• ‍विवादों के घेरे में मंगलेश डबराल

    पिछले दिनों हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार मंगलेश डबराल ने फेसबुक पर एक स्टेटस लिखा कि ‘‘हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास बहुत लिखे जा रहे हैं, लेकिन सच यह है कि इन सबकी मृत्यु हो चुकी है। हालांकि ऐसी घोषणा नहीं हुई है और शायद होगी भी नहीं, क्योंकि उन्हें खूब लिखा जा रहा है। लेकिन हिंदी अब सिर्फ ‘जय श्रीराम’ और ‘वंदे मातरम’ तथा ‘मुसलमान का एक ही स्थान- पाकिस्तान या कब्रिस्तान’ जैसी चीजें जीवित हैं। इस भाषा में लिखने की मुझे बहुत ग्लानि है। काश इस भाषा में न जन्मा होता!’’

  • ‘पाखी’ पत्रिका के कवर पेज पर विवाद, जानें क्या कहते हैं साहित्यकार...

    साहित्य जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘पाखी’ का नया अंक विवादों में है. इसके कवर पेज को लेकर विवाद है, कई लोगों का मानना है कि इस कवर पेज को मात्र सस्ती लोकप्रियता के लिए प्रकाशित किया है, वहीं कई लोग इस कवर पेज के समर्थन में खड़े हैं और इसे एक सुंदर और शालीन कवर पेज बता रहे हैं. पाखी के कवर पेज पर इस बार लियोनार्डो दा विंची की प्रसिद्ध कृति मारिया की तसवीर छपी है, जिसमें स्त्री सौंदर्य बखूबी झ्रलक रहा है, उसके स्तन आवरण रहित हैं. यहां बहस का विषय यह है कि क्या प्रगतिशीलता के नाम पर इस तरह की तसवीर पत्रिका के कवर पेज पर छपनी चाहिए?

  • श्रद्धांजलि : अफसोस शौक़ साहब नहीं रहे...

    शौक़ जालंधरी 91 साल की उम्र में दुनिया से रुख़सत हुए. 15-20 सालों से रांची में थे. रायपुर के बाद उन्होंने रांची को अपनी अदबी सरगर्मियों का मसकन बनाया. शौक़ साहब एक पुर खुलूस इंसान थे. अपनी शायरी से मुहब्बत का पैग़ाम देने वाला ये शायर हमें याद आता रहेगा. उर्दू से इन्हें बेलौस मुहब्बत थी. जब इनकी पोती की अचानक मृत्य हो गयी थी, तो दफन के मौके पर हमलोगों ने इन्हें टूटते हुए देखा था और मेमोरियल में इनसे सिर्फ़ उर्दू अशआर सुने थे और उर्दू में तक़रीर की थी. मुझे हददर्जा खुशी हुई थी.

  • कोलकाता पुस्तक मेला में धूम मचा रहा है ‘ऑनलाइन लाइब्रेरी स्टॉल’

    कोलकाता : कोलकाता में चल रहे 43वें अंतरराष्ट्रीय कोलकाता मेले में ‘ऑनलाइन लाइब्रेरी स्टॉल’ सभी उम्र के लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है, जहां लोग अपनी पंसद की किताबें मुफ्त में डाउनलोड कर सकते हैं.

  • पाखी के ‘टाॅक-आॅन टेबल’ में विश्वनाथ त्रिपाठी के बिगड़े बोल, बलात्कार में ढूंढ़ा सौंदर्यबोध, फेसबुक पर ट्रोल

    हिंदी साहित्य का विवाद से पुराना नाता रहा है. अकसरहां कुछ ऐसी बातें हो जाती हैं जिसके कारण बहस शुरू हो जाती है. नया विवाद शुरू हुआ है पाखी पत्रिका में प्रकाशित एक साक्षात्कार पर. यह साक्षात्कार है प्रसिद्ध आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी का. पाखी के विशेष आयोजन ‘टाॅक-आॅन टेबल’ में विश्वनाथ त्रिपाठी अतिथि लेखक थे. उन्होंने साहित्य और साहित्यिेत्तर विषयों पर बेबाकी से अपनी राय रखी, लेकिन इसी दौरान उन्होंने कुछ ऐसी बात कह दी जिससे सोशल मीडिया में उबाल आ गया है और विश्वनाथ त्रिपाठी के साथ-साथ पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज भी लोगों को निशाने पर हैं.

  • 'साहित्य के गहन चिंतक थे प्रेमचंद'

    प्रेमचंद साहित्य के गहन चिंतक थे. इन्होंने साहित्य को सुंदर और सत्य कहा. साहित्य का आधार जीवन है. इसी नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती है. साहित्य मनुष्य की दृष्टि है. इसलिए सुबोध, सुगम और मर्यादाओं से परिमित है. साहित्य मनुष्य के सामने जबाबदेह है. इसके लिए कानून है, जिनसे वह इधर-उधर नहीं हो सकता है. जीवन का उद्देश्य ही आनंद है. मनुष्य जीवन पर्यंत आनंद की ही खोज में पड़ा रहता है.

  • जब हम राह भटकने लगते हैं, तब ज्ञान ही बन जाता है पथ-प्रदर्शक

    किसी अमर शख्स की चर्चा हो, तो उसकी कृतियां स्वच्छ दर्पण-सा सामने आ जाती हैं. अाज प्रेमचंद की चर्चा उनकी कृतियों के बूते ही चतुर्दिक व्याप्त है. 11 उपन्यास और लगभग 200 कहानियों के लेखक प्रेमचंद सही में अमर हैं. उनकी अमरता का रहस्य भी बहुत विस्तृत है. तत्कालीन सामाजिक कुरीतियों, रूढ़िवादिता, अंधविश्वास, अशिक्षा, शोषण, लाचारी जैसे ज्वलंत विषयों का उन्होंने बड़ा मार्मिक वर्णन किया है.

  • जहां स्त्री व्यक्ति नहीं, देह है !

    देश में लगातार छोटी बच्चियों और किशोरियों के साथ हो रही दुष्कर्म की घटनाओं से आहत प्रसिद्ध साहित्यकार ध्रुव गुप्त ने अपने फेसबुक वॉल पर एक प्रतिक्रिया लिखी थी, जिसे हम आपके लिए लेकर आये हैं. ध्रुव गुप्त लिखते हैं स्त्री को व्यक्ति ना समझकर सिर्फ देह समझना ही बलात्कार के प्रमुख कारणों में से एक है, तो पढ़ें उनका यह गंभीर आलेख:-

  • व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ के निधन से साहित्य जगत में शोक, सोशल मीडिया में श्रद्धांजलि

    देश के प्रसिद्ध व्यंग्यकार और किताब घर प्रकाशन के संपादक सुशील सिद्धार्थ का आज सुबह हार्टअटैक से निधन हो गया. उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गयी है, सोशल मीडिया में उन्हें श्रद्धांजलि देने का सिलसिला जारी है. उनसे जुड़े लोग यह विश्वास ही नहीं कर पा रहे हैं कि सुशील सिद्धार्थ इस तरह जा सकते हैं. कल तक वे अच्छे भले थे. लोग उन्हें सहृदय व्यक्ति के रूप में याद कर रहे हैं, जो हमेशा लोगों को प्रेरित करते रहे. सुशील सिद्धार्थ एक बहुत ही सहज और विनम्र व्यक्ति थे, किसी से भी ऐसे मिलते कि वह उन्हें भूल ही नहीं पाता. उनका जाना साहित्य जगता के लिए बहुत बड़ी क्षति है. साहित्य जगत उनके जाने से शोकमग्न है और कुछ इस तरह से उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा है

  • धनबाद : असगर वजाहत बने जलेस के अध्यक्ष, नौवां राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न

    जनवादी लेखक संघ (जलेस) का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन तमाम लेखकों से एकजुट होकर अपनी रचनात्मक शक्ति को संगठित करने के आह्वान के साथ संपन्न हुआ. इस मौके पर केंद्रीय पदाधिकारियों का चयन किया गया. जिसमें जानेमाने लेखक असगर वजाहत को अध्यक्ष, चंचल चौहान कार्यकारी अध्यक्ष और मुरली मनोहर प्रसाद सिंह महासचिव चुने गए. सम्मेलन के दौरान कई प्रस्ताव भी पारित किये गये.

  • विश्व पुस्तक मेले पर एक लेखक की डायरी

    पुस्तक मेला साहित्य प्रेमियों का सबसे बड़ा त्योहार होता है. नयी किताबों की खुशबू, किताबों को स्पर्श करना, उन्हें उलट-पुलट कर देखना, खरीदना. भूले-बिसरे दोस्तों-परिचितों से मिलना, नये दोस्त बनाना. ओह! कितना मजा आता है इन सबमें. बचपन में पिता के कंधे पर बैठ कर गांव का मेला देखने से बिल्कुल भिन्न लेकिन उतनी ही सुखद अनुभूति. हम साल भर पुस्तक मेले का इंतजार करते हैं. मुझे याद है जब जमशेदपुर में टैगोर सोसाइटी की ओर से पहले पुस्तक मेले का आयोजन हुआ तो मैं खूब उत्साहित थी.

  • आप किसके लिए लिखते हैं?

    1996-97 का समय.19-20 साल का एक युवक (यानी मैं), मुंबई में नरीमन पॉइंट पर बैठ, दूसरे युवक (यानी एक प्यारा कवि-मित्र) से पूछता है, “तू किसके लिए लिखता है?” वह जवाब देता है, “मैं समाज के शोषित-पीड़ित-दमित वर्ग के लिए लिखता हूं. मैं राशन की दुकान व रोज़गार कार्यालय की क़तार में खड़े तमाम व्यक्तियों के लिए लिखता हूँ, और ख़ासकर उस आख़िरी व्यक्ति के लिए, जिसका नंबर कभी नहीं आएगा. मैं हारे हुए आदमी के लिए कविता लिखता हूँ.”

  • भारतीय भाषा परिषद सम्मान मिलने की घोषणा पर पढ़ें अनुज लुगुन की टिप्पणी

    !!अनुज लुगुन!! भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता भाषा और साहित्य की प्रसिद्ध संस्था है. यह भारतीय भाषाओं और साहित्य की उन्नति के लिए काम करती है. यह संस्था हर साल भारतीय भाषा साहित्य के साहित्यकारों को सम्मानित करती है. इस साल की समग्र युवा रचनाशीलता के लिए ‘भारतीय भाषा परिषद सम्मान’ मुझे देने की घोषणा हुई है. इस घोषणा से मैं अभिभूत हूं. यह सम्मान 10-11 मार्च, 2018 को एक समारोह-सह-राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिया जायेगा.

  • विश्व पुस्तक मेला : इस्लाम में महिलाओं के अधिकार बताने वाली किताबों की मांग

    देश में तीन तलाक और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर चल रही बहस की वजह से लोगों में इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों को जानने की ललक बढ़ रही और लोग, विशेष तौर पर महिलाएं, यहां आयोजित विश्व पुस्तक मेले में इससे संबंधित किताबें खरीद रही हैं. प्रगति मैदान में चल रहे 26 वें विश्व पुस्तक मेले में इस्लामी किताबों का प्रकाशन करने वाले कई प्रकाशक आये हैं. वे उर्दू भाषा के अलावा हिन्दी और अंग्रेजी में भी कई किताबों को लेकर आये हैं.

  • मोहन राकेश के जन्मदिन पर पढ़ें, उनकी डायरी के कुछ रोचक अंश

    मोहन राकेश हिंदी साहित्य के बड़े हस्ताक्षर हैं. नयी कहानी आंदोलन का उन्हें आधार माना जाता है.आज उनके जन्मदिन के अवसर पर हम आपके लिए लेकर आये हैं उनकी डायरी के कुछ अंश. उन्होंने डायरी बहुत ही रोचक अंदाज में लिखी है, पढ़ें कुछ रोचक प्रसंग जब वे जालंधर में थे-

  • डॉ धर्मवीर भारती : हिन्दी पत्रकारिता के शिखर पुरूष

    मुंबई के बांद्रा पूर्व स्थित कला नगर के एक चौराहे का नामकरण हाल ही में डॉ. धर्मवीर भारती के नाम पर किया गया. डॉ. धर्मवीर भारती कला नगर की ही साहित्य सहवास बिल्डिंग में रहते थे. कला नगर में ही बाल ठाकरे का निवास मातोश्री भी है, लेकिन चौराहे का नामकरण डॉ. भारती के नाम पर होना उनके प्रति मुंबई का सम्मान दर्शाता है. डॉ. धर्मवीर भारती भारतीय पत्रकारिता के शिखर पुरूषों में से हैं. इससे बढ़कर वे साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं. हिंदी पत्रकारिता में उन्होंने ''धर्मयुग'' जैसी सांस्कृतिक पत्रिका को स्थापित किया और ढाई दशक से भी ज्यादा समय तक शीर्ष पर बनाए रखा. मुझे याद है 1981-82 के वे साल, जब विज्ञापन दाता धर्मयुग में विज्ञापन बुक करने के लिए लंबी लाइन में लगते थे. हाल यह था कि दीपावली विशेषांक में तो साल भर पहले ही विज्ञापन बुक हो जाते थे.

  • एक अंगुली से लिखा था प्यार तुमने !

    खड़ीबोली हिंदी कविता के लगभग सौ बरस लंबे परिदृश्य में हरिवंश राय बच्चन का रचना-संसार अपने पूर्ववर्ती और समकालीन कवियों से बिल्कुल अलग और अनूठा रहा है. उनकी कविता के प्रति जैसी दीवानगी थी लोगों में, वैसी दीवानगी फिर दुबारा कभी देखने को नहीं मिली. वे उन कवियों में अग्रणी थे, जिन्होंने प्रेम और मानवीय संबंधों को छायावादी वायवीयता और अमूर्तता से निकाल कर उन्हें देह और जमीन पर पांव धरने की जगह दी थी.

  • कुंवर नारायण की कविताएं पूरी दुनिया से संवाद करती हैं : गीत चतुर्वेदी

    कुंवर नारायण हिंदी के उन दुर्लभ कवियों में से थे, जो अपने रचनाकर्म से व्यापक समाज की अधिभौतिकता को संबोधित करते हों. अधिभौतिकता एक कठिन शब्द है. बहुत आसानी से अपना अर्थ स्पष्ट नहीं होने देता. कई लोग अध्यात्म और अधिभौतिक को एक मानने की भूल करते हैं, लेकिन अधिभौतिकता, अध्यात्म से कहीं ज्यादा गहरा व समावेशी शब्द है. यह शब्द मनुष्य की आत्मा की रसोई है. केवल कविता ही नहीं, सारी कलाएं इसी रसोई से निकलकर आती हैं और समाज की इसी रसोई को ही संबोधित करती हैं. इसीलिए कविता को आत्मा का भोजन कहा जाता है.

  • सबमें प्रवाहित हूं, लेकिन अंतर्ध्यान, हमारे भीतर इसी तरह बहते रहेंगे कुंवर नारायण

    हिंदी के चर्चित कवि और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कुंवर नारायण, अब नहीं रहे. उनके निधन के बाद साहित्य जगत शोक है. ऐसे सम्मानित कवि जिनके प्रति लोगों के मन में अत्यधिक सम्मान था, उनका जाना लोगों को तकलीफ दे रहा है. सोशल मीडिया के जरिये साहित्यकारों ने अपनी संवेदना व्यक्त की है.

  • जब नीतीश कुमार ने कहा था- मेरे राजनीतिक जीवन पर मनु शर्मा की किताब ‘कृष्ण की आत्मकथा’ का गहरा प्रभाव रहा है

    भारतीय राजनीति के दो दिग्गज अगर एक किताब से इस कदर प्रभावित हों कि वे बिलकुल उसमें रम जायें, तो वह किताब जरूर खास होगी, जी हां हम बात कर रहे हैं मशहूर साहित्यकार मनु शर्मा द्वारा लिखित किताब ‘कृष्ण की आत्मकथा’ की. इस किताब के बारे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार कहा था कि उनके राजनीतिक जीवन पर मनु शर्मा की किताब ‘कृष्ण की आत्मकथा’ का गहरा प्रभाव है. उन्होंने कहा कि इस किताब ने मेरे अंतर्मन को छुआ है और मुझे राजनीति में सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया है. इस किताब में श्रीकृष्ण के चरित्र को अनोखे अंदाज में उकेरा गया है.

  • पढ़ें, मशहूर साहित्यकार और पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी ध्रुव गुप्त से विशेष बातचीत

    ध्रुव गुप्त साहित्य जगत की ऐसी शख्सीयत हैं, जो अपने नाम के अनुसार ही अपनी लेखन क्षमता के बल पर साहित्य जगत के आकाश में ध्रुव तारे की मानिंद अपनी चमक बिखेर रहे हैं. 67 वर्षीय ध्रुव गुप्त की अबतक छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनके नाम हैं ‘कहीं बिल्कुल पास तुम्हारे, ‘जंगल जहां खत्म होता है’, ‘मौसम जो कभी नहीं आता’(कविता संग्रह), ‘मुठभेड़ (कहानी संग्रह)’, एक जरा सा आसमां, ‘मौसम के बहाने’ और मुझमें कुछ है जो आईना सा है (गजल संग्रह). ध्रुव जी के बारे में जो बात सर्वाधिक आकर्षित करती है, वह है उनका पेशा. ध्रुव गुप्त भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे हैं, बावजूद इसके इन्होंने अपने अंदर एक संजीदा कवि और लेखक को जीवित रखा. साहित्य जगत में इन्हें कवि, ग़ज़लगो, कथाकार और लेखक के रूप में जाना जाता है. आज उन्होंने प्रभात खबर डॉट कॉम से बातचीत की और बताया कि किस तरह पुलिस सेवा में होते हुए भी उन्होंने अपने अंदर एक संजीदा और भावुक लेखक को जीवित रखा.

  • पढ़ें डॉ उषाकिरण खान का आलेख ‘ सामाजिकता से बचेगा छठ का उल्लास’

    छठ बिहार का महापर्व है. इस चारदिवसीय पर्व पर आधुनिकता का असर भी पड़ा है बावजूद इसके यह पर्व अभी तक अपने मूल स्वरूप में काफी हद तक कायम है. बिहारी चाहे जहां भी रहते हों, इस महापर्व के आयोजन के वक्त घर लौटते हैं. यह उल्लास का त्योहार है और आज से इसकी शुरुआत हो गयी है. महापर्व छठ की सामाजिकता और उल्लास को बनाये रखने पर पढ़ें मशहूर साहित्यकार डॉ उषाकिरण खान का यह आलेख:-

  • जेबुन्निसा : अंतहीन इंतज़ार की एक ख़ामोश कविता

    भारत के मध्यकाल में प्रेम की अप्रतिम गायिका मीराबाई के अलावा प्रेम की दीवानी एक और कवयित्री भी हुई थी जिसके बारे में कम लोगों को ही पता है. प्रेम की गहन संवेदना, दर्द और अंतहीन प्रतीक्षा के अलफ़ाज़ देने वाली यह कवयित्री थी सत्रहवीं सदी की मुग़ल शहज़ादी, औरंगज़ेब की बड़ी बेटी जेबुन्निसा. मुग़ल खानदान में उसके आखिरी शासक बहादुर शाह ज़फर के अलावा जेबुन्निसा ही ऐसी शख्स थी जिसकी शायरी को दुनिया भर में सम्मान के साथ पढ़ा और सराहा जाता है. उसके जीवन काल में उसकी रचनाएं देश के लोगों तक नहीं पहुंची तो इसकी वजह यह थी कि वह हिंदी या किसी स्थानीय भाषा में नहीं, मुगलों की राजकीय भाषा फ़ारसी में लिखती थी. हालांकि रूमान और असफल प्रेम की पीड़ा उसकी शायरी के केंद्र में है, लेकिन उसमें कहीं-कहीं सूफी दर्शन का असर भी दिख जाता है. मिर्ज़ा ग़ालिब के पहले वह अकेली शायरा थी जिनकी रुबाइयों, गज़लों और शेरों के अनुवाद अंग्रेजी, फ्रेंच, अरबी सहित कई विदेशी भाषाओं में हुए हैं. दुर्भाग्य से उसके अपने देश में हिंदी और उर्दू में उनकी रचनाओं का अनुवाद, प्रकाशन और मूल्यांकन होना अभी बाकी है.

  • किसे मिलेगा 2017 के साहित्य का नोबेल? पढ़ें कवि गीत चतुर्वेदी का अनुमान

    2017 का नोबेल पुरस्कार किसे मिलेगा, इसकी घोषणा आज हो जायेगी. पुरस्कार साहित्य का एक सालाना उत्सव है, तो अनुमान भी एक सालाना अवसर. विश्व-साहित्य का एक विद्यार्थी होने के नाते, पिछले दस बरसों में एक भी बरस ऐसा नहीं बीता, जब सितंबर के आख़िरी दिनों में मुझसे यह न पूछा गया हो कि- “आपको क्या लगता है, इस साल का नोबेल किसे मिलेगा?” यहां यह भी जोड़ना चाहिए कि दस साल में एक बार भी मेरा अनुमान सही साबित नहीं हुआ. और बहुत संभावना है कि इस बार भी न हो.मेरे जैसे करोड़ों लोग होंगे, जिनके अनुमानों को नोबेल पुरस्कार समिति गलत बता देती है. और ऐसा करते हुए वह बहुत आनंदित होती होगी.

  • बॉलीवुड के प्रसिद्ध गीतकार आनंद बक्शी को कवि क्यों ना कहा जाये?

    बॉलीवुड के प्रसिद्ध गीतकार आनंद बक्शी ने लगभग चार हजार गाने लिखे, जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं. बिंदिया चमकेगी , हमने सनम को खत लिखा, ये जो मोहब्बत है, मैं शायर बदनाम, अबके सजन सावन में जैसे कर्णप्रिय गीतों के रचियता आनंद बक्शी ने लोगों के हृदय में तो जगह बना ली, लेकिन साहित्य जगत में उन्हें जगह नहीं मिली. आज भी उन्हें बॉलीवुड का गीतकार माना जाता है साहित्यकार नहीं. इस विषय पर आप क्या सोचते हैं? क्या आनंद बक्शी या उनके जैसे बॉलीवुड के अन्य गीतकारों को भी साहित्यकार माना जाना चाहिए या नहीं? कृपया कमेंट बॉक्स में जाकर अपनी राय दें और हमारी इस चर्चा का हिस्सा बनें.