कुछ अलग

बेहद खास है नाहन का मुहर्रम

Prabhat Khabar

कभी हिमाचल का बेंगलुरु कहे जानेवाले शहर ‘नाहन’ के पानी से लबालब तालाब मेहमानों व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं. हर साल मुहर्रम नाहन में एक खास शोकोत्सव बनके आता है.

Columns

5जी से रखें चीनी कंपनी को बाहर

अश्विनी महाजन

डिजिटल सेलुलर नेटवर्क के लिए 5वीं पीढ़ी की वायरलेस तकनीक है 5जी. जिस मोबाइल फोन का हम उपयोग करते ...

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राजनीतिक विमर्श की भाषा सुधरे

अपर्णा

पिछले एक-डेढ़ दशक से राजनीतिक विमर्श की भाषा में जो बदलाव आया है, वह एक चिंतनीय प्रश्न है. चाहे वह ...

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असली चुनौती तेज क्रियान्वयन की

अजीत रानाडे

पिछले साल के स्वतंत्रता दिवस भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र नोदी ने अगले पांच वर्षों के दौरान ...

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नयी रणनीति तलाशे भारत

पुष्पेश पंत

ईरान के लोकप्रिय और रणकुशल सेनानायक कासिम सुलेमानी की अमेरिकी राष्ट्रपति के आदेशानुसार हत्या ने ...

Columnists

नेताओं में एबीसीडीई का गुण!

बहुत साल पहले ‘नेताजी’ शब्द का बड़ा महत्व था. कहीं नेताजी का अर्थ आप सुभाष चंद्र बोस से लगा रहे हैं, तो मुझे क्षमा कीजिये. मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं. मैं आज के नेताजी की बात कर रहा हूं. एक समय था जब ‘नेताजी’ का अर्थ सत्य, अहिंसा, धर्म और न्याय शब्द का पर्याय हुआ करता था. किंतु आज इसके विपरीत काम करनेवाला ही नेताजी कहलाता है.

किताब का प्रमोशन और लेखक

दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला खत्म हो गया. मेले में किताबों का लोकार्पण बड़ी संख्या में किया जाता है. सोशल मीडिया पर धूम रहती है. पहले लेखक का काम होता था लिखना और प्रकाशक का काम पुस्तक बेचना और पुस्तक समीक्षा के लिए पुस्तक भेजना. लेकिन, इन दिनों बहुत कम प्रकाशक समीक्षा के लिए पुस्तक भेजते हैं.

डॉ खगेंद्र ठाकुर : साहित्यिक आंदोलन का परचम

हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक डॉ खगेंद्र ठाकुर का जाना हमारे समाज और साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है. प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बननेवाले वह उसके वरिष्ठतम सदस्य भी थे और पूर्व महासचिव भी थे. वह जनशक्ति के संपादक भी रहे और उन्होंने दो दर्जन के करीब किताबें भी लिखी हैं.

खिलजी का कनॉट प्लेस!

ज्ञान चर्चा हो रही थी. एक ज्ञानी ने कहा- पब्लिक बहुत चालू और लालची टाइप होती है. कुछ रकम में उसे खरीदा जा सकता है. न जाने कब से यही सब हो रहा है. अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा की हत्या कर दी थी, तो उसके खिलाफ दिल्ली में सारी पब्लिक एक हो गयी थी. खिलजी ने चांदनी चौक में अशर्फियां बंटवाना शुरू किया, पब्लिक ने अशर्फियां अंदर कीं और खिलजी के समर्थन में अपना बयान बाहर किया.

धर्म और आदमी का रिश्ता

अपने सभी पर्यायों के साथ धर्म और आदमी का रिश्ता अंडे और मुर्गी के रिश्ते जैसा है. पता ही नहीं चलता कि किसने किसे बनाया. वैसे दिमाग से काम लिया जाये, हालांकि धर्म के मामले में कोई दिमाग से काम लेता नहीं है, फिर भी अगर ले लिया जाये, तो साफ पता चल जाता है कि आदमी ने ही धर्म को बनाया होगा अपनी सुविधा के लिए.

ताकि समृद्ध हो ज्ञान-परंपरा

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक तस्वीर टहल रही थी. हेयर ड्रेसर सैलून वाली वह तस्वीर केरल की थी, जिसमें नाई एक आदमी का बाल काटता दिख रहा है, वहीं उसके पीछे बाल कटवाने के लिए अपनी बारी के इंतजार में बैठा दूसरा आदमी किताब पढ़ रहा है. सैलून में एक बड़ा-सा बुकशेल्फ है, जिसमें सैकड़ों किताबें रखी हुई हैं.

यूं भी संकल्प से बचाइए पानी!

हर बार जब नया साल आता है, तो उस खास मौके पर उसके पहले महीने की पहली तारीख पर लोगों के बीच कोई न कोई ''संकल्प'' लेने की ''परंपरा'' है. लोग कुछ अच्छा करने का संकल्प लेते हैं, लेकिन, मैं उन सबसे कुछ अलग संकल्प लेता हूं. मैं ''सर्दी में न नहाने'' का संकल्प लेता हूं. काफी चिंतन-मनन के बाद एक यही संकल्प मेरी समझ में आता है.

सद्मार्गों का मोहल्ला!

लोकप्रिय विकासजी की अनेक राष्ट्रीय योजनाओं के तहत पूरे देश में नभ, जल व थल मार्गों का निर्माण जारी है. कुछ ऐसे मार्ग भी हैं, जिनके बारे में आज तक संजीदगी से विचार नहीं हो सका है. हमारे यहां जिंदगी की शुरुआत से ही समाजसेवकों, गुरुओं, नेताओं व मंत्रियों के माध्यम से किसी न किसी महापुरुष के पदचिह्नों पर चलने का नैतिक आह्वान किया जाता है.

इतने साल पुराने रिकॉर्ड!

ठंड है, यह बात ऐसी है इन दिनों जैसे कोई कहे कि राजनीति में करप्शन है. है भी, बिल्कुल है, बिल्कुल साफ तौर पर है. राजनीतिक करप्शन, पराली के धुएं, डेंगू बुखार और सर्दी के बावजूद आम आदमी जिंदा रह जाता है, ताकि अगले चुनाव में वोट कर सके और डिस्काउंट पर बिकनेवाले तमाम आइटम खरीद सके. आम आदमी का इससे ज्यादा इस्तेमाल लोकतंत्र में नहीं है.

जीवन से प्यार का संकल्प

अब हम नये साल में हैं. घर की सुख-शांति बनाये रखने का और नौकरी के उच्चतम शिखर तक पहुंचने का संकल्प तो हम हर साल लेते हैं. चलिए, उनसे इतर इस बार कुछ ऐसा संकल्प लें, जिसमें प्रकृति और पर्यावरण का हित हो तथा परोपकार की भावना निहित हो.

पूस का सर्द मौसम और गेहूं

कक्का गेहूं की सिंचाई करके लौटे ही थे और घूरे का इंतजाम कर रहे थे. कहने लगे कि पछिया को देखो, बावली हुई जा रही है. अब कनकनी बढ़ेगी. फिर वे बताने लगे कि पूस चढ़ आया है. यह जाड़े की जवानी का महीना है. भर पूस जाड़ा अपनी पूरी ताकत के साथ राज करेगा. पछिया इसमें इसका साथ देगी. पूस में हवाएं सर्द होकर बहने लगती हैं. ठंड महाराज ओस कुहासा कुहरा पाला और सर्द हवाओं के साथ मिलकर ऐसा दृश्य रचते हैं कि जीवन के सामने जम जाने का खतरा उत्पन्न हो जाता है.

किशोरावस्था से आगे यह सदी

लीजिये इक्कीसवीं सदी की किशोरावस्था अब खत्म हुई. अब वह उन्नीस साल की होकर बीसवें साल में प्रवेश करेगी, यानी अब उससे तर्कसंगत व्यवहार की उम्मीद होगी.