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कितना लाभप्रद होगा युवा भारत

पवन के वर्मा

आज यह हमारे मुख्य कथनों में शामिल हो चुका है कि भारत विश्व के युवा राष्ट्रों में एक है. आंकड़े यह बताते हैं कि यह दावा उचित ही है, क्योंकि हमारी आबादी के लगभग 65 प्रतिशत लोग 35 वर्षों से कम उम्र के हैं.

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बदलते कश्मीर का प्रमाण

अवधेश कुमार

आतंकवादी संगठन अलकायदा प्रमुख अयमान अल जवाहिरी अचानक सामने आया है. अपने 14 मिनट के वीडियो में वह ...

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महत्वाकांक्षी लक्ष्य की चुनौतियां

प्रभु चावला

गणितज्ञ सदियों से ब्रह्मांड की गुत्थियां सुलझाने के लिए संख्याओं का इस्तेमाल करते रहे हैं. ...

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वैश्विक पटल पर दम दिखाता भारत

अश्विनी महाजन

हाल में आयोजित जी-20 सम्मेलन में डेटा के मुक्त प्रवाह के संबंध में अमेरिका, जापान एवं अन्य विकसित ...

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मझधार में कांग्रेस पार्टी

आशुतोष चतुर्वेदी

किसी भी लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष जरूरी होता है, लेकिन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और अन्य दलों की ...

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आतंक पर नकेल

मुंबई में आतंकी हमलों के तुरंत बाद कानून बनाकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) का गठन हुआ था. दस सालों के अपने अस्तित्व में इस संस्था ने आतंक पर अंकुश लगाने की दिशा में अनेक उपलब्धियां हासिल की है.

बदल गयी गंवई संस्कृति

हाल ही में फेसबुक पर एक तस्वीर देखी थी. किसी ने हथेली पर रखी लाल, चमकीली मखमल सी रामजी की गुड़िया पोस्ट की थी. इसका जीव वैज्ञानिक क्या नाम है, मुझे नहीं पता, मगर बचपन से बारिश के दिनों में हरी-हरी घास के बीच ये दिखायी देती थीं. बच्चे इन्हें खोज-खोज बटोरते फिरते थे. और माता-पिता अपने बच्चों को डांटते थे कि उन्हें वापस छोड़ दो, नहीं तो मर जायेंगी.

ये कैसा न्यू इंडिया है

हमारे प्रधानमंत्री जी का एक स्लोगन है ''न्यू इंडिया'', परंतु आज की परिस्थिति देख कर नहीं लगता कि हमारा देश न्यू इंडिया बनने के पथ पर अग्रसर है.

नयी चुनौती !

तेजी से बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिकीकरण ने प्रायः जंगल और जीव जंतुओं को बड़े स्तर पर प्रभावित किया है, जिससे आज पर्यावरण और जल संकट सब के सामने है. एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार आज इस नाजुक समय में पूरे भारत के तीन गुने भू-भाग पर घने जंगलों की जरूरत है अर्थात 90 करोड़ हेक्टेयर अर्थात पूरे अमेरिका के बराबर जमीन पर. कार्बन उत्सर्जन को अवशोषित करने के लिए यह जरूरी है.

आंकड़ों की बाजीगरी

एक खबर पढ़ी कि भारत में 2006 से 2016 के बीच दस सालों में 27 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर निकल गये हैं और 44 लोग प्रति मिनट गरीबी से मुक्त होकर अमीर हो रहे हैं. यह जानकारी संयुक्त राष्ट्र संघ और एक अमेरिकी संस्था ऑक्सफोर्ड पोवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनीशिएटिव की संयुक्त रिपोर्ट की तरफ से जारी की गयी है.

जल शक्ति का विस्तार

जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी, भूजल का लगातार दोहन तथा वर्षा जल के बेकार बह जाने जैसे कारणों से भारत समेत दुनिया के विभिन्न हिस्से पानी की कमी से जूझ रहे हैं. हमारे देश में 65 फीसदी से ज्यादा जरूरत भूजल से पूरी होती है. सालाना बारिश का 25 फीसदी से कुछ अधिक पानी ही इस्तेमाल हो पाता है.

संयुक्त परिवार के टूटने का मर्म

एक समय था, जब लोग संयुक्त परिवार में एक साथ रहते थे. जिसका जितना बड़ा परिवार होता, वह उतना ही संपन्न और सौभाग्यशाली माना जाता था.

रिक्त पदों पर अंकों पर आधारित बहाली बंद हो

आज लगभग हर सरकारी विभाग में अंकों के आधार पर बहाली चल रही है. सरकार को ऐसा लगता है कि उसने रिक्तियों को भर कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली. लेकिन, क्या कभी फॉलोअप होता है कि नियुक्त कर्मी अपनी जिम्मेदारी दक्षता से निभा रहे हैं या फिर हर माह सिर्फ वेतन उठा रहे हैं. आज हर कर्मी अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहता है.

सबमर्सिबल के इस्तेमाल पर रोक लगाये सरकार

बिहार में इस बार गर्मी के मौसम में पीने के पानी के लिए हाहाकार मच गया. गांव से लेकर शहरों तक में पीने का पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा था. शहरों में सरकारी मशीनरी के द्वारा पीने का पानी उपलब्ध करवाया जाता रहा. लेकिन गांवों के जिस टोले व मुहल्ले में पानी की किल्लत थी वहां की जनता को बहुत कठिनाई झेलनी पड़ी, क्योंकि गांव के सभी तालाब, पोखर, कुएं सूख चुके थे और चापाकल भी जवाब दे गये.

अतिक्रमण के शिकार तालाबों का हो जीर्णोद्धार

बिहार हर साल प्राकृतिक आपदा का शिकार होता रहा है, जिसमें बाढ़ और सुखाड़ मुख्य है. इस साल भी जुलाई के प्रथम सप्ताह में मॉनसून की पहली बारिश से कोसी, गंडक, बागमती के अलावा अन्य बरसाती नदियां उफान पर हैं. वहीं, राज्य सरकार ने कुछ ही दिन पहले जानकारी दी थी कि राज्य के ढाई लाख तालाबों में मात्र 30 हजार ही बचे हैं. शेष अतिक्रमण के शिकार हो गये हैं या पूरी तरह धरातल में समा गये हैं.

बेहतरी की उम्मीद

तीन दशकों से जारी कश्मीर समस्या के फौरी समाधान की अपेक्षा करना सही नहीं होगा, परंतु कुछ महीनों से हालात में हो रहे सकारात्मक सुधारों से भविष्य के लिए उम्मीदें बंधती हैं. कुछ सालों से सरकार ने एक तरफ अलगाववादियों और आतंकवादी समूहों पर अंकुश लगाने की कवायद की है, तो दूसरी ओर विकास एवं कल्याण कार्यक्रमों के जरिये कश्मीरी अवाम में भरोसा पैदा करने की कोशिश की है. राज्य के अस्थिर क्षेत्रों के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के कारण इस साल के पहले छह महीनों में घुसपैठ की एक भी घटना नहीं हुई है. ऐसा कई सालों में पहली बार हुआ है.

हार के स्पांसर क्यों नहीं

क्रिकेट के विश्व कप में सेमीफाइनल में भारतीय टीम क्या हारी, शोक छा गया है. सिर्फ दर्शकों में नहीं, स्पांसरों में भी जिन्होंने वर्ल्ड कप में पैसा लगाया है. भारत बाहर हो जाये, तो टूर्नामेंट को भारतीय दर्शक न मिलते. भारतीय दर्शक मैच न देखें, तो मैच का हाल राजनीतिक दलों के संसदीय दल की बैठक जैसा हो जाता है. बैठक है, पर रौनक नहीं है.