने यात्रा वृतांत या यूं कहें कि यात्रा साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया. बौद्ध धर्म पर शोध के लिए उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक भ्रमण किया था. इसके अलावा उन्होंने मध्य-एशिया तथा कॉकेशस भ्रमण पर भी यात्रा वृतांत लिखे जो साहित्यिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं. राहुल सांकृत्यायन की आज जयंती हैं, यह उनकी 125वीं जयंती है. 14 तारीख को उनकी पुण्यतिथि भी है.

  • पुण्यतिथि पर विशेष : अज्ञेय ने नयी कविता को साहित्य जगत में स्थापित किया

    सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन, जिन्हें हम ‘अज्ञेय’ के रूप में ज्यादा जानते हैं हिंदी साहित्य के एक ऐसे रचनाकार थे, जिन्होंने प्रयोग को बढ़ावा दिया. इनका जन्म 7 मार्च, 1911 को उत्तर प्रदेश के कसया में हुआ था और निधन 4 अप्रैल, 1987 को हुआ. अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नयी कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं. इन्होंने अनेक जापानी हाइकु कविताओं का अनुवाद किया.

  • जयंती पर विशेष : ब्रिटिश काल में गोर्की की ‘मां’ पढ़ना भारत में था अपराध

    आज साहित्य जगत के पुरोधा मैक्सिम गोर्की की जयंती है, उनका जन्म 28 मार्च 1868 में हुआ था. वे रूस के प्रसिद्ध लेखक और राजनीतिक कार्यकर्ता थे. उन्होंने साहित्य जगत में ‘समाजवादी यथार्थवाद’ की परिकल्पना की और उसे स्थापित किया.

  • महादेवी वर्मा की आज जयंती : मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूँ !

    हिंदी साहित्य जगत की आधुनिक ‘मीरा’ महादेवी वर्मा की आज जयंती है. उन्हें छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माना जाता है. उनकी गणना सबसे सशक्त कवयित्रियों में की जाती है. उन्हें महाकवि निराला ने ‘हिंदी के विशाल मंदिर की सरस्वती’ बताया था. महादेवी का जन्म 26 मार्च 1907 को उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था. उनके पिता गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपुर के एक कॉलेज में प्राध्यापक थे. उनकी माता का नाम हेमरानी देवी था.

  • #WorldPoetryDay : हृदय से हृदय का संवाद है कविता ...

    कविता कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति है, यह हृदय से हृदय का संवाद है. आज विश्व कविता दिवस के मौके पर इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि कविता संप्रेषण का सशक्त माध्यम है. लेकिन आज कविताओं के महत्व और स्तर दोनों में गिरावट दिखती है. आम पाठक कविताओं को पढ़ना नहीं चाहता और कवियों को महत्व नहीं देता, ऐसे में आज विश्व कविता दिवस के मौके पर यह जरूरी है कि हम कविता के महत्व को समझें और उसके अस्तित्व को सहजता से स्वीकार करें. आज विश्व कविता दिवस के मौके पर पढ़ें समकालीन हिंदी के दिग्गज कवि केदारनाथ सिंह की दो कविताएं, जो उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप है क्योंकि परसों 19 तारीख को रात में उनका निधन हुआ और कल उनका अंतिम संस्कार किया गया था.

  • केदारनाथ सिंह को श्रद्धांजलि : क्योंकि जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है...

    हिंदी की समकालीन कविता और आलोचना के सशक्त हस्ताक्षर केदारनाथ सिंह नहीं रहे.

  • पुण्यतिथि : फ़ि‍राक को कभी इतना ख़मोश देखा था,जरूर ऐ निगहे-नाज़ कोई बात हुई

    प्रेम, विरह, सौंदर्य और जिंदगी की तल्खियों के गायक रघुपति सहाय ''फ़िराक'' गोरखपुरी उर्दू शायरी में नयी परंपरा की बुनियाद रखने वाले शायरों में थे. उन्हें उर्दू के महानतम आधुनिक शायरों में एक माना जाता है. जिस दौर में उन्होंने लिखना शुरू किया, उस दौर की शायरी का एक बड़ा हिस्सा परंपरागत रूमानियत और रहस्यों से बंधा था.

  • जन्मदिन पर विशेष : मात्र 48 साल की उम्र में इतिहास रच गये जयशंकर प्रसाद

    ऐसे अद्‌भुत पंक्तियों के रचयिता जयशंकर प्रसाद की आज जयंती है. हिंदी साहित्य में वे छायावादी युग के चार प्रमुख आधार स्तंभों में से एक हैं. उन्होंने खड़ी बोली के काव्य में अद्‌भुत प्रयोग किये और उन्हें स्थापित किया. वे प्रसिद्ध कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार और निबंधकार के रूप में जाने जाते हैं.

  • सरस्वती के वरद पुत्र 'निराला' ने जीवन का विष पीकर बहाई हिंदी में 'अमृतमयी गंगा'

    ! विश्वत सेन! कपिल मुनि के श्राप से भस्म हुए करीब 60 हजार सगरपुत्रों का उद्धार करने के लिए इक्ष्वाकु वंश के राजा दिलीप के बेटे भगीरथ ने गंगा को धरती पर उतारने का काम किया, तो छायावाद के चार प्रवर्तकीय स्तंभों (जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला) के मुर्धन्य और मुक्तक कविता के प्रवर्तक सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने हिंदी साहित्य में अपना अमूल्य योगदान देकर गंगा उतारने का काम किया. आज वसंत पंचमी या फिर सरस्वती पूजा है और आज निराला का जन्मदिन है. वसंत पंचमी के दिन निराला की चर्चा न हो, ऐसा होना असंभव सा लगता है.

  • पुण्यतिथि पर विशेष : सौ बरस का हुआ शरतचंद्र का 'चरित्रहीन'!

    कलमकार की कल्पना यदि उसके जीवन का सच बन जाये तो वह दुर्लभ ''साहित्यिक संयोग’ माना जाता है. प्रसिद्ध बांग्ला साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपध्याय इस ''साहित्यिक संयोग'' की विशेष उपमा हैं. उन्होंने अपनी एक विशिष्ट कृति में जो कुछ रचा उसे जीवन के उत्तरायण में मनोगत रूप से वैसा ही जीया-भोगा. वह कृति है ''चरित्रहीन'' जिसकी रचना के साल 2018 में सौ बरस पूरे हो रहे हैं. ''चरित्रहीन'' इस मायने में भी विशिष्ट है क्योंकि इसमें कई स्थानों पर देवघर दरसता है. मात्र एक शहर के रूप में नहीं, एक मन:स्थिति के रूप में भी.

  • श्रद्धांजलि : आंखों से दुनिया देखते रहेंगे दूधनाथ सिंह

    ...और अब हमारे बीच प्रसिद्ध साहित्यकार दूधनाथ सिंह नहीं रहे. अपने लिखे प्रचुर साहित्य के साथ-साथ अपनी आंखे भी दान दे गये. जिन आंखों से वे दुनिया देखते रहेंगे. गुरुवार की देर रात उन्होंने अंतिम सांस ली. वे प्रोस्टेट कैंसर के शिकार थे. दो साल पहले उनकी पत्नी निर्मला ठाकुर का भी निधन हो चुका था, अपने पीछे वे भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं.

  • इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया ....

    जी हां यह कुछ पंक्तियां हैं, जो अकसर हमारे जुबां पर होती है और इन सदाबहार शेर के रचयिता हैं मिर्जा गालिब. मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान यानी मिर्जा गालिब को शायरी की दुनिया का बेताज बादशाह माना जाता है. उनकी शायरी जीवन के हर मौके पर फिट हो जाती है. यही कारण है कि गालिब की शायरी आज भी लोगों के जुबां पर है, भले ही आज की पीढ़ी यह नहीं जानती कि उसे लिखने वाले कौन हैं. मुगल काल के अवसान काल में गालिब का दौर था.

  • धर्मवीर भारती के जन्मदिन पर पढ़ें उनकी दो कविताएं

    धर्मवीर भारती को आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि और नाटककार थे.

  • सआदत हसन मंटो की 10 लघुकथाएं

    -मरा नहीं..., देखो, अभी जान बाक़ी है! -रहने दे, यार... मैं थक गया हूं!

  • मैं चांद हूं, हर रोज़ मेरा रूप अलग होता है : गीत चतुर्वेदी

    जिन स्कूलों में गया वहां केवल तैरना सिखाया गया डूबने का हुनर मैंने खुद ही सीख लिया बहना मैंने कभी नहीं सीखा मैं इतना हल्का था हमेशा कि कभी जरूरत ही नहीं पड़ी मैं कहीं भी बह सकता हूं तुम्हारे कंठ से निकले गीतों में भी बह जाने की वफादारी मुझमें भरपूर है.

  • जन्मदिन पर विशेष : जब हरिवंश राय बच्चन की कविता सुन रो पड़ीं थी तेजी और ...

    हरिवंश राय श्रीवास्तव "बच्चन" हिंदी भाषा साहित्य के स्तंभों में से एक हैं, आज उनकी जयंती है. बच्चन साहब को ''हालावाद'' का प्रवर्तक माना जाता है, वे हिंदी कविता के उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों में से एक हैं. उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति मधुशाला है. बच्चन जी की गिनती हिंदी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में होती है. उनकी जयंती पर आज उनके जीवन का एक रोचक प्रसंग याद आता है. हरिवंश राय की पहली पत्नी श्यामा का निधन हो चुका था. ऐसे में वे अकेले हो गये थे. अपनी आत्मकथा क्या भूलूं क्या याद करूं में हरिवंश राय बच्चन ने तेजी बच्चन से अपनी मुलाकात का जिक्र किया है. वे अपने दोस्त प्रकाश के घर बरेली गये थे. यहां उनकी मुलाकात तेजी सूरी से हुई और उनके प्रेम संबंधों की शुरुआत हुई.

  • मुक्तिबोध की जयंती पर पढ़ें उनके पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध का एक संस्मरण

    आज हिंदी साहित्य के महान साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्मदिन है. उन्हें आधुनिक हिंदी का शीर्ष कवि माना जाता है. उन्होंने हिंदी की कविता में प्रयोगधर्मिता को बढ़ावा दिया. मुक्तिबोध की कविताओं में मनुष्य का संघर्ष उसकी पहचान प्रमुखता से सामने आती हैं. उनकी कविताओं में प्रखर राजनैतिक चेतना भी नजर आती है. लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाये कि उनके जीवित रहते उनका कोई भी स्वतंत्र काव्य संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ. उनकी मृत्यु के पहले श्रीकांत वर्मा ने उनकी केवल ''एक साहित्यिक की डायरी'' प्रकाशि‍त की थी. उनके पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध जो पेशे से पत्रकार हैं ने पिछले दिनों उनपर एक फेसबुक पोस्ट लिखा था, पढ़ें उनका यह ओलख:-

  • आधुनिक जीवन शैली की सच्चाई बयां करती सी भास्कर राव की कहानी ‘क्रेच’

    इस कहानी का जो शीर्षक मैंने रखा है, जरूरी नहीं है कि आप इससे सहमत हों. आप चाहें तो अपना शीर्षक तय कर सकते हैं चाहें तो बिना शीर्षक के भी इसे स्वीकार कर सकते हैं. बहस इस बात को लेकर भी की जा सकती है कि इस कहानी के लिए यही शीर्षक क्यों रखा और रखा भी तो यह अंग्रेजी शीर्षक क्यों? बहस और भी कई बातों को लेकर की जा सकती है. मसलन, यह भी कहा जा सकता है कि यह कहानी है ही नहीं. वैसे मैं भी यह दावा नहीं कर रहा हूं कि यह कहानी है. चाहें तो आप इसे घटना कह लें, कल्पना मान लें, आप बीती या वृतांत समझ लें. लिखने की सुविधा के लिए तीन हिस्सों में बांट लेना बेहतर होगा, आरंभ, मध्य और अंत. यों कुशल कथाकार कहीं से भी शुरू कर सकते हैं और कहीं भी खत्म. वे इस सिलसिले को शायद नहीं मानना चाहेंगे, लेकिन मैं इसे इसी क्रम से लिखना चाहता हूं, क्योंकि यह कहानी या घटना, इसे जो भी मान लें, जब इस तरह घटी है तो फिर मैं इसे क्यों तोड़ू-मरोड़ूं और फिर यह मेरी कहानी तो है नहीं कि चाहे जहां से इसे उठा लूं और जहां भी लाकर छोड़ दूं.

  • जिस ‘सेक्स डिजायर’ को आज भी व्यक्त नहीं कर पाती महिलाएं उसे सोबती की ‘मित्रो’ ने 1966 में बेबाकी से कहा

    भारतीय समाज में आज भी महिलाओं को यह अधिकार नहीं दिया गया कि वे अपनी ‘सेक्स डिजायर’ को अभिव्यक्त करें. जबकि सच्चाई यह है कि स्त्री-पुरुष दोनों के अंदर ‘सेक्स डिजायर’ होती है. यह बात आज भी उतनी ही सच है जितनी की 1966 में जब मशहूर साहित्यकार कृष्णा सोबती ने ‘मित्रो मरजानी’ उपन्यास लिखा था. इस उपन्यास के जरिये उन्होंने एक ऐसे किरदार को गढ़ा, जो उससे पहले हिंदी साहित्य में मौजूद नहीं था. एक आम मध्यमवर्गीय परिवार की बेबाक लड़की ‘मित्रो’ जिसकी शारीरिक जरूरतें उसका पति पूरी नहीं कर पाता और वह अपनी खीज अपने तानों से निकालती है. वह चुप नहीं रहती है.

  • मशहूर कथाकार जयनंदन की कहानी ‘सूखते स्रोत’

    संधिनी भाभी को लगा था जैसे परिवर्तन की एक पागल आंधी ने उसे भारत से उठाकर अमेरिका में फेंक दिया हो. जिस एकमात्र बेटे से परिवार बसने और बढ़ने की उसकी बहुत सारी हसरतें टिकी थीं उसने एक दुर्गम और अलघ्य पर्वत की तरह अपना एक ऐसा फैसला सामने रख दिया था जो कम से कम इस देश की प्रकृति का तो बिल्कुल ही नहीं था. उसने कहा था, “अब मुझसे शादी करना संभव नहीं होगा, मां. घर-गृहस्थी में देने के लिए मेरे पास एकदम टाइम नहीं है, न सिर्फ मेरे पास, बल्कि लिपि के पास भी. देख ही रही हो, हम दोनों के ही जॉब की मांग ऐसी है कि रात 11 बजे तक हमें एक तिल फुर्सत नहीं रहती. इसलिए हमने मिलकर तय कर लिया है कि फिलहाल शादी के भंवर में न फंसें.”

  • गीत चतुर्वेदी की कलम से : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते

    मशहूर साहित्यकार गीत चतुर्वेदी ने लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा और अध्ययन द्वारा प्राप्त क्षमता द्वारा रचित रचनाओं पर जो सवाल उठाये जाते हैं, उसी मुद्दे पर यह लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि प्रतिभा नैसर्गिक हो सकती है, किंतु ज्ञान नैसर्गिक नहीं हो सकता, उसे अर्जित करना पड़ता है अध्ययन से चिंतन से. गीत चतुर्वेदी का मानना है कि रचना की श्रेष्ठता महत्वपूर्ण ना कि यह देखना कि वह नैसर्गिक प्रतिभा द्वारा लिखी गयी है यह एक्वायर्ड ज्ञान द्वारा. प्रस्तुत है गीत चतुर्वेदी का आलेख :

  • अमृता प्रीतम की पुण्यतिथि पर विशेष : 45 साल बिना शादी के साथ रहने के बाद इमरोज की बांहों में तोड़ा दम

    ऐसी शानदार पंक्तियों को रचकर अमर हो जाने वाली मशहूर साहित्यकार अमृता प्रीतम की आज पुण्यतिथि है. उनका निधन 31 अक्तूबर 2005 को हुआ था. लेकिन वह आज भी लोगों के स्मरण में जीवित हैं अपनी रचनाओं के जरिये. यह अमर पंक्तियां अमृता प्रीतम ने अपने जीवनसाथी इमरोज के लिए लिखा था.

  • मोपासां की कहानी : एक पागल की डायरी

    फ्रांसीसी कथाकार मोपांसा (1850.1893) को आधुनिक कहानी का पिता माना जाता है. कहते हैं मोपासां ने कहानियों में जीवन की धड़कन भरी. उसे मानव स्वभाव के करीब लेकर आये. उनका पूरा नाम आनरे रेना आल्बेर गे द मोपांसा था.

  • गीत चतुर्वेदी की कलम से : जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता

    जो सभी लोग करते हैं, आप भी अगर वही करेंगे, तो आपको कभी विशेषण नहीं मिलेंगे. अधिकतर विशेषण हास्यबोध से निकलकर आते हैं. जिनका बहुत मज़ाक़ उड़ाया जाता है और जो बहुत महान होते हैं (और दोनों अमूमन एक ही होते हैं और यह भी एक कारण है कि महान शब्द अब मख़ौल के लिए ज़्यादा प्रयुक्त होता है), वे अपने अधिकांश काम उस तरह नहीं करते, जिस तरह बाक़ी दूसरे लोग करते हैं. किसी को पागल इसलिए भी कहा जाता है कि वह समाज के प्राकृतिक नियमों का पालन नहीं करता. समाज और प्रकृति के साथ उसका अलग और निजी रिश्ता होता है. यही रिश्ता एक ‘जगह’ की निर्मिति करता है.

  • मैत्रेयी पुष्पा की कहानी ‘मुस्कराती औरतें’ का अंश

    छठ पूजा के अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा ने एक पोस्ट लिखा था, जिसपर विवाद हुआ और मैत्रेयी पुष्पा सोशल मीडिया में ट्रोल भी हुईं. मैत्रेयी पुष्पा ने स्त्री अधिकारों पर जमकर लिखा है. प्रस्तुत है उनकी एक कहानी मुस्कराते औरतें का अंश:-

  • स्मृति शेष: हमसे नज़रिया काहे फेरी हो बालम !

    भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रसिद्ध गायिका गिरिजा देवी का कल रात निधन हो गया, वे 88 वर्ष की थीं. वे शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत का गायन करतीं थीं. ठुमरी गायन को परिष्कृत करने तथा इसे लोकप्रिय बनाने में इनका बहुत बड़ा योगदान है. इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बनारस में हुआ था. इनके निधन पर पढ़ें मशहूर साहित्यकार ध्रुव गुप्त का यह आलेख

  • क्या पाब्लो नेरुदा की हत्या हुई थी? इस सवाल के बीच पढ़ें उनकी यादगार कविताएं

    चिली के नोबेल पुरस्कार विजेता कवि पाब्लो नेरूदा की मौत का रहस्य एक बार फिर गहराने लगा है. फोरेंसिक विशेषज्ञों के अनुसार नेरूदा की मृत्यु कैंसर से नहीं हुई थी. इस राय के सामने आने के बाद से चर्चा शुरू हो गयी है कि क्या नेरुदा की हत्या हुई थी? 1973 में चिली के सैनिक जनरल ऑगस्टो पिनोचे ने अलेंदे सरकार का तख्ता पलट दिया था. इसी दौरान राष्ट्रपति अलेंदे की मौत हो गयी और उसके 12 दिन बाद ही नेरूदा की भी मौत हो गयी थी.

  • मैत्रेयी पुष्पा का Vaginal purity पर लिखा आलेख " बोलो मत स्त्री "

    हमारे समाज में मनुस्मृति द्वारा निर्धारित किया हुआ चलन विशेष तौर पर स्त्रियों के लिए आज भी लागू हैं. " पिता रक्षतु कौमार्य, भर्ता यौवने रक्षतु " - अर्थात पिता बेटी की रक्षा कुंवारेपन में करता है और यौवन में पति . इसके बाद पुत्र संरक्षक हो जाता है, स्त्री कभी भी आज़ाद नहीं हैं. इसमें क्या शक है , स्त्री को हमने कदम-कदम पर कटघरों में कैद पाया है . यहां मैं सिर्फ उसके जीवन की शुरूआत अर्थात कौमार्यवस्था की बात करूंगी .

  • जयंती पर पढ़ें राष्ट्रकवि दिनकर की कालजयी रचनाएं

    आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती है. उनका जन्म 23 सिंतबर 1908 में बिहार के मुंगेर जिले में हुआ था. दिनकर आजादी के पूर्व विद्रोही कवि के रूप में जाने जाते थे, उनकी कविताओं में ओज गुण की प्रधानता है, साथ ही वे लोगों को क्रांति के लिए उद्वेलित भी करते हैं. हालांकि उनकी रचनाओं में श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति भी होती है.

  • Video : गीत चतुर्वेदी की कविता ‘बहने का जन्मजात हुनर’

    गीत चतुर्वेदी भारत के ऐसे युवा साहित्यकार हैं जिन्हें भारत के सर्वश्रेष्ठ लेखकों की सूची में रखा जाता है. 27 नवंबर 1977 को मुंबई गीत वर्तमान में मुंबई में रहते हैं. उन्हें कविता, उपन्यास और छोटी कहानियां लिखने में महारत हासिल है. समकालीन साहित्यकारों में उनके पाठकों की संख्या सर्वाधिक है. उनका कविता संग्रह “न्यूनतम मैं” राजकमल प्रकाशन से आया और काफी चर्चित रहा. इससे पहले 2010 में “आलाप में गिरह” प्रकाशित हुई.

  • उषाकिरण खान की मशहूर कहानी दूब-धान

    उषाकिरण खान हिंदी साहित्य के क्षेत्र में बड़ा नाम हैं. उषा किरण मूलत: बिहार के दरभंगा जिले के लहेरिया सराय की रहनेवाली हैं. इनकी स्कूली शिक्षा दरभंगा से हुई है, इन्होंने पटना यूनिवर्सिटी से एमए किया है. अभी यह पटना में ही रहती हैं. इन्होंने हिंदी और मैथिली में लेखन कार्य किया है जो अनवरत जारी है. इन्हें बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का हिंदी सेवी सम्मान, बिहार राजभाषा विभाग का महादेवी वर्मा सम्मान, दिनकर राष्ट्रीय सम्मान और साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कार भी मिले हैं. संप्रति लेखन में संलग्न हैं:- पढ़िए इनकी एक चर्चित कहानी.

  • पुण्यतिथि पर विशेष : महादेवी ने अपनी रचनाओं में स्त्रीमन की पीड़ा को बखूबी सजाया, पढ़ें उनकी कुछ कविताएं

    आज आधुनिक हिंदी साहित्य की ‘मीरा’ महादेवी वर्मा की पुण्य तिथि है. उन्हें हिंदी साहित्य का आधार स्तंभ माना जाता है. छायावादी युग की तो वे एक स्तंभ थीं ही. उनकी कविताओं में स्त्री मन की वेदना बखूबी झलकती है. उन्होंने पीड़ा को इतनी बखूबी सजाया कि वह आमजन की पीड़ा बन गयी. महादेवी का जन्म 26 मार्च 1907 में हुआ था, जबकि मृत्यु 11 सितंबर 1987 को हुआ.

  • ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और

    यह कुछ पंक्तियां हैं, जो हमारे जीवन में इस कदर शामिल हैं, जैसे यह हमारे जीवन का हिस्सा हों. इन पंक्तियों के रचनाकार मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब” भारत के महान शायर थे. इनके बारे में कहा जाता है कि यह उर्दू भाषा के सर्वकालिक महान शायर हैं. इन्होंने फारसी के शब्द को भारत में मशहूर किया. वे मुगल शासक बहादुर शाह जफर के दरबारी थे. ग़ालिब की पहचान उनके उर्दू गजलों के कारण है. उन्होंने अपने बारे में लिखा था

  • जन्मदिन पर विशेष : अमृता को साहिर से प्रेम था, लेकिन आजीवन इमरोज के साथ रहीं

    अमृता प्रीतम ने आजीवन यह कहा कि उन्हें साहिर लुधियानवी से प्रेम था. उनकी आत्मकथा और कविताओं में उनका प्रेम उजागर होता है. बावजूद इसके वे आजीवन इमरोज के साथ रहीं. इमरोज भी इस बात से भली-भांति परिचित थे कि अमृता साहिर को चाहतीं हैं, लेकिन उनका कहना था कि वो साहिर को चाहतीं हैं, तो क्या मैं उन्हें चाहता हूं. इमरोज और अमृता के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने एक दूसरे से कभी नहीं कहा कि उन्हें प्रेम है. इमरोज का यह भी कहना था कि बताने से प्रेम नहीं होता, यह तो अनुभूति की चीज है और हम इस बात को समझते थे.

  • प्रेमचंद, जिनके बिना हिंदी साहित्य की कल्पना अधूरी

    प्रेमचंद हिंदी साहित्य के पुरोधा हैं. वे हिंदी के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं. उनका वास्तविक नाम धनपत राय था. उन्हें नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है. उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था.