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चिंताजनक है कांग्रेस का पराभव

आशुतोष चतुर्वेदी

संपादकीय प्रभात आशुतोष चतुर्वेदी प्रधान संपादक, प्रभात खबर ashutosh.chaturvedi सोशल मीडिया पर एक मैसेज वायरल है कि अगर आप मुंबई के चर्च गेट से उत्तर भारत की ओर जा रहे हैं, तो आपको पंजाब से पहले कांग्रेस का कोई सांसद नहीं मिल पायेगा. मैसेज भले ही एक तंज हो, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि लोकसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए बेहद निराशाजनक हैं. कई राज्यों में तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ है. ऐसे राज्यों की सूची खासी लंबी है. कांग्रेस दिल्ली, गुजरात, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, ओड़िशा, त्रिपुरा, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, दमन दीव, दादर नगर हवेली, लक्षद्वीप और चंडीगढ़ में अपना खाता तक नहीं खोल पायी. और तो और, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी अमेठी सीट को भी नहीं बचा पाये. इसके पहले राहुल गांधी अमेठी से लगातार तीन बार सांसद चुने गये थे. अमेठी से पहले भी गांधी परिवार लड़ता रहा हैं. इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में संजय गांधी के हारने के बाद यह दूसरा मौका है, जब अमेठी से गांधी परिवार का कोई सदस्य हारा है. एक और रोचक तथ्य है कि इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनावों में राज नारायण ने इंदिरा गांधी को रायबरेली से हरा दिया था. इसके बाद से इस परिवार का कोई सदस्य चुनाव नहीं हारा था. इस बार कांग्रेस को पूरे देश में मात्र 52 सीटें मिलीं. 80 सीटों वाले उप्र से मात्र रायबरेली से सोनिया गांधी जीत पायीं. कांग्रेस की इन सीटों में 19 केरल और तमिलनाडु की 10 सीटें हटा दें, तो वह बाकी 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से मात्र 23 सीटें जीत पायी हैं. कांग्रेस को इस बार भी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाने का मौका नहीं मिलेगा. इसके लिए कम-से-कम 55 सीटें जरूरी हैं. यह दूसरा मौका होगा, जब लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं होगा. 2014 में भी कांग्रेस को 44 सीटें ही मिली थीं. लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष जरूरी होता है. लिहाजा कांग्रेस का सूपड़ा साफ होना चिंताजनक है. 1885 में स्थापित यह पार्टी आज अपनी प्रासंगिकता के लिए संघर्ष कर रही है. चुनाव में इस बार बहुत दिलचस्प बातें देखीं. कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों से दूरी बनाते हुए नरम हिंदुत्व की राह पकड़ी थी. राहुल गांधी हर छोटे-बड़े मंदिर में मत्था टेकते नजर आ रहे थे, जबकि कांग्रेस पर अल्पसंख्यकों की तरफदारी के आरोप लगते रहे हैं. कांग्रेस ने इस बार उनसे दूरी बनाये रखी. राहुल गांधी ने चुनाव में पार्टी की हार स्वीकार करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी को बधाई दी. कहा, इस पराजय की 100 फीसदी जिम्मेदारी उनकी है. लड़ाई विचारधारा की है और पार्टी की विचाराधारा जीतेगी. इन सबके बावजूद कांग्रेस के लिए ये नतीजे खतरे की घंटी हैं. वह अपने गढ़ों- कर्नाटक, राजस्थान, मप्र और छत्तीसगढ़ में भी बुरी तरह हारी है. उप्र में कांग्रेस का हश्र तो हम सबके सामने है. इस लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रचार की कमान खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने संभाली थी और उन्होंने आक्रामक प्रचार भी किया था. उन्होंने कर्ज माफी, ''न्याय'' और राफेल को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की. सैकड़ों रैलियां और रोड शो किये. इनमें भीड़ भी जुट रही थी. इससे आभास हुआ था कि राहुल गांधी कांग्रेस को पुनर्जीवित करने में सफल हो जायेंगे, पर ऐसा नहीं हुआ. भीड़ वोट में तब्दील नहीं हो पायी. राहुल ने सबसे ज्यादा प्रचार उप्र में किया, जहां कांग्रेस केवल एक सीट रायबरेली से जीत पायी. प्रियंका गांधी को पूर्वी उप्र और ज्योतिरादित्य सिंधिया को पश्चिमी उप्र की कमान सौंपे जाने की रणनीति भी कामयाब नहीं हो पायी. राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं. कुछ समय पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने एक ऐतिहासिक अवसर आया था, जब वह मप्र और राजस्थान में सत्ता की कमान युवाओं को सौंप सकते थे, लेकिन राहुल गांधी ने यह ऐतिहासिक मौका गंवा दिया. उन्होंने मप्र की कमान 72 वर्षीय कमलनाथ को सौंपी और जस्थान में 67 वर्षीय अशोक गहलौत को मुख्यमंत्री बना दिया, जबकि राहुल गांधी युवा नेतृत्व को मौका देकर राजनीतिक जोखिम उठा सकते थे. इन नतीजों का एक और संदेश भी है कि वंशवाद की राजनीति का दौर उतार पर है. इसे जितनी जल्दी कांग्रेस स्वीकार कर लेगी, उसके लिए उतना बेहतर होगा. एक बात और स्पष्ट हो गयी है कि लगातार प्रयासों के बावजूद राहुल गांधी को देश की जनता कांग्रेस के नेता के बतौर स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. प्रियंका गांधी भी कुछ कमाल नहीं दिखा पायीं. परिवारवाद की राजनीति से आने वाले सभी बड़े नेता इन चुनावों में हार गये. इनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, महबूबा मुफ्ती, डिंपल यादव, मीसा भारती, जयंत चौधरी, वैभव गहलौत, अशोक चव्हाण, मिलिंद देवड़ा और राहुल गांधी आदि शामिल हैं. सपा-बसपा-रालोद के महागठबंधन के बावजूद एनडीए उप्र में 64 सीटों जीतने में कामयाब रहा. आंकड़ों के अनुसार भाजपा को यूपी में 49.5% वोट मिले हैं, जबकि महागठबंधन को 38.97% हासिल हुए हैं. कांग्रेस का वोट प्रतिशत मात्र 6.26% रहा. माना जा रहा था कि गठबंधन उप्र में भाजपा का विजयी रथ रोकने में कामयाब हो जायेगा, लेकिन सपा-बसपा का वोट आपस में ट्रांसफर नहीं हुआ और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिला. नतीजों से स्पष्ट है कि कांग्रेस के अलग चुनाव लड़ने का नुकसान भी गठबंधन को हुआ. आकलन के अनुसार यदि कांग्रेस गठबंधन में शामिल होती, तो भाजपा की आठ सीटें कम हो जातीं. कांग्रेस बार-बार यह कह रही थी कि वह गठबंधन के वोट नहीं काटेगी, लेकिन भाजपा प्रत्याशियों को मिली जीत के अंतर से पता चलता है कि कांग्रेस ने गठबंधन के वोट ज्यादा काटे हैं. एक बात और, कांग्रेस ने कई राज्यों में गठबंधन किये. इनमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, केरल और तमिलनाडु शामिल हैं, लेकिन इन प्रदेशों में आखिरी वक्त तक सीट को लेकर सहयोगियों से सामंजस्य का अभाव रहा. कुछ महीने पहले राजस्थान, मप्र और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी, उन राज्यों में भी पार्टी का प्रदर्शन 2014 से भी खराब रहा. मौजूदा लोकसभा चुनाव कांग्रेसी नेताओं के सामने बड़ा अवसर था, लेकिन खींचतान की खबरें खूब सामने आयीं थीं. जैसा कि कांग्रेसी भी कहते हैं, उन्हें विपक्ष की जरूरत नहीं होती, उनकी अपनी पार्टी के लोग इस कमी को पूरा कर देते हैं. इन चुनावों में मतदाताओं ने कांग्रेस को स्पष्ट संदेश दिया है कि उसे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर भरोसा नहीं है, लेकिन कांग्रेस का ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो यह मानते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार के बिना कांग्रेस का वजूद नहीं रहेगा. कांग्रेस को यदि प्रासंगिक रहना है, तो उसे नेतृत्व, संगठन, रणनीति और कार्य संस्कृति में तत्काल बदलाव करने होंगे, अन्यथा उसके अप्रासंगिक होने का खतरा है.

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