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नयी पौध

पढ़ें, अमृता प्रीतम को समर्पित कंचन अपराजिता की कविताएं

अमृता -- अमृता प्रेम करती थी। पावन गंगा की तरह, पवित्र प्रेम, उसका प्रेम कई हिस्सो मे बटाँ। एक पत्नी, एक प्रेयसी और एक पाक इबादत किसी की बन कर। सोचती हूँ, ये एक स्त्री अमृता ही हो सकती है । जो हर किरदार को बखूबी निभा पाई। जब वह कमसिन सी दुल्हन बनी होगी । एक पत्नी के रूप में जब उसने प्रीतम नाम जोड़ा होगा। कई सपने आंखों मे उसके भी सजे होंगे। जब साहिर के साथ बरसात की उस रात में प्रेम एक झोंका सा आकर उसकी साँसो मे बसा होगा । तभी उसकी अधजली सी सिगरेट उसके लबों को छुआ होगा। और कभी इमरोज की पीठ पर उसने अंगुलियों से साहिर नाम लिखा होगा यू ही नहीं पाकीजगी की हद तक इमरोज ने एक मनचाहा रिश्ता जोड़ा होगा। तभी तो उन्हें सांसद भवन से ले आना। रात में उसे लिखते देख उसके लिए चाय बनाना। उसकी बीज रूप में अपने अंदर रखना उनके लिए सरल होगा। उनकी वो मोहब्बत की उस चरम को छू पाया होगा। जिसमें रूह बस बसती है जिस्म गौण हो जाता है। अमृता ,ये सत्य है प्रेम खैरात नहीं होता प्रेम बस पाक होता है तुमने वही किया.

पुरोधा

#AmritaPritam : अद्‌भुत रचनाकार, जीवंत हैं जिनकी रचनाएं

भारतीय साहित्य जगत में अमृता प्रीतम एक ऐसा नाम है, जिन्हें पढ़ना एक अद्‌भुत एहसास है. आज उनकी जयंती का शताब्दी वर्ष है. इस मौके पर हम उन्हें याद करते हुए बात करेंगे कुछ उनकी, कुछ उनकी रचनाओं की.

फिराक गोरखपुरी यौमे पैदाइश : ‘एक मुद्दत से तेरी याद भी आयी न हमें...

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा : सकारात्मकता के द्वार खोलती है ‘मन के द्वार’

कविता क्या है? क्या यह अलौकिक होती है और मन की गहराइयों से निकलती है या फिर इसमें कवि मन का शिल्प भी होता है? यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन कविता संग्रह ‘मन के द्वार’ में कवि शिव कुमार लोहिया ने स्पष्ट कहा है कि कविताएं उनके मन से निकली हैं और उन्हें पढ़कर इंसान उनके मन के द्वार तक ही नहीं पहुंचता बल्कि कवि पाठकों को मन के अंदर झांकने की अनुमति भी प्रदान करता है.

नवसृजन

सामाजिक विद्रुपताओं के मार्मिक चित्र उकेरती है नीरज नीर की 'दर्द न जाने कोई' कहानी, पढ़ें रोंगटे खड़े करने वाली रचना...

रांची : हमारा समाज अच्छे-बुरे लोगों से भरा पड़ा है. कहीं अच्छे लोगों का बोलबाला है, तो कहीं बुरे लोगों की भी कमी नहीं है. आम तौर पर समाज के भले मानुष विपत्तिकाल में एक-दूजे का सहारा बनते हैं, मगर समाज के मतलब परस्त और खुर्राट लोग मौके की ताक में लगे रहते हैं. समाज में घटित होने वाली घटनाएं समाचार जगत के लिए जितना महत्वपूर्ण हो जाती हैं, उससे कहीं अधिक समाज के दर्पण साहित्य के लिए उपयोगी हो जाती हैं. साहित्य समाज की विद्रुपताओं पर अपनी पैनी नजर रखता है और फिर उसका सही विश्लेषण कर पाता है. झारखंड की राजधानी रांची के कहानीकार ''नीरज नीर'' ने सामाजिक विद्रुपताओं के चित्र को उकेरते हुए ''दर्द न जाने कोई'' कहानी गढ़ी है. पढ़ें पूरी कहानी...

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप कुमार की पहली कविता संग्रह 'बिन जिया जीवन' का लोकार्पण

खबर

हिन्दी दिवस : अभिव्यक्ति को सार्थकता प्रदान करती है भाषा की सहजता, सरलता और शालीनता - प्रधानमंत्री

आज पूरा देश हिन्दी दिवस मना रहा है. सोशल मीडिया पर हस्तियां हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं दे रही हैं. आम लोग भी हिन्दी के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित कर रहे हैं. विद्यालयों और महाविद्यालयों में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है. इस मौके पर पेश है हिन्दी दिवस को लेकर किए गए कुछ ट्वीट.

राकेश तिवारी को रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार

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प्रख्यात उपन्यासकार और नाटककार किरण नागरकर का निधन

‘हम नहीं चंगे, बुरा न कोय’ के लोकार्पण में बोले सुरेंद्र मोहन, लिखना एक जॉब की तरह है, ये लक्ज़री नहीं...