पाठक का पत्र

बेखौफ घूमते अपराधी

Prabhat Khabar

हजारीबाग शहर में एक बार फिर मोबाइल छिनतई गिरोह के लोग सक्रिय हो गये हैं. ये एेसे चोर हैं, जिनका काम करने का तरीका ही कुछ अलग है. इनका ध्यान राह चलते व्यक्ति पर रहता है. ये बिना नंबर की बाइक पर तीन की संख्या में सवार होते हैं. पहला व्यक्ति बाइक संभालता है, दूसरा मोबाइल झपटता है और तीसरा माहौल देखता है.

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संस्कृति के एक सिपाही का जाना

कुमार प्रशांत

मुझे अच्छा लगा कि गिरीश रघुनाथ कर्नाड को संसार से वैसे ही विदा किया गया, जैसे वे चाहते थे- नि:शब्द! ...

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समाज में बुजुर्गों की अनदेखी

आशुतोष चतुर्वेदी

देश की बड़ी आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है. बेहतर खान पान और स्वास्थ्य सेवाओं ने लोगों की उम्र ...

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ज्येष्ठ पूर्णिमा : नागार्जुन का जन्मदिन

रवि भूषण

आज ज्येष्ठ पूर्णिमा है. बाबा नागार्जुन का जन्मदिन. उनकी याद बार-बार आती है. आज के दिन कुछ और अधिक. ...

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प्रस्तावित स्मार्ट सिटी में अधिकाधिक पार्किंग-स्मार्ट शौचालय की अपेक्षा

सुरेंद्र किशोर

पटना के बकरी बाजार-कबाड़ी बाजार में स्मार्ट सिटी के तहत स्मार्ट मार्केट बनाने का प्रस्ताव है. जीपीओ ...

Columnists

कक्षा एक से पांच तक बीएड वालों की हो बहाली

28 जून, 2018 को एनसीटीइ ने बीएड अभ्यर्थी को कक्षा 1 से 5 तक के शिक्षक बनने के योग्य मान लिया. बशर्ते कि अभ्यर्थी केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा पेपर-1 उत्तीर्ण हो.

चमकी बुखार से बचाव को जागरूक कौन करेगा?

मुजफ्फरपुर में महामारी का रूप ले चुके चमकी बुखार के चलते अबतक 100 से अधिक बच्चों की मौतें हो चुकी हैं. मौसम में तल्खी और हवा में नमी की अधिकता के कारण होनेवाली यह बीमारी हर साल इसी मौसम में मुजफ्फरपुर और इसके आसपास के इलाकों के बच्चों को अपनी चपेट में लेती है.

जनप्रतिनिधि ध्यान दें और जल्द सड़कों को बनवाएं

वर्ष 2017 में बिहार में आयी प्रलयंकारी बाढ़ में बिहार के कई जिलों को काफी नुकसान हुआ. कई दिनों तक बेघर हुए लोगों को राहत शिविरों में गुजर वसर करना पड़ा था.

जान बचाने के लिए जरूरी

पूरे देश में गर्मी का भयानक और भयावह प्रकोप जारी है. आधा जून खत्म हो गया है, लेकिन मानसून का पता नहीं है. दिल्ली, राजस्थान आदि में 48 डिग्री सेल्सियस तापमान से लोगों का जीना मुश्किल हो रहा है. बिहार के अकेले पटना और औरंगाबाद जिलों में लगभग 100 लोगों की जानें लू से हो चुकी हैं. लोग अस्पतालों में दम तोड रहे हैं.

मिल-बैठ कर समाधान निकालें

पश्चिम बंगाल में जारी राजनीतिक हिंसा के बाद अब जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल ने हालात को और भी खराब कर दिया है. इलाज के अभाव में मरीज परेशान हैं, लेकिन इस पूरे प्रकरण में वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बड़ी गैर जिम्मेदारी दिखायी है.

फादर्स डे की प्रासंगिकता

भारत जैसे समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले देश में पता नहीं फादर्स डे कब आयातित हो गया. जहां पिता अपनी संतान के लालन-पालन में अपनी अस्थियां तक गला देता है, खुद की इच्छाओं-भावनाओं जैसी तमाम चीजों पर काबू रख सिर्फ संतान के सुख को अपना सुख मानता है, हमें हमारी संस्कृति ने पितृदेवो भवः का भाव सिखलाया है, वहां पिता के प्रति सम्मान को सिर्फ एक दिवस में बांध कर फादर्स डे मनाना अपनी संस्कृति का मजाक उड़ाने जैसा लगता है.

खाद के इस्तेमाल से खत्म हो रही खेतों की उर्वरता

मानव जीवन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है. उनमें मिट्टी बहुमूल्य है. खाद के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता खत्म हो रही है. मिट्टी का स्वस्थ होना जरूरी है. इसमें मौजूद प्राकृतिक कार्बनिक पदार्थ होते हैं.

जल के महत्व को समझें और बर्बादी को रोकें

हमारा देश प्राचीन काल से धार्मिक संस्कृति का देश रहा है. यहां जल संरक्षण को लेकर भी धार्मिक मान्यता रही हैं. हिंदू धर्म में नदी को देवी मूल्य बताया गया है. यहां तो गंगा, यमुना, सरस्वती नदी के संगम को पवित्र बताया गया है तथा इन तीनों नदियों की पूजन की भी प्रथा भी रही है. भारत गांवों का देश है.

बंद हो बेटियों पर अत्याचार, बने कड़ा कानून

आजकल देश के विभिन्न हिस्सों में छोटी-छोटी बच्चियों के साथ अत्याचार के साथ यौनशोषण की घटनाएं बढ़ गयी हैं.

विमान खोजने में विलंब

अरुणाचल प्रदेश में 3 जून को गुम हुए भारतीय वायु सेना के ‘एएन 32’ विमान का मलबा आखिर आठ दिनों के बाद दिखाई दिया. विमान का पता न चलना चिंता की बात बन गयी थी. विमान के बारे में जानकारी देने वाले को पांच लाख रुपये का इनाम देने की नौबत आ गयी थी.

शंघाई सहयोग संगठन का महत्व

आगामी 13 एवं 14 जून को किर्गिस्तान की राजधानी 19वां शंघाई सहयोग संगठन का सम्मलेन होने जा रहा है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित इसके आठ स्थायी सदस्य देश हिस्सा लेने वाले हैं.

आपराधिक प्रवृत्ति वाले कार्यकर्ता

राजनीति के अपराधीकरण को लेकर लंबे समय से चिंता जतायी जा रही है, मगर इसे किसी भी राजनीतिक दल ने गंभीरता से नहीं लिया है. यही वजह है कि हर चुनाव के बाद नगर निगम से लेकर संसद तक में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की पैठ कुछ बढ़ी हुई दर्ज होती है. इस तरह हर राजनीतिक दल में कहीं न कहीं इसे लेकर स्वीकार्यता है कि बाहुबल और हिंसा के जरिये अपना दबदबा बनाया जा सकता है.