कुछ अलग

बेहद खास है नाहन का मुहर्रम

Prabhat Khabar

कभी हिमाचल का बेंगलुरु कहे जानेवाले शहर ‘नाहन’ के पानी से लबालब तालाब मेहमानों व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं. हर साल मुहर्रम नाहन में एक खास शोकोत्सव बनके आता है.

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कर्ज सस्ते होने के आसार

सतीश सिंह

मुख्य रूप से ईंधन की कीमत में गिरावट की वजह से जुलाई महीने में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) दर ...

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जनसंख्या नियंत्रण की चुनौती

आशुतोष चतुर्वेदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से अपने संबोधन में देश की बढ़ती जनसंख्या ...

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कश्मीर पर संरा का पाक को साफ जवाब

प्रो सतीश कुमार

अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद पाकिस्तान बेचैन है और चीन गुस्से में है. बीते शुक्रवार चीन द्वारा ...

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लोकतंत्र पर गर्व का क्षण

नवीन जोशी

ब्रिटिश हुकूमत से आजाद होने के हिलोरें मारती भारतीय तमन्ना से उपजे आंदोलन के दबाव में जब भारत को ...

Columnists

सड़कों पर भारतीय समाज के दर्शन

एक बार मैंने अपने एक विदेशी मित्र से पूछा कि भारत में आकर आपको सबसे निराली बात क्या लगती है? तो उसने थोड़ा हिचकते हुए बताया कि भारत के शहरों में सड़कें उसे सबसे विचित्र लगती हैं.

बंद कमरे का संयुक्त राष्ट्र

देवरानी ने कहा जेठानी से चल ससुरजी के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दें- बहुत परेशान करते हैं ससुरजी. जेठानी ने समझाया- ना छोटी, ऐसे खुलेआम उनकी बुराई करेंगे, तो आफत हो जायेगी. ससुरजी ने रकम लगायी है मेरे हजबैंड के प्लांट में. ससुरजी तो माल बिकवा रहे हैं, इनकी फैक्ट्री का. देख खुलेआम ना करेंगे ससुरजी की बुराई. देवरानी बोली- मैं बुरी तरह जल रही हूं. मैंने अगर उनकी बुराई ना की, तो मैं भस्म हो जाऊंगी.

इस बार का स्वतंत्रता दिवस खास

इस बार का स्वतंत्रता दिवस कुछ खास है. सरकार ने सत्तर वर्षों से लागू अनुच्छेद 370, जिसे लोगों को अनुच्छेद के बजाय धारा कहना ज्यादा पसंद है और इसलिए हम भी उसे धारा 370 ही कहेंगे, हटा दी है और विरोधी दल नहीं समझ पा रहे कि करें तो क्या करें? यह तब है, जब सत्ताधारी दल ने चुनाव में जनता से वादा कर रखा था कि हम इसे हटायेंगे. विरोधियों को लगता होगा कि यह भी बाकी वादों की तरह होगा, सो वे निश्चिंत रहे.

प्रलेस के सोच में बदलाव जरूरी

देश के सबसे बड़े और पुराने लेखक संगठन- प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस)- का अधिवेशन मध्य सितंबर में जयपुर में आयोजित होगा. साल 1936 में कायम हुए इस संगठन के सामने आज अनेक चुनौतियां भी हैं. इनमें से एक पदाधिकारी मंडलों में महिलाओं का न होना है.

मोबाइल के बहाने

जब से जीवन में मोबाइल फोन का प्रवेश हुआ है, इसके बिना अब एक दिन तो क्या, एक मिनट रहना मुश्किल हो चला है. यही नहीं, चौबीसो घंटे हाथ में फोन रहने से झूठ बोलने, बहाने बनाने, बात करने से बचने के तरीकों में इतना बदलाव आ गया है कि इस पर महाग्रंथ लिखे जा सकते हैं.

ईद रहमतों की बारिश का दिन

‘ईद-अल-अजहा’ इस्लाम का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार है. यह त्योहार सुन्नत-ए-इब्राहीमी के नाम से भी जाना जाता है. जिस तरह से ईदुल फितर रमजान की खुशी में मनाया जाता है, ठीक उसी तरह से ईद-अल-अजहा भी हज की खुशी में मनाया जाता है. यह हर साल इस्लामी महीने जिल हिज्जा यानी हज के महीने की 10वीं तारीख को पड़ता है. इस दिन सभी मुस्लिम पहले ईदगाह जाकर खास नमाज अदा करते हैं और उसके बाद अपने-अपने घरों में कुर्बानी करते हैं.

जिंदादिल रहने का नाम जिंदगी

युवा पीढ़ी अक्सर कहती है कि जिस काम में वह संलग्न है, उससे उसका मन भर गया है. वह कुछ नया करना चाहती है. उसे ढेर सारी स्वतंत्रता चाहिए, अपने मन की करनी है और किसी दबाव में तो हरगिज नहीं. ऐसा क्या है, इस पीढ़ी में जिसे हर काम की व्याकुलता रहती है? काम पकड़ने की भी और काम छोड़ने की भी.

राष्ट्रपिता का वह आह्वान

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का 150वां शताब्दी वर्ष चल रहा है. हम अपने देश की आजाद हवा में सांस ले सकें, इसके लिए गांधीजी के साथ अनेक महापुरुषों ने आंदोलन किये, अंग्रेजों से लड़ाइयां लड़ीं और अपनी कुर्बानी देने से कभी पीछे नहीं हटे.

अमरूद नहीं ये खुशियां हैं!

आजकल अमरूद के पेड़ फलों से झुक गये हैं और आते-जाते लोगों के आकर्षण के केंद्र में रहते हैं. खेतों की ओर निकले कृषक और स्कूल की ओर जाते बच्चे पके अमरूदों को निहारते हुए चलते हैं. अगर कोई न हो, तो पहले दो-चार तोड़ लेते हैं, फिर आगे बढ़ते हैं. कभी-कभी एक अमरूद के लिए दो बच्चों में उठ्ठम-पटका भी हो जाता है. यह सब पूरे सावन-भादो चलता ही रहता है.

आतंकवाद रोकने की बड़ी पहल है यह निर्णय

धारा 370 की पहली बात तो ये थी कि कोई कश्मीरी लड़की अगर बाहर के लड़के से शादी कर ले तो उसके कई अधिकार समाप्त हो जाते थे. उसको संपत्ति का अधिकार नहीं मिलता था. उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते थे. एक तरीके से उसका जम्मू-कश्मीर के साथ संपर्क ही टूट जाता था. इतना ही नहीं, धारा 370 लागू होने की वजह से एक विधान, एक निशान, एक प्रधान का कॉन्सेप्ट भी लागू नहीं हो पा रहा था. जम्मू-कश्मीर का अपना अलग संविधान है, सारी धारायें अलग हैं.

मंदी है, तो कार फेंक कर बताओ!

मंदी है, ऐसी बातें फिजूल में कही जा रही हैं. वास्तव में मंदी कहीं नहीं है. यूं आंकड़े बता रहे हैं कि देश की सबसे बड़ी कार कंपनी की बिक्री जुलाई 2019 में जुलाई 2018 के मुकाबले करीब 36 प्रतिशत गिरी. पर ये आंकड़े झूठे टाइप लग रहे हैं.

ऊंच की नीच

जिंदगी में नीच को बड़ा ऊंचा स्थान प्राप्त है. इतना ऊंचा स्थान तो खुद ऊंच और उसे हासिल करनेवाले ऊंचे को भी प्राप्त नहीं. कोई ऊंच-नीच होने पर नीच ही अपनी नीचता के बल पर उसे ऊंच में बदलता है. नीच की यह ऊंचाई देख ऊंचा भी यहां नीच होने के लिए तरसता है. और क्यों न हो, ऊंचा जब अपनी ऊंचाई प्राप्त ही नीचों के बल पर करता हो.