• इतिहास अपनी हदें बदल लेता है : रस्किन बांड

    दोस्तों का मिलना, यारों का बिछुड़ना, मुल्क की आज़ादी और उसका बंटवारा, हर जगह तब्दीली. ये वे चंद अल्फ़ाज हैं जिनकी रोशनी में महान लेखक रस्किन बांड देश को ब्रिटेन से 1947 में मिली स्वतंत्रता को याद करते हैं. उस वक्त बांड की उम्र केवल 13 बरस की थी और वह शिमला के बिशप कॉटन रेजीडेंशियल स्कूल में तालीम हासिल कर रहे थे.

  • बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा की किताब ‘Becoming’ की रिकॉर्ड बिक्री

    न्यूयॉर्क : अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा के संस्मरण ‘बिकमिंग’ को लोग काफी पसंद कर रहे हैं. एक हफ्ते में ही किताब की 14 लाख से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं. क्राउन पब्लिशिंग ने बताया कि 13 नवंबर को रिलीज हुई किताब की अमेरिका और कनाडा में डिजिटल और प्रिंट समेत 14 लाख प्रतियां बिक चुकी हैं. मांग के आधार पर प्रकाशकों ने किताब की 30 लाख प्रतियां छपवायी हैं.

  • कल से टिहरी में जुटेंगे ट्रैवल ब्लागर्स, पाठकों के साथ अनुभव करेंगे साझा

    टिहरी तथा उसके आसपास के क्षेत्र के प्राकृतिक सौंदर्य और यहां के साहसिक कारनामों वाली गतिविधियों को पर्यटन की दृष्टि से प्रचारित करने के लिए एक नयी पहल करते हुए उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद ने देश के कुछ प्रमुख यात्रा ब्लॉगर्स को कल से शुरू हो रहे टिहरी झील महोत्सव में आमंत्रित किया है जो पाठकों से अपने अनुभव साझा करेंगे. इस आमंत्रण को स्वीकार करते हुए देश के आठ जानेमाने यात्रा ब्लॉगर्स आज ऋषिकेश से बस से झील महोत्सव को देखने के लिए रवाना हुए.

  • नेपाल रोड ट्रिप आठवीं कड़ी : नेपाल की उदास सी सुबह और घर वापसी

    अब सिर्फ एक दिन का वक्त था. कई जगह घूमना था, कई चीजें देखनी थी. मुझमें हिम्मत नहीं थी कि बाइक से सारी जगहें घूम- घूम कर देखूं. हमने एक टैक्सी बुक की. गुप्तेश्वर महादेव, फिर सामने की पार्क और स्तूप टैक्सी वाले ने घूमा दिये. गुप्तेश्वर महादेव की गुफा शानदार है. ऐसा लगेगा जैसे यहां कोई बड़ा खजाना छिपा हो. गुफा के अंदर गिरता झरना कई, प्रचानी प्रतिमाएं हैं यहां. इन जगहों पर घूमने के बाद अब दूसरे दिन सुबह आठ बजे हम पोखरा से सीधे पटना के लिए निकल गये....

  • नेपाल रोड ट्रिप सातवीं कड़ी : गांव बारपाक से शहर पोखरा का सफर...

    बारपाक भले ही नेपाल यात्रा के सबसे यादगार लमहों में एक है लेकिन बारपाक पहुंचने के बाद रात भर बस खराब रास्ते के सपने आये. उसी रास्ते से वापस लौटना था जिसने ऊपर से नीचे तक शरीर के अंजर – पंजर ढीले कर दिये थे. ऐसा लग रहा था जैसे जैसे अभी कोई दौड़ता हुआ आयेगा औफ कहेगा यहां से बायें मुड़ जाइये आप सीधे हाइवे निकल जायेंगे.

  • नेपाल रोड ट्रिप छठी कड़ी : भूकंप के केंद्र बारपाक में जिंदगी, दिखता है मुस्कान के पीछे छिपा डर

    अबुखरैनी से कुछ ही दूरी पर बारपाक के रास्ते में हमारी हिम्मत टूटने लगी थी. रास्ते इतने खराब थे कि कभी मेरी हिम्मत टूटी तो उदय ने धक्का देकर आगे बढ़ाया. कभी उदय को लगा कि हमें लौटना चाहिए तो मेरी जिद काम आयी. जूते, पैंट और टीशर्ट धूल से सने थे . कीचड़ ने जूते का वजन दोगुणे ले ज्यादा कर दिया था. इस बार रास्ता पूछा तो दूर एक पहाड़ी पर कुछ घर दिखाते हुए इशारा किया वहीं जाना है आपको. वहां से तो बारपाक इतना नजदीक लगा जैसे अगले मोड़ के बाद ही वह आ जायेगा लेकिन पहुंचते - पहुंचते शाम के 6.30 बज गये.

  • नेपाल रोड ट्रिप पांचवीं कड़ी : भूकंप का केंद्र रहे बारपाक का सफर

    नेपाल प्रेस कॉउंसिल में मेरी और उदय की नयी मंजिल तय हुई थी. हम नेपाल सिर्फ यहां की नाइट लाइफ का मजा लेने नहीं आये थे. 25 अप्रैल 2015 को आयी भूकंप ने नेपाल को कमजोर जरूर किया था लेकिन नेपाली टूटे नहीं थे.

  • नेपाल रोड ट्रिप चौथी कड़ी : पशुपतिनाथ के दर्शन और भूकंप की पड़ताल

    अबतक आपने पढ़ा : रांची से नेपाल रोड ट्रीप पर मैं और मेरे मित्र उदय शंकर झा निकले, पहला दिन सीतामढ़ी में दूसरा देउराली में और अब तीसरा दिन काठमांडू में बितने वाला था. काठमांडू के नाइट लाइफ की चर्चा पिछली कड़ी में कर चुका हूं अब एक कसीनो पहुंचा हूं. पढ़ें आगे क्या हुआ. -पंकज कुमार पाठक - काठमांडू में बड़े भाई की तरह तरुण जी मिले थे. बिल्कुल उसी लहजे में समझाया था जैसे कोई बड़ा भाई समझाता है. मैंने भी छोटे भाई की तरह बात सुनी और पांच सौ रुपये लेकर सीधा कसीनो पहुंचा. कसीनो पहुंचा, तो वहां बाहर हमें आईकार्ड दिखाने के लिए कहा गया. मैंने तो अपना आईकार्ड साथ रखा था लेकिन उदय बगैर कार्ड के तीन चार किमी कसीनों को पता पूछते उत्साह के साथ यहां पहुंच गया था. हमने कर्मचारी को मनाने की कोशिश की लेकिन नहीं माना. अब दो चीजें हो सकती थी या तो हम वापस जाकर कार्ड लाते या मैं अकेला अंदर प्रवेश करता?

  • रोड ट्रिप तीसरी कड़ी : नेपाल में पहला दिन और काठमांडू की नाइट लाइफ

    मेरे सामने जो नजारा था उसे देखकर मैं हैरान था. लग रहा था जैसे बादलों के बीच खड़ा हूं और आसामान से नीचे देख रहा हूं. मेरे कमरे के दरवाजे के थोड़ी दूरी पर ही गहरी खाई, सामने पहाड, बादल और घने जंगल. दूर पहाड़ों में कई बस्तियां . कई घंटों तक हम दोनों वहीं खड़े रहे . बैठे भी तो पैर नीचे लटका कर. होटल से यहीं चाय मंगवा ली. सुबह की धूप सेकते रहे. मन नहीं मान रहा था कि इस जगह को छोड़कर आगे बढ़ें लेकिन काठमांडू हमारे इंतजार में था. नेपाल में पहला दिन कट चुका था. भले ही नेपालियों को आपकी भाषा बोलनी ना आती हो लेकिन ज्यादातर लोग हिंदी समझ लेते हैं. आप नेपाली नहीं समझ सकते, तो मुस्कुरा कर इशारों में आपको समझा देते हैं. बहुत कम लोगों ने रास्ता पूछने पर कहा, आगे पूछिये या हमारी आवाज अनसुनी करके चले गये. एक और चीज जो नेपालियों के लिए आदर बढ़ाती है वह है उनका कोई भी सामान देने का तरीका.

  • रांची से नेपाल रोड ट्रिप की दूसरी कड़ी - नेपाली थाली और शानदार रास्तों से रिश्तों की शुरुआत

    चाय की दुकान पर पूरी राजनीतिक बहस के बाद निष्कर्ष क्या निकला ?. बस आपलोग ये मत पूछिये. भारत माता की जय के नारे के साथ हम आगे बढ़े यह नारा इसलिए क्योंकि हमारा राजनीतिक राष्ट्रवाद बचा रहे और बहस के निष्कर्ष पर अफसोस ना हो. भले ही मैंने बहस के निष्कर्ष पर आपके सवाल का जवाब ना दिया हो लेकिन मेरे एक सवाल का जवाब जरा आप सोच कर दीजिएगा. क्या आप किसी ऐसे नेपाली से मिले हैं जो चेहरे से नेपाली लगता हो लेकिन रहन सहन और बोलचाल में पूरी तरह बिहारी हो.

  • रोड ट्रिप : रांची से नेपाल- मैं, मेरा जिगरी यार और बुलेट

    किसी भी नये शहर की यात्रा से पहले उस जगह को लेकर आपके दिमाग में एक छवि बनती है. कई चीजें आप इंटरनेट पर तलाशते हैं या कुछ ऐसे लोगों से मिलने की कोशिश करते हैं, जो उस शहर को अच्छी तरह जानते हों. इस पूरी प्रक्रिया में उस शहर को लेकर आपके दिमाग में एक छवि बन जाती है. आपके पास जितनी जानकारी अलग- अलग माध्यमों से इकट्ठा हुई ,उसे आप समेट कर शहर का नक्शा बना लेते हैं. लेकिन मेरी यात्रा में, तो शहर ही नहीं देश बदल रहा था. यात्रा किसी हवाई जहाज, ट्रेन या बस से नहीं थी.

  • संस्मरण : पटना ओह मेरा पटना-4

    जिन लोगों ने पुराना पटना देखा है वे जानते हैं कि कभी पटना की जमीन हरी भरी और उपजाऊ थी. यहां रंग रंग के फूल उगते थे. सौ साल की उम्र के कई पेड़ थे . झाड़- झंखाड़ के साथ बेला , गुल अब्बास के पौधे लहलहाते थे . पूरा पटना आम के बगीचे से भरा हुआ था . आम ही आम . उसके दरख्तों में कोयल कूकती रहती थी . अब पटना के बारें में क्या क्या कहें . मौर्य साम्राज्य के उत्कर्ष के बाद पाटलिपुत्र सत्ता का केंद्र बन गया. शुरूआती पाटलिपुत्र लकड़ियों से बना था, पर सम्राट अशोक ने नगर को शिलाओं की संरचना में तब्दील किया. इस काल में सबसे उत्कृष्ठ समय तब आया जब शेरसाह सूरी ने नगर को पुनर्जीवित करने की कोशिश की. उसने गंगा के तीर पर एक किला बनाने की सोची. उसका बनाया कोई दुर्ग तो अभी नहीं है, पर अफ़ग़ान शैली में बना एक मस्जिद अभी भी है. जिसकी सुरमई दीवारें हैं . गुलचीं और गुले मखमल के गुच्छे आज भी दिख जायेंगे .

  • लोकगायिका चंदन तिवारी की कलम से एम्स्टर्डम डायरी

    चंदन तिवारी मूलत: बिहार की लोकगायिका हैं. लेकिन इनका निवास झारखंड के बोकारो में है. उन्होंने भोजपुरी लोकगीतों को अलग पहचान दी है और दिन-प्रतिदिन इनकी लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है. वे इन दिनों एम्स्टर्डम की यात्रा पर हैं, वे यहां 15 अक्तूबर को आयोजित एक प्रोग्राम ‘भूजल भात’ में भाग लेने के लिए वहां गयीं हैं. वे पिछले कुछ दिनों से यहां हैं, उन्होंने अपने अनुभव को यात्रा वृतांत का रूप देते हुए लिखा है. यात्रा वृतांत का शीर्षक है एम्स्टर्डम डायरी. इस डायरी के कुछ रोचक अंश आपके लिए प्रस्तुत हैं

  • ‘सपने सच होते हैं’- 3 : पत्रकारों में होती है खबर खोजने की अद्‌भुत क्षमता

    पत्रकारों में खबर को सूंघने की अद्‌भुत क्षमता होती है, इसी क्षमता की बदौलत वे खबरों को जल्द से जल्द सामने लेकर आते हैं. ‘सपने सच होते हैं’ किताब के तीसरे भाग में डॉ संतोष तिवारी ने पत्रकारों की इसी खूबी का बखान किया है. लेखक लंबे समय तक देश के प्रतिष्ठित हिंदी अखबारों में पत्रकार रहे. आज पढ़ें किताब की अगली कड़ी:-

  • ध्यान और अध्यात्म का केंद्र अल्मोड़ा

    ध्यान और अध्यात्म का केंद्र बिंदु अल्मोड़ा, उत्तराखंड के कुमाऊं जिले का हिस्सा है. कुमाऊं की पर्वत श्रंखलाओं का यह अहम हिस्सा है. कुमाऊं की यात्रा, अल्मोड़ा गये बिना पूरी नहीं हो सकती. पहाड़ पर बसा अल्मोड़ा बहुत शांत और मनमोहक है. इतना शांत की आपका ध्यान सिर्फ अल्मोड़ा की हसीन वादियों में ही लगा रहेगा और इतना मनमोहक है कि आपका मन कहीं और जाने को नहीं करेगा.

  • झारखंड का अलौकि‍क गांव ‘मलूटी’ जो प्रसिद्ध है मंदिरों के लिए

    देवघर से तारापीठ जा रही थी. जब दुमका से आगे गयी तो रास्‍ते में माईलस्‍टोन पर लि‍खा मि‍ला कि‍ मलूटी 55 कि‍लोमीटर. अब ये कैसे हो सकता था कि‍ उस रास्‍ते से गुजरूं और उस गांव में न जाऊं जि‍सके बारे में इतना सुन रखा है कि‍ मंदि‍रों का गांव है यह. मेरी उत्‍सुकता चरम पर और नजरें सड़क के दि‍शा-नि‍र्देश पर.

  • किताब ‘सपने सच होते हैं’ की दूसरी कड़ी

    ‘सपने सच होते हैं’ इस किताब के लेखक हैं डॉ संतोष तिवारी. उन्होंने किताब के बारे में बताया है कि मैंने यह किताब अपनी सच्ची जिंदगी के कुछ लम्हों को उन युवा साथियों के साथ साझा करने के लिए लिखी है, जिन्होंने कुछ ऊंचाइयां छूने के सपने देखे हैं. अगर वे ठान लें तो प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कामयाबी उनकी मुट्ठी से दूर नहीं रह सकती. लेखक लंबे समय तक देश के प्रतिष्ठित हिंदी अखबारों में पत्रकार रहे. पुस्तक के दूसरे भाग में उन्होंने शीर्षस्थ पत्रकारों के साथ बिताये पलों की जानकारी दी हैं:-

  • राजस्थान का सबसे रोमांटिक शहर उदयपुर

    उदयपुर रेल, सड़क और हवाई मार्गों से देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है. आप बड़ी आसानी से देश के किसी भी कोने से उदयपुर पहुंच सकते हैं. मैंने उदयपुर पहुंचने के लिए अपनी प्रिय सवारी भारतीय रेल को चुना. दिल्ली से रात भर का सफ़र तय करने के बाद मैं सुबह-सुबह उदयपुर के साफ सुथरे रेलवे स्टेशन पर उतरी. थोड़ी नज़र घुमाने पर सामने ही मुझे टूरिस्ट इन्फार्मेशन सेंटर नज़र आ गया. हैरानी की बात यह थी कि अभी सुबह के सात भी नहीं बजे हैं और यह टूरिस्ट इन्फार्मेशन सेंटर ना सिर्फ़ खुला था बल्कि राजस्थान टूरिज़्म डिपार्टमेंट का एक अफसर लंबी सी मुस्कान के साथ आने वाले पर्याटकों को यथा संभव जानकारियां उपलब्ध करवा रहा था. तो यह हुई ना बात. इसे कहते है सफ़र की शुभ शुरुआत .