कुछ अलग

बेहद खास है नाहन का मुहर्रम

Prabhat Khabar

कभी हिमाचल का बेंगलुरु कहे जानेवाले शहर ‘नाहन’ के पानी से लबालब तालाब मेहमानों व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं. हर साल मुहर्रम नाहन में एक खास शोकोत्सव बनके आता है.

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मोबाइल इस्तेमाल का सच

आलोक जोशी

फोन पर सिर्फ जरूरी बात करें. फोन पर फालतू बात न करें. ध्यान रखें, हो सकता है किसी को कोई बेहद जरूरी ...

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इस्तेमाल और लत का समझें फर्क

निखिल पहवा

सूचना के लिहाज से हम एक ऐसे दौर में हैं, जहां सोशल मीडिया के जरिये हर पल कुछ न कुछ देखते-पढ़ते या ...

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अपरिपक्वों को किनारे करें मोदी

प्रभु चावला

दूरी परिप्रेक्ष्य देती है, फिर विश्लेषण और प्रवृत्ति की प्राप्ति होती है. पिछले सप्ताह महाराष्ट्र ...

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चीन की विस्तारवादी योजना

डॉ अश्विनी महाजन

श्रीलंका के ‘हंबनटोटा’ बंदरगाह पर कब्जे को पुनः याद करवाते हुए, चीन अब केन्या के अत्यंत लाभकारी ...

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एक लाख एकल विद्यालय का संकल्प पूरा

वर्ष 1988 में झारखंड के धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड के एक छोटे-से गांव से स्वर्गीय मदनलाल अग्रवाल के प्रयास से एकल विद्यालय अभियान का शुभारंभ हुआ था. इस प्रखंड में एक वर्ष में दस ऐसे विद्यालय स्थापित हो गये. इसी के साथ इस संबंध में एक कार्यपद्धति विकसित होने लगी. यह उल्लेख करते हुए रोमांच एवं गौरव का अनुभव हो रहा है कि 31 वर्ष होते-होते ''एक लाख एकल विद्यालय'' का चिरप्रतिक्षित महत्वाकांक्षी सपना आज यानी छह दिसंबर, 2019 को पूरा हो रहा है. इस लक्ष्यपूर्ति के पीछे आध्यात्मिक अंतर्कथा है.

छप्पर के ऊपर

कक्का कह रहे थे कि छत का मिजाज अलग होता है. वह बड़ा होता है. ऊंचा होता है. उसकी बनावट भी दूसरे तरह की होती है. वह किसी भी ओर से तनिक भी झुका हुआ नहीं होता है. उस पर हद से हद मनी प्लांट की लताओं को चढ़ाया जा सकता है या कुछ फूल के गमले लगाये जा सकते हैं.

अब कहां बरात में जाना!

शादियों का मौसम आ गया है. बरात में जाने के निमंत्रण आ तो रहे हैं, मगर शायद ही कोई जाये. एक समय में बरात में जाना बहुत सम्मान की बात मानी जाती थी. यही वजह है कि आज भी जब कोई आदमी ज्यादा नखरे दिखाता है, तो लोग उससे कहते हैं कि बरात में आये हो क्या.

अवसरवादी लेखक!

यह बात मैं किसी लेखक से ''डिस्कस'' कर नहीं सकता, तो सोचा अपनी पत्नी से ही डिस्कस किया जाये. जब मैंने उसे बताया कि मैं ''ईमानदार'' लेखक न बनकर ''अवसरवादी'' लेखक बनने जा रहा हूं, तो यह सुनकर वह बहुत प्रसन्न हुई. मुझे कई किस्म की दुआएं दीं. मेरा उत्साह भी बढ़ाया और कहा- ''तुमने यह निर्णय लेकर मेरे मन का बोझ हल्का कर दिया. ध्यान रखना, समाज में इज्जत ईमानदार लेखक की कम, अवसरवादी लेखक की अधिक होती है.''

उच्च क्वालिटी के नीच नेता!

वह सेल्समैन अड़ा था कि मुझे 57 इंच का एचडी क्वालिटी का टीवी बेचेगा. मैंने निवेदन किया- नागिन, भूत, चुड़ैल, बेवफाई और नेता ही देखने हैं टीवी पर, तो काहे 57 इंच में देखे जाएं. बवाल छोटे भले, 14 इंच में ही देख लो, या छह इंच के मोबाइल में ही देख लो या देखो ही क्यों. टीवी सेल्समैन बोला- देखिए एचडी यानी हाई डेफिनिशन टीवी में देखिए, साफ दिखता है सब कुछ. बड़ी स्क्रीन में देखिये 57 इंच में, एकैदम वड्डा-वड्डा दिखेगा.

दिसंबर : एहसास का महीना

दिसंबर का आगमन होनेवाला है. गुनगुनी धूप, बर्फीली हवाएं, हरसिंगार के झरते फूल, नयनाभिराम गाछों की लरजती डालियां और कोहरे की चादर. चटख रंग की तितलियां सों-सों की आवाज कर एक-दूजे के पीछे भागने लगती हैं, तो यह उपवन में बहार छाने का संदेश है. यह जाड़े की नर्म धूप में खिलनेवाले फूलों का मौसम है, जो बसंत की बहार से अलग है. घास, पंखुड़ियों और पत्तों पर मोती-सरीखा ओस की बूंदें रातभर वातावरण में हो रही गतिविधियों की गवाह होती हैं.

एमएलए पैकर्स एंड मूवर्स सेवा

हमारे देश में अक्सर कोई नेता कहने लगता है कि लोकतंत्र की हत्या हो गयी. ऐसी अफवाह हजारों बार पहले भी फैली है, लेकिन लोकतंत्र का शव कभी बरामद नहीं हुआ. जब तक शव बरामद न हो, तब तक मरण की गारंटी कोई नहीं ले सकता. बगदादी का उदाहरण सामने है.

एक सांस की कीमत तुम क्या जानो

अंग्रेजी में एक लाइन है, ''अर्थ हैज म्यूजिक फॉर दोज हू लिसन'' (कायनात का अपना एक संगीत है, उनके लिए जो इसे सुन सकते हैं). यह लाइन उस मंजर को देखते हुए मेरे कान में गूंज रही थी. चांदनी रात और सामने बर्फ से ढके हिमालय पर एक खास कोण से पड़ रही चांदनी. उस वक्त मेरी जो कैफियत थी, उसे सम्मोहित जैसे शब्द में पिरोया ही नहीं जा सकता.

बीस-पच्चीस साल बाद

क्या आपसे भी 20-25 साल बाद के दृश्यों का अनुमान लगाने को कहा जाता है? क्या आप उन दृश्यों को साफ-साफ देख सकते हैं? नहीं देख सकते. लेकिन यह जरूरी नहीं कि आज आप जैसा अनुमान करेंगे, कल का दृश्य बिलकुल वैसा ही हो. इसलिए सिर्फ अनुमान से मनुष्यों को संतोष नहीं हुआ.

डॉक् सांवलिया होय

डॉक्टर कई प्रकार के होते हैं, पर मुख्य रूप से उनकी दो ही श्रेणियां होती हैं- एक तो वे, जो होकर भी नहीं होते और दूसरे वे, जो न होकर भी होते हैं. मजेदार बात यह है कि न होकर भी होनेवाले डॉक्टर, होकर भी न होनेवाले डॉक्टरों की वजह से ही हो पाते हैं. डॉक्टरों की ये श्रेणियां प्रवृत्तिवार हैं, जो उनकी विषयवार श्रेणियों में भी बदस्तूर पायी जाती हैं.

विशेष बैठक में नशा निवारण

नशा निवारण ठीक से नहीं हो रहा था. सरकारी व गैर-सरकारी प्रयासों से जितनी अच्छी खबरें छपवायी जा रही थीं, सब झूठ साबित हो रही थीं, क्योंकि पिछले कुछ दिन से अखबारों ने अनेक चित्र समाचार छापकर साबित करना शुरू कर दिया था कि नशे के सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक सौदागर, पुलिस व सरकार से ज्यादा चतुर हैं.

बरगद बाबा की चिट्ठी

अक्सर गांव में चाची कहती थीं कि बूढ़े बाबा के ढिंग जा रही हैं. यानी बहुत पुराने बरगद के पेड़ के पास बैठने जा रही हैं. बरगद की जटाएं जमीन तक लटकी हुई थीं. बूढ़े लोगों ने बचपन से इस पेड़ को ऐसे ही देखा था. पेड़ पर कौए, गिलहरियां, तोते, बंदर यानी हर एक के लिए जगह थी. कभी-कभी बिल्लियां भी उस पर चढ़ जाती थीं.