• प्रेम के मौसम में प्रेमरसिया पुरबिया उस्ताद महेंदर मिसिर का जन्मदिन

    बसंत जब उफान पर होता है और प्रेम का महीना उत्सवधर्मिता की ओर अग्रसर होता है, वैसे मौसम में महेंदर मिसिर की जयंती मनायी जाती है. वैसे तो महेंदर मिसिर को लोकगायकी व लोकरचना की दुनिया में पुरबी का जनक, पुरबी का पुरोधा आदि कहा जाता है. मैं उन्हें पुरबिया उस्ताद कहती हूं. पुरबी गायन के वे पर्याय थे या यूं कहें कि पुरबी को एक आकार देते हुए विस्तार देने में उनकी अहम भूमिका थी.

  • झारखंड के गांवों में घूमने के लिए कई दिनों तक हड़िया और सत्तू खाकर जिंदा रहा : कहानीकार शैवाल

    प्रकाश झा निर्मित ''दामुल'' और ''मृत्युदंड'' जैसी फिल्मों के लेखक और 300 से अधिक कहानियां लिख चुके गया (बिहार) के वरिष्ठ साहित्यकार शैवाल ने कहा कि रचनाकार के लिए यह जरूरी है कि वह जिंदगी में कमी को महसूस करे, नहीं तो वह जानेगा कैसे कि लोग अभाव में जीते कैसे हैं.

  • कविता : अश्क

    मन आकुल व्याकुल विरह विकल व्यथित बोझिल थकित हर पल। हां!सच में सुकून पाता है वह आंखों से आते जब अश्क निकल।।

  • कहानी : सियाबर सिपाही

    -लेखक : रमेश चंद्र- रे, आज दसे बजे से देख रहे हैं तू हरदम बेसाइडे हांकता है ? हट, सवारी के जाए दे.

  • कहानी : अतीत की खूंटी

    पिछले 8 साल से शेखर का मन उसी अतीत की खूंटी से टंगा है. खूंटी के सहारे कुछ यादें लटकी हैं , जिनमें से अधिकतर को जंग लगने लगा है. कितनी बार शेखर को लगा कि खूंटी उखाड़ कर फेंक दे पर कुछ था जो रोक रहा था. जाने क्या था...जो भी था शेखर के अहं को तुष्ट करता था. आदमी का अहं तुष्ट होना ही उसके जीवन की सार्थकता है

  • पढ़ें, सच के करीब ध्रुव गुप्त की लिखी एक कहानी ‘आस’

    ध्रुव गुप्त रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं. अपने संवेदनशील लेखन से वे साहित्य जगत में बहुत पसंद किये जाते हैं और उनके प्रशंसकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. वे लेखन में काफी सक्रिय हैं. उनकी कविताएं कोमल भावनाओं को समेटे गहरी चोट करती हैं, तो कहानियां झकझोर कर रख देती हैं. उनकी कहानियां सच के काफी करीब तो होती ही हैं, सामयिक भी होती हैं. आज पढ़ें उनकी ऐसी ही एक कहानी:-

  • ईश-वंदना

    जीवन के उद्‌गम में तुम हो सांसों की सरगम में तुम हो

  • ध्रुव गुप्त की प्रेम कविताएं : पहला प्रेमपत्र

    ध्रुव गुप्त पेशे से रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं, लेकिन उनकी कविताएं कोमल मानवीय भावनाओं पर आधारित रहती हैं, जो सीधे पाठकों के हृदय तक जाती हैं.

  • कहानी : पारिश्रमिक

    वार्डन- कौन है वो ? सरोजनी-मेरे मोहल्ले में रहता है मणिपुर का है. इस बार जब मैं मणिपुर से आ रही थी तो मैंने पूछा, क्या तुम भी रांची चलना चाहोगे ? वहां कुछ काम नहीं था, इसके पास दिन भर बेकार बैठा रहता था अत: मैंने सोचा, स्कूल में काम लग जायेगा, कुछ कमा लेगा.

  • कहानी : तीस साल

    बेवफ़ा औरत का दूसरा नाम है. और मर्द का...??? शादी के वक्त सबिया की उम्र बीस साल थी. वह एक खूबसूरत और शांत स्वभाव की लड़की थी. उसके पतले और लाल होंठ, तीख़े नैन-नक्श और काले लंबे बाल जो उसकी कमर के नीचे तक लहराते रहते थे, उसकी खूबसूरती में चार-चांद लगाते थे. सबिया जितनी खूबसूरत थी उतनी ही दीनदार भी थी. स्कूल के दिनों से ही वह नमाज़ की पाबंद थी.

  • जन्मदिन पर विशेष: ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें

    आज प्रसिद्ध साहित्यकार ध्रुव गुप्त का जन्मदिन है. उन्हें साहित्य की कई विधा में महारथ हासिल है. वे लगातार लेखन से जुड़े हैं. 1 सितंबर 1950 को बिहार के गोपालगंज में जन्मे ध्रुव गुप्त आईपीएस अधिकारी रहे हैं. आज उनके जन्मदिन पर पढ़ें उनकी कुछ चुनिंदा गजलें :-

  • कहानी : आरंभ

    सीता से उसकी पहली भेंट अकस्मात हुई. एक शाम वह हमेशा की तरह निरुद्देश्य भटक रहा था सड़कों पर.उसे एक मित्र मिला जो पटना यूनिवर्सिटी का छात्र था.वह रामेश्वर को अपने एक पुराने और रिटायर्ड शिक्षक के यहां ले गया.उसे आश्चर्य हुआ कि वह घर सीता का था.मास्टर साहब बीमार थे.घर के बरामदे में लेटे थे.बगल में दो-तीन कुर्सियां पड़ी थीं.बिजली गुम थी.वह मास्टर साहब को प्रणाम कर एक कुर्सी पर बैठ गया.मित्र ने उसका परिचय कॉलेज के मेधावी और होनहार छात्र के रूप में कराया.मास्टर साहब ने उससे इतिहास, सामान्य ज्ञान और फिल्मों से सम्बंधित कुछ सवाल किए जिनका एकदम सही-सही जवाब उसने दे दिया.

  • कवि गोपाल दास नीरज को श्रद्धांजलि

    गुलाब एक किताब से, आज गिर पड़ा यहां. गंध सब सिमट गयी, राह भी तो बंट गयी. हम सभी खड़े रहे, और वह गुजर गया.

  • कहानी : तहकीकात

    उस रोबदार दारोगा से मुंह से अनायास ही गाली निकल गयी. यह भी कोई जगह है आने की. रास्ते के नाम पर कच्ची पगडंडियां कीचड़ों से भरी. कहीं-कहीं तो घुटनों तक कीचड़. कुसुम का घर मिल गया था लेकिन तब तक दारोगा का मूड खराब हो चुका था. मिट्टी गारे से जोड़े गये ईंट और खपड़ैल मकान से एक अधेड़ उम्र का आदमी निकला. गांव-देहात में किसी के यहां पुलिस का आ जाना अभी भी बड़ी बात होती है. एक कान-दो कान अंदर ही अंदर बात चल रही है. श्याम दास की तो अब खैर नहीं. पुलिस तो किसी की नहीं होती. पड़ गया अब चक्कर में. दारोगा ने लकड़ी की पुरानी कुर्सी पर बैठते हुए पूछा तो आप चाचा हैं कुसुम के. श्याम दास ने गले में लपेटी गमछी को जोर से पकड़ा और बोला-जी.

  • एक लेखिका की डायरी : ‘नहीं, कभी नहीं’ के उस पार

    इन दिनों वॉन गॉग साथ रहते हैं. सुबह की चाय हम साथ पीते हैं, शाम को हम एक साथ देखते हैं थके हुए सूरज का घर जाना और आसमान पर रंगों का खेल. रात हम बारिशों की धुन सुनते हैं. हम साथ होते हैं लेकिन खामोश रहते हैं. मुझे यूं चुप होकर साथ रहने वाले दोस्त अच्छे लगते हैं. रात भर बारिश हुई. गॉग और मैं इस बारिश की बाबत खामोश रहे. वो इस वक़्त प्रेम पर अटके हुए हैं, शायद मैं भी. ‘इस वक़्त’ के बारे में सोचकर ‘किस वक़्त नहीं’ मुस्कुरा रहा है.

  • पढ़ें : गुलरेज़ शहजाद की पांच नज़्म

    स्याही सूखने से पहले(उर्दू), आग पे रखी रात (हिंदी), कुदरत बेहुस्न नहीं हुई है (अजीत कुमार आज़ाद के मैथिली काव्य संग्रह ''युद्धक विरोध में बुद्धक प्रतिहिंसा का उर्दू अ''नुवादअनुवाद, इस शह्र के लोग (माणिक बच्छावत के हिंदी काव्य संग्रह "इस शह्र के लोग"का उर्दू अनुवाद), चंपारण सत्याग्रह गाथा (भोजपुरी प्रबंध काव्य)

  • प्रकृति को समर्पित ध्रुव गुप्त की सात कविताएं

    पिछली रात मैं बहुत थका था कमरे में गर्मी बहुत थी और बिजली गायब मैंने खिड़की खोल दी और जमीन पर चादर बिछाकर गहरी नींद सो गया

  • स्वीकार नहीं करेगी माँ

    -विनय सौरभ- स्वीकार नहीं करेगी माँ कभी कि मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए भी उसने ईश्वर से ज्यादा मेरे बारे में सोचा नहीं स्वीकार करेगी कभी कि मेरे शहर से लौटने तक प्रार्थना में क्यों जुटी रहती थी वह हर आहट में मेरे मौजूद होने का अहसास क्यों बना रहता था उसके मन में माँ कभी नहीं मानेगी कि उसने मुझे सागर सा स्नेह.

  • मदर्स डे पर अनुज लुगुन की कविता - 'मेरी माँ, मैं और भेड़िये'

    मदर्स डे पर अनुज लुगुन की कविता - ''मेरी माँ, मैं और भेड़िये''

  • पंकज मित्र की कहानी ‘कफन रिमिक्स’

    -पंकज मित्र- (बाबा -ए- अफसाना प्रेमचंद से क्षमायाचना सहित) शायद घीसू ही रहा हो या गनेशी या गोविंद-नाम से फर्क भी क्या पड़ना था.

  • ध्रुव गुप्त की मां के लिए पांच कविताएं

    प्रसिद्ध साहित्यकार ध्रुव गुप्त की कविताएं कोमल भावनाओं को खुद में समेटे होती हैं, जो पाठकों के दिल तक जाती हैं और कई बार इंसान भावुक होकर रो भी पड़ता है. बात चाहे प्रेम कविता की करें या अन्य मानवीय संबंधों पर आधारित कविताओं की, कवि ध्रुव हर मोरचे पर प्रभाव छोड़ते हैं. आज पढ़ें उनकी पांच कविताएं जो मां को समर्पित हैं:-

  • ज्योति शोभा की प्रेम में पगी कविताएं

    दूर हो रही हूं तुमसे हर स्मृति के साथ मैं दूर हो रही हूं तुमसे कोई एक देश, एक समंदर या एक क्षितिज भर जितनी दूर एड़ियों की रगड़ से निकली नदी में बिछलती नौका जितनी दूर तुम किसे बताओगे कोई निद्रा थी जिसे स्मृति में तुमने अपनी गंध दी थी और मृत्यु में पुनर्जन्म मैं तुम्हें बार-बार कह रही हूं चाहे न सिहरो पहले स्वप्न में चाहे कान की लवें लाल होने तक देखो मेरे होंठ चाहे इस भीषण बरखा के पार खड़े होकर देखो मगर देखो स्मृति किस तरह भरती है पहले हड्डी के कोटर फिर केशों के ताल और फिर छीन लेती है तुम्हारी गंध नौका के गीले रंध्रों से मेरे ऐसा तरुवर होता है प्रेमी गीत गोविंद के अनचिन्हे कवि की याद में भादो का आकाश है भरा सूर्य का मुख निस्तेज झुका आलते के चंद्र पर नाग समान लहराते मंदार वृन्त इतने उद्वेलित जितने केश पाश थे गत रात्रि उस अग्नि शिखा प्रेयसी के वक्ष पर चार द्वार बंद होने पर जो खिड़की फांद आये और कविता कहे आधी अमृत आधी विष बुझी ऐसा तरुवर होता है प्रेमी क्वार की पहली सुबह कैलाश अधिपति की याद में बांह मोड़े वो निर्मोही के घुटनों पर और कहे मेरे बैरी कवि को डुबो आओ जब प्रेम का जल बढ़े हो सकते हो तुम कवि महज़ दो बरस में हो सकते हो तुम कवि अगर ठीक तरह न सोवो रातों को इसलिए नहीं कि सेज काठ की है वरन आलिंगन इतना सख्त है कि तुम्हारे पास कोई राह न हो सिवाय रोशनाई हो जाने के तुम लिख सकते हो कविता अगर पंद्रह के बाद गिन कर सोच में पड़ जाओ कि अभी तो याद की थी सितारों की फालसई रंगत क्या वो बदल गयी होगी सिर्फ होंठों का रुखड़ा हिस्सा, काट भर लेने से तुम रस भर सकते हो नज़्मों में इसलिए नहीं कि तुम्हारी कल्पना मांग रही है रंगत प्रेमी की बल्कि इसलिए की एक लकीर भर तुम्हारी सुर्खाब आरज़ू की रंग रही है उसकी पेशानी जबकि क़ायनात तुम्हारे सीने में मुंह छुपाये है कितना नश्वर है प्रेम लावण्य की परिभाषा लिए नर्मदा तट पर एक फूल देखता है मेरी कविता इशारा करता है उस टहनी की ओर जहां उसके करीब थे तुम्हारे हाथ ओह! कांप उठती है मेरी आत्मा कितना नश्वर है प्रेम सौंदर्य में अपने कितना क्षण भंगुर इस बार किंतु इस बार पहले जैसा नहीं हुआ उसने बगैर आवाज़ पुकारा बाहर सिर्फ एक आंसू गिरा इस बार मैंने कान को दरवाज़े से पुकार अंदर बैठाया, सेज पर और एक गीत था कोई होंठ गुनगुनाते थे किंतु कोई सुनता ना था इस बार बहुत कहा उसने चलो चलो चलो किंतु इतनी सुनसान थी देह सब चुपचाप रहा यही लिखा हम जहां होंठों तक जाकर लौट आते हैं वहीं गिरने लगते हैं हमारे शब्द मैं जहां चुप रहती हूं वो जगह है ठीक धान के खेतों में आधे घुटने तक मुझे लगता है तुम्हारा कविता लिखना व्यर्थ है अगर तुम यहां आकर चूम नहीं सकते मेरी चुप्पी मैनें भी जब जब लिखी कविता यही लिखा तुम्हें चूमना इन उन्माद में आये बीजों के महक उठने से ज्यादा अच्छा होता छोटी प्रतीक्षाओं वाले घर में लंबी लंबी प्रतीक्षाओं की कसमसाती छत से ऊब कर हम आते हैं छोटी प्रतीक्षा की तरफ यहां बहुत बड़े हैं घर दूर दूर हैं दीवारें दिन और रात के बीच इतना समय है कि मेरे कान तपते हैं संगीत सुनते हुए छोटी प्रतीक्षाओं वाले घर में तुम्हारे मुंह से निकली बात लहकती है अलाव के जैसी और मैं बंद हूं अंदर बंद हूं एक तिड़कती छाया में कितनी बंद हूं कि खुल सकती हूं दो बाहों को निकाल कर वस्त्रों से बह नहीं सकती अपनी एक करवट से दूसरी तक छोटी प्रतीक्षाएं छोटे-छोटे पोखर हैं हर पहर आते हैं बाहर झांकों तो कितने तो हैं तुम्हारे और मेरे देस के मध्य निमिष भर ले चलो अपने नगर पहली नज़र में ये दिन बाकी दिनों की तरह था उदास, उखड़ा हुआ स्वयं से मेघ की गलबहियां लिये किसी अनंत जलराशि पर ठहरा भूली डोंगी सा पर अंदर कोई घनी, कोई औचक किरण कौंधती हुई सी ज्यों अब फूटी, ज्यों अब आयी बाहर निष्प्राण काया से और फिर जब तक आकार लेती स्निग्धता जब तक कह पाती निमिष भर ले चलो अपने नगर तभी छा जाता नैराश्य अंधेरा घेर लेता चुपचाप पीछे से और पट बंद कर लेती इस आस पर कल तुम्हारी नज़र पर झिलमिलाती हो फुहार, जब द्वार झकोरे से खुले बिल्कुल नहीं सुहाता तुम चाहते हो न लिखूं अंश भर अपनी व्यथा विवश करती है प्रीति तुम्हें पहनाऊं कविताओं के वस्त्र अंतर्मन तक उतरने एक द्वार न शेष रहे काव्य पर लगे कीट, जो लगे बिल्कुल नहीं सुहाता तुम्हारा वर्ण कोई भी पुष्प स्पर्श कर ले इस विस्तार के लिए हल्की मटमैले से रंगों की कामना से भरी इस एक सांझ के बदले कई फींकी अकेली सांझ में लिखा करुंगी मैं कोई कविता के बदले तुम्हारी आवाज़ गाढ़ी , लयपूर्ण मेरे भरे स्वर से कहीं ज्यादा भरी ये सांझ कभी गीली होकर घर आएगी मैं सोचा करुंगी मेरी दिशा से आती मुझ से कहीं ज्यादा भींगी इस कविता की किस कामना पर ऊंगली रखोगे तुम अनंत से बरसती चन्द्रिका इस विस्तार के लिए तुम एकाकी जीना मेरे प्रिये एकाकी देखूंगी मैं अपना शिखर स्नात अपने ध्वल सौंदर्य से परिचय :ज्योति शोभा, अंग्रेजी साहित्य में स्नातक.

  • गांव की राजनीति को उकेरती है सिनीवाली की कहानी : ग्राम स्वराज

    उन्होंने गांव में दो मंजिला मकान बनवा रखा है, पर आते कम ही हैं गांव सालभर में एकाध बार या उससे भी कम. कैसे आ पाते, उन्हें फुरसत ही नहीं मिलती. फुरसत रहे भी कैसे, मुख्यमंत्री के खास आदमियों में इनकी गिनती होती है. संयुक्त सचिव हैं संयुक्त सचिव! पद के हिसाब से काम भी तो होता ही है.

  • कवयित्री भी थीं नगरवधू आम्रपाली, पढ़ें उनकी कुछ कविताएं

    गौतम बुद्ध के काल में और उनके बाद प्रचुर बौद्ध साहित्य रचा गया. पाली भाषा में रचित ज्यादातर पद्यात्मक रचनाएं बुद्ध के जीवन, समय और उनकी शिक्षाओं पर केंद्रित हैं. इनमें से ज्यादातर रचनाएं इतिवृत्तात्मक हैं, लेकिन उनमें कहीं-कहीं कवित्व की झलक भी मिल जाती है. बौद्ध साहित्य में दो ग्रन्थ ऐसे हैं जिनमें सिर्फ कविताएं हैं. पहला ग्रन्थ है ''थेरागाथा'' जिसमें बौद्ध भिक्षुओं की कविताएं संग्रहित हैं और दूसरा ग्रन्थ है ''थेरीगाथा'' जिसमें बौद्ध भिक्षुणियों की काव्य रचनाओं को जगह दी गई है.

  • साहित्य संध्या में आज पढ़ें, एक औरत के संघर्ष की कहानी ‘ बड़ी दी’

    -निभा सिन्हा- ऑफिस के केबिन में पहुंचकर अपना बैग टेबल पर रखते हुए मैंने मोहन को आवाज लगाई थी.

  • साहित्य संध्या: आज पढ़ें सत्यघटना पर आधारित कहानी ‘अम्मा’

    ''जानती है पुत्तर, मुझे तेरे बाऊजी के जाने का दुख कभी हुआ ही नहीं. कभी उनकी कमी भी महसूस नहीं हुई. न ही कभी रोना आया. याद तो आज तक कभी आयी ही नहीं. सच पूछ, तो उनके जाने के बाद मैं पहले से ज्यादा सुखी और खुश हूं. कहने को हमारी शादी हो गयी. बच्चे भी हो गये. हमने सारे काम साथ कर लिये. पूरी जिंदगी एक साथ, एक छत के नीचे गुजार दी. फिर भी प्यार कभी नहीं हुआ मुझे तेरे बाऊजी के साथ.''

  • साहित्य संध्या में आज पढ़ें बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति की कविताएं

    दुविधा जीवन क्या है, एक शांत झील है, जिसके किनारे बैठ कर मैं अनंत काल तक मछलियां मारता हूँ, या निरंतर बहती नदी,

  • साहित्य संध्या में आज पढ़ें कहानी ‘ छाया’

    बच्चे की रोने की आवांज सुनकर मदन चौंक गया. ऑक की झाड़ियों के पीछे एक छ:-सात महीने का बच्चा औंधे मुंह पड़ा रो रहा था. वह अपना सिर धरती पर डाल देता था और कभी ऊपर उठा लेता था. कभी उसके रोने की आवाज धीमीं और कभी तेज सुनाई पड़ती थी. मदन ने गाड़ी रोक दी. बच्चे को उठाया और अपनी पगड़ी के पल्ले से उसका मुंह पोंछा. वह लड़की थी. बच्ची उसकी ओर देखने लगी. पास ही एक सफेद बुर्का इस तरह पड़ा हुआ था जैसे आंधी में उड़कर गया हो.

  • मर्म को स्पर्श करतीं स्मिता सिन्हा की नयी कविताएं

    1. और एक दिन हम सरकते चले जाते हैं उन्हीं सड़कों पर जिन पर भभकती आग है हम थामते चले जाते हैं झुलसे हुए हाथों को हम चीखते चले जाते हैं घुटते हुए शब्दों को

  • पाठक राजहंस की तरह मोती चुन लेता है : नीलोत्पल मृणाल

    ‘नीलोत्पल मृणाल’ यह नाम वर्ष 2016 में तब ‘लाइमलाइट’ में आया, जब इन्हें वर्ष 2016 का साहित्‍य अकादमी युवा पुरस्‍कार दिया गया. नीलोत्पल मृणाल बिलकुल अपने नाम की तरह ही साहित्य जगत में खिले और छा गये. जैसे नील कमल फूलों की दुनिया का बादशाह और खास होता है, साहित्य जगत के लिए नीलोत्पल वैसे ही खास हैं. झारखंड के दुमका जिले के नौनिहाट गांव के रहने वाले नीलोत्पल एक शानदार लेखक, वक्ता और गायक हैं. इनका जन्म बिहार के मुंगेर जिला के संग्रामपुर गांव में हुआ है. इन्होंने अपनी उपलब्धियों और साहित्य पर रजनीश आनंद से खास बातचीत की.

  • अपराध की पृष्ठभूमि में एक प्रेम कहानी ‘हत्यारा’

    हत्यारा मेरे सामने बैठा था. शक़ की कोई गुंजाइश नहीं थी. लोगों ने गोली चलने के बाद उसे नाजायज पिस्तौल के साथ रंगे हाथों पकड़ा था. थानेदार ने मुझे बताया था कि वह अपना अपराध कबूल भी कर रहा है. उत्सुकतावश ही मैं हत्यारे को देखने थाने पर आ गया था. इस युवक ने जिन रामदेव सिंह की हत्या की थी, वे जिले के प्रतिष्ठित लोगों में एक थे. उनकी हत्या से इलाके में सनसनी फैल गई थी.

  • विवेक चतुर्वेदी की कविताएं

    विवेक चतुर्वेदी, पिता का नाम स्व. मनोहर लाल चतुर्वेदी, जन्मतिथि - 03-11-1969, शिक्षा - स्नातकोत्तर (ललित कला), प्रकाशन/प्रसारण - बिजूका, जानकीपुल में रचनाएं प्रकाशित एवं अहा जिंदगी, मधुमति, कथादेश, नयीदुनिया में रचनाएं प्रकाशित. संप्रति: प्रशिक्षण समन्वयक, लर्निंग रिसोर्स डेवलपमेंट सेंटर, कलानिकेतन पॉलिटेक्निक महाविद्यालय, जबलपुर. संपर्क -1254, एच.बी. महाविद्यालय के पास, विजय नगर, जबलपुर (म.प्र.) 482002, फोन - 0761-2623055, 7697460750

  • पढ़ें, संवेदना से परिपूर्ण गीता दुबे की कहानी ‘पगला बुड्ढा’

    दो दिनों से लगातार बारिश होने के कारण मोहल्ले की टूटी सड़कों पर पानी भर आये थे. लोगों ने उसपर ईंट रखकर आने-जाने का रास्ता बना लिया था. आज भी सुबह से रिमझिम-रिमझिम हो रही है, लोग जरूरी काम से ही बाहर निकल रहे हैं लेकिन मंगरू की दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं आया है. वह एक गमछा कमर पर और एक गमछा बदन पर लपेटे और प्लास्टिक से सिर को ढांके हुए सब्जियों के पौधों के बीच घुसकर सब्ब्जियां तोड़ रहा था.

  • आज के साहित्य में भी प्रवेश कर गया है टीआरपी का फंडा : उत्तम पीयूष

    आज के दौर में साहित्य का समाज से सरोकार घटता जा रहा है. साहित्यकार खुद को बड़ा समझने लगा है. टीआरपी का फंडा साहित्य में भी प्रवेश कर गया है और यही कारण है कि आज का साहित्य बौद्धिक तो है, लेकिन आम लोगों से वह जुड़ नहीं पा रहा. उक्त बातें साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता उत्तम पीयूष ने तब कही जब प्रभात खबर डॉट कॉम से उन्होंने लंबी बातचीत की. प्रस्तुत है उस बातचीत के प्रमुख अंश:-

  • प्रेम की कोमल भावना पर लिखी ध्रुव गुप्त की कहानी ‘ लाइन ऑफ़ कंट्रोल’

    बात बहुत मामूली थी. सबेरे नौ बजे शहर के अहीर टोले का एक लड़का गोपीचंद यादव हमेशा की तरह साइकिल से कॉलेज जा रहा था. बीए फाइनल ईयर का छात्र था. रास्ते में मुसलमानों का एक मुहल्ला था दिलावरपुर. दिलावरपुर की एक गली से हाथों में किताबें लिए मलिक सईद नाम की एक लड़की उसी कॉलेज में पैदल जा रही थी. गोपीचंद के ही क्लास की छात्रा थी.गोपीचंद ने आगे-पीछे देखा और लड़की के पास पहुंच कर साइकिल धीमी कर दी.

  • मन के तारों को छेड़ती प्रतिभा कटियार की कविताएं

    प्रतिभा कटियार युवा कवयित्री हैं. कविताएं, आलेख, कहानियां आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. 14 साल तक मुख्य धारा की पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों अजीज प्रेमजी फाउंडेशन के साथ जुड़कर काम कर रही हैं. मैत्रेयी पुष्पा के साक्षात्कारों और ''खूब कही'' व्यंग्य संग्रह का संपादन. संपर्क : अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, 53 ई सी रोड, द्वारका स्टोर के पास, देहरादून, उत्तराखंड, 248001, फ़ोन- 8126948464.

  • बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति की एक प्रासंगिक कविता ‘कवि मर गया’...

    कल हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ कवि कुंवर नारायण की मृत्यु हो गयी. उनकी रचनाएं कालजयी हैं, लेकिन उनके अंतिम संस्कार में गिनती के लोग पहुंचे. एक कालजयी कवि के प्रति समाज की यह उपेक्षा पीड़ा देती है. अकसर यह देखा गया है कि कवियों की रचनाएं तो बहुत प्रसिद्ध हो जाती हैं लेकिन कवि आजीवन आर्थिक रूप से कमजोर रहता है. महाकवि निराला से लेकर हरिवंश राय बच्चन तक हमें ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं. क्या समाज को शब्दों से समृद्ध करने वाले एक साहित्यकार की ऐसी दशा होनी चाहिए? कुछ ऐसे ही सवाल और पीड़ा को बयान कर रही है बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति की यह रचना:-

  • पढ़ें, वीना श्रीवास्तव की दो कविताएं

    वीना श्रीवास्तव का जन्म 14 सितंबर को हुआ. इन्होंने हिंदी और अंग्रेजी भाषा में स्नातकोत्तर की डिग्री ली है. 1991 में राष्ट्रीय सहारा के साथ पत्रकारिता की शुरुआत की.बारह वर्षों तक पत्रकारिता किया, लेकिन अब स्वतंत्र लेखन कर रही हैं. इनके कई प्रकाशित कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें ‘तुम और मैं’, मचलते ख्वाब,लड़कियां, शब्द संवाद प्रमुख हैं. आकाशवाणी से नाटकों का प्रसारण . देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी और आलेख प्रकाशित हो चुके हैं. कई सम्मान भी मिल चुके हैं जिनमें श्यामधारा सम्मान (उत्तर प्रदेश),प्रमोद वर्मा युवा सम्मान (इजिप्ट),सृजन सम्मान (छत्तीस गढ़), शब्द मधुकर सम्मान (मध्य प्रदेश) .

  • मन को छूती कल्याणी कबीर की कविताएं

    कल्याणी कबीर की कविताएं आपके अंतरमन को स्पर्श करती नजर आयेंगी. किस तरह एक औरत से यह कहा जाता है कि वह अपनी सीमा में रहे, वह देखे आसपास क्या हो रहा और अगर देखे भी तो इस पितृसत्तामक समाज के कहने के अनुसार. कल्याणी कबीर ने राजनीति पर भी शानदार तरीके से तंज कसा है, तो पढ़ें उनकी चंद कविताएं:-

  • समाज के सच से रूबरू कराती ध्रुव गुप्त की कहानी‘कांड’

    फोन पर कोई लड़की थी. एकदम नर्वस. आवाज कांप रही थी उसकी. उसने पूछा, ''सर, आप एसपी साहब ही बोल रहे हैं न ?'' ''हां, मगर आप इतनी घबड़ाई हुई क्यों हैं ? आप किसी मुश्किल में हैं तो अपना लोकेशन बताइए. मैं तुरंत किसी को भेजता हूं वहां.'' ''नहीं, कोई सवाल नहीं, सर ! यह मेरी जिंदगी और मौत का सवाल है. आप थोड़ी देर के लिए मेरी बातें सुन लीजिए. उसके बाद फैसला कीजिएगा कि आपको क्या करना है.''

  • खुद से जूझती एक औरत की कहानी ‘मालती’

    रात के ग्‍यारह बज रहे थे. जोर-जोर से दरवाजा पीटने की आवाज आयी. '''' खोल दरवाजा, मेरे घर से मुझे ही नि‍कालेगा. तू समझता क्‍या है अपनेआप को''''. दरवाजे की भड़भड़ के साथ गालि‍यों की बौछार जारी थी. पर दरवाजा नहीं खुला. थक हार कर वो बाहर ही बैठ गई. उसकी बड़बड़ाहट की आवाज तेज हो गई थी- ''''क्‍या चाहते हैं सब. एक तो भरी जवानी में छोड़ गया वो, अब आग लगती है तो बुझाऊं भी नहीं. इन्‍हीं लोगों पर कर दूं जीवन कुर्बान. क्‍या मेरा कुछ नहीं ''''.

  • विमलेश शर्मा की अनूठी कविता ‘देह-विदेह’

    विमलेश शर्मा, अजमेर,राजस्थान की रहने वाली है. इनकी पहचान एक आलोचक एवं लेखिका के रूप में है. इनकी आलोचना पर कमलेश्वर के कथा साहित्य में मध्यवर्ग पुस्तक प्रकाशित.

  • महिलाओं की सामाजिक स्थिति को दर्शाती वीना श्रीवास्तव की कविताएं

    हमारे देश में महिलाओं की जो सामाजिक स्थिति है, उसके कारण एक मां हमेशा अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर आशंकित रहती है. वीना श्रीवास्तव ने अपनी इन कविताओं में मां की उसी आशंका को रेखांकित किया है. किस तरह एक लड़की की योग्यता उसके रूप की मोहताज है यह भी कविताओं के जरिये बताया गया है. पढ़ें वीना श्रीवास्तव की दो कविता:-

  • आधुनिक जीवनशैली किस तरह इंसान को रोबोट बना रही है पढ़ें कथाकार कमल की कहानी ‘प्यार के दो-चार पल’

    आधुनिक जीवनशैली में किस तरह अधिक पैसों की चाह में इंसान रोबोट बनता जा रहा है और उसकी खुशी इस भंवर में उलझ सी गयी है. इंसान इतना मशीनी हो गया है कि उसे प्रेम के लिए भी वक्त नहीं मिलता, जिसके कारण वह दिमागी रूप से परेशान रहता है. ऐसे ही एक पति-पत्नी की जद्दोहद की कहानी है ‘प्यार के दो-चार पल’. पढ़ें कथाकार कमल की यह कहानी

  • महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की सच्चाई को उजागर करती ध्रुव गुप्त की कहानी ‘अपराधी’

    रात के साढ़े दस बज रहे थे. ट्रेन आने में घंटे भर देर थी. छोटा-सा हमारा स्टेशन ख़ामोशी में डूबा हुआ था. सिर्फ़ स्टेशन मास्टर के कार्यालय में लैंप जल रहा था. खुले प्लेटफार्म पर चांदनी पसरी हुई थी. स्टेशन पर आठ-दस यात्री थे. जो ज़हां-तहां सीमेंट की बनी बेंचों पर बैठे या लेटे हुए थे. चाय की एक दुकान के सामने वाली बेंच पर मेरा कब्ज़ा था. मैं बेंच के पीछे सिर टिकाये दो दिनों बाद दिल्ली में होने वाले इंटरव्यू को लेकर सोच रहा था कि तीन लोग आकर मेरे बगल की खाली जगह पर बैठ गए. मेरे बगल में करीब सत्तर साल का एक बूढा बैठा. तन पर धोती-कुरता और कंधे पर गमछा. उसके बगल में साठ-पैंसठ साल की एक सीधी-सादी बूढ़ी औरत थी जो उसकी पत्नी लग रही थी. सबसे अंत में बीस-बाइस साल की एक लड़की बैठी. जितना देख सका उसके हिसाब से गोरी, लंबी और औसत से ज़्यादा सुंदर. लंबे बाल और बड़ी-बड़ी आंखें. वह गहरे नीले या काले रंग का सलवार सूट पहने थी जिसके कारण उसका उसका गोरापन और निखर गया था.

  • हृषीकेश सुलभ की कहानी ‘डाइन’

    वह आधी रात के बाद अचानक प्रकट हुई थी. उसके आने की दूर–दूर तक कोई उम्मीद नहीं थी. जेठु मंडल अर्जि़यां लिखने में व्यस्त था. उसे आज रात कलक्टर और जिला परिषद् के चेयरमैन के नाम अर्जि़यां तैयार करनी थी. बात बनते–बनते बिगड़ चुकी थी. कलक्टर के पीए के समधी के मार्फत उसने नये सिरे से कोशिश शुरू की थी. उस पीए ने एक नया रास्ता सुझाया था और मदद का भरोसा दिया था. जिला परिषद् के चेयरमैन तक पहुंचने में उसके छक्के छूट गये थे. उसके दूर के एक रिश्तेदार का बेटा चेयरमैन का खास शूटर था. उसने चेयरमैन तक पहुंचाने का वायदा किया था. जेठु मंडल को कमिश्नर की चिंता नहीं थी. जब कलक्टर और जि़ला परिषद् के चेयरमैन की अनुशंसा हो जायेगी, तब कमिश्नर कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा. उसे झख मारकर दस्तख़त करना पड़ेगा. वह इस बार हर क़ीमत पर मामले को अपने हक़ में मोड़कर लक्ष्य हासिल करना चाह रहा था. अब वह नये सिरे से अर्जि़यां दाखि़ल करने की तैयारी में जुटा था. उसके गुरु ने उसे पहली सीख यही दी थी कि सरकारी दफ़्तरों–कचहरियों में सफलता सिर्फ़ बुद्धि से नहीं मिलती. इसके लिए धीरज भी चाहिए. अर्जि़यां डालते जाओ ताकि सनद रहे. ऐसी ही सीखों ने उसे हुनरमंद बनाया था. इन दिनों वह मुआवज़ा वसूली के एकसूत्री अभियान में लगा हुआ था. इस अभियान की पहली फ़सल वह काट चुका था. दूसरी फ़सल काटने में लगातार अड़चनें आ रही थीं.

  • प्रभात खबर के दीपावली अंक में पढ़ें कविता ‘आधा’

    राजेन्द्र उपाध्याय सम्पर्क : बी-108, पंडारा रोड नयी दिल्ली -110003 मो : 9431023458 आधा आधी बाती से भी पूरा उजाला होता है आधी लौ भी पूरी रौशनी देती है आधी गगरी भी पूरी प्यास बुझाती है आधे रास्ते पर भी मिलती है मंजिल आधे बने मकानों में भी बसते हैं घर आधे बगीचों में भी खिलते हैं फूल आता है बसंत आधी भरी हुई नदी भी नदी कहाती है आधा समुद्र भी गरजता है उतनी ही शिद्दत से आधा बादल भी बरसता है तो भिंगोता है आधा आँचल भी छाँव देता है आधी छतरी ने भी कई बार मुझे भींगने से बचाया आधी आँच ने भी ठिठुरने से बचाया आधे तालाब मे भी तैरती हैं मछलियाँ खिलते हैं कंवल आधी रात को आधी नींद में देखे जाते हैं पूरे ख्वाब आधा सच भी उतना ही काम का जितना आधा झूठ है पेड़ तब भी पेड़ हैं जब वह आधा हरा आधा ठूंठ है आधी खिड़की से भी आती है पूरी रोशनी पूरी धूप आधे घूँघट में भी नजर आता है पूरा रूप आधे मैदान में भी हिरण भरते हैं कुलाँचे आधे इन्द्रधनुष भी बला के खूबसूरत होते हैं आधा नृत्य आधी मुद्रा आधा बाँकपन भी कमाल करता है आधे गाए गीतों की गूँज देर तक रहती है आधी धुन भी बरसों बरस साथ चलती है आजकल आधी गर्मी आधी ठंड के दिन है यह नया साल भी आधा नया आधा पुराना.

  • जब चांद का धीरज छूट गया...

    दीपावली खुशियों का त्यौहार है. इस अवसर पर लोग खुशियां बांटते हैं. साहित्य में कविता एक ऐसी विधा है, जिसमें बहुत कुछ ऐसा कह दिया जाता, जिसे अन्य किसी विधा में कहना मुश्किल है. प्रस्तुत है ऐसी ही एक कविता, जिसमें चांद और भगवान राम का संवाद दर्शाया गया है, जिसमें चांद श्रीराम से अपनी शिकायत दर्ज करा रहा है कि आखिर दीवाली अमावस की रात को क्यों मनायी जाती है.

  • क्या हासिल होगा इस प्रतिरोध से अपनी कविताओं में बता रहे मणि मोहन

    मणि मोहन का जन्म : 02 मई 1967 को सिरोंज, विदिशा, मध्य प्रदेश में हुआ. शिक्षा : अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर और शोध उपाधि. प्रकाशन : देश की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्र - पत्रिकाओं ( पहल , वसुधा , अक्षर पर्व , समावर्तन , नया पथ , वागर्थ , जनपथ, बया आदि ) में कविताएं तथा अनुवाद प्रकाशित.

  • दीपावली विशेष : त्योहारों का वर्ग चरित्र

    दीपावली रौशनी का त्यौहार है. लेकिन बाजारीकरण ने इस पर्व को अमीरों का त्यौहार बना दिया है. गरीब आज त्यौहार पर खुशी के लिए तरसता है. ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि आखिर दीवाली किस वर्ग का त्यौहार है. प्रस्तुत है बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति की सामयिक कविता .

  • दीपावली पर पढ़ें दो कविता

    चलो उदास चेहरों को मुस्कान देने का जतन करें अंधेरे घरों को भी आज रोशन करें कि रोती हैं रात भर जो आंखें

  • डॉ सूर्या राव की कहानी ‘अनजाना सच’

    बड़े-से घर में क्षमा अकेली रहती है. एक ही बेटा है, जो विदेश में बस गया है. बेटे के बार-बार आग्रह करने के बावजूद अपना घर, अपनी जमीन छोड़कर वह जाना नहीं चाहती. अकेलेपन से उबरने के लिए उसने मकान की ऊपरी मंजिल किराये पर चढ़ा दी है. कितने किरायेदार आये और गये इसकी कोई गिनती नहीं है. अपने स्नेहिल स्वभाव के कारण, परायों को भी उसने अपना बना लिया था. क्षमा को याद नहीं कि कोई एक भी किरायेदार ऐसा रहा हो, जो जाते वक्त दु:खी मन से न गया हो. उनके जाने के बाद उसका अकेलापन और बढ़ जाता और वह अवसाद से घिर जाती. इस स्थिति से बाहर निकलना तभी होता, जब कोई नया किरायेदार आ जाता. शुरू में उसे बहुत सावधानी रखनी पड़ती कि आने वाला किरायेदार न जाने किस मिजाज का हो. किन्तु समय बीतने के साथ सब कुछ सामान्य हो जाता. उसके शुभचिंतक प्राय: उसे सावधान भी करते, कि वह अकेली रहती है और समय बदल गया है.

  • संवेदनाओं से परिपूर्ण युवा कवि प्रभात कुमार की कविताएं

    प्रभात कुमार युवा कवि हैं, अभी 25 साल के भी नहीं हुए हैं. लेकिन इनकी कविताएं आकर्षित करती हैं. संप्रति हैदराबाद विश्वविद्यालय से मॉस कॉम की पढ़ाई कर रहे हैं. सैनिक स्कूल तिलैया से हाई स्कूल की पढ़ाई कर चुके प्रभात कुमार ने झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल की है. मूल रूप से बिहार के रहने वाले प्रभात हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में समान अधिकार रखते हैं. आज पढ़ें इनकी दो कविताएं जो मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण हैं-

  • सामाजिक परिवर्तन को दर्शाती संजीव चंदन की कहानी ‘बिकनी में बॉबी’

    दरवाज़ा वापस बंद कर अनु सीधे अपने बेडरूम में घुसी और अपने बेड पर निढाल बिछ गई- उसके चेहरे पर हताशा और उदासी साफ़ दिख रही थी. पेट के बल औंधे गिर कर वह सुबकने लगी. उसे लग रहा था कि वह आज निधि की नहीं अपनी जिंदगी का एक अहम मसला सुलझाने में असफल रही, उसे लग रहा था कि आज दो-दो अनु एक साथ सुबक रही हैं, यहां उसके बेडरूम में और वहां 25-26 साल पहले मगध के उस गांव के कोहबर वाले घर में फ्रेम हुई अनु.

  • जीवन की जद्दोजहद को बयां करती मुकेश सिन्हा की कविताएं

    मुकेश कुमार सिन्हा बिहार के बेगूसराय के रहने वाले हैं. जन्म 4 सितंबर 1971 को हुआ. शिक्षा : बीएससी (गणित) (बैद्यनाथधाम, झारखण्ड) से किया. संप्रति केंद्रीय राज्य मंत्री, भारत सरकार, नयी दिल्ली के साथ संबद्ध. संग्रह : “हमिंग बर्ड” कविता संग्रह (सभी ई-स्टोर पर उपलब्ध) (बेस्ट सेलर)

  • गांव के बदलते स्वरूप पर प्रणय प्रसून वाजपेयी की कविता

    यह हमारे गांव की कहानी है. कमोबेश यही भारत के गांव की कहानी बनती जा रही है. गांवों का चेहरा किस कदर विद्रूप हुआ है, यहां इसकी बात की गयी है. और इस ओर से हम बेखबर बने हुए हैं. गांव को अपने हाल पर छोड़ दिया है. दूसरी ओर डिजिटल भारत बन रहा है. हम विकास-विकास खेल रहे हैं. कंक्रीट के बनते मकानों के बीच हमारा गांव गुम हो गया है.

  • सोनाली मिश्रा की कहानी ‘सफर की महंगाई’

    वह ठहर गया था, कहीं राह में बोला ;सुनो, अब नहीं चलूंगा तुम्हारे साथ, बस समझ लेना यहीं तक था सफर; वह रेत में पैरों के निशान देखती रही, कुछ क्षण पूर्व तक उसके कानों में जो शब्द बांसुरी बनकर गूंज रहे थे, वे अब दहकता हुआ लावा हो गये, उसने कुछ सवाल नहीं किया, न ही रोई, दरी पर ताश के पत्ते बिखते हुए थे, जिससे वे दोनों अपना मन बहला रहे थे, उन्हें समेटा, और जैसे चलने को हुई, वह फिर से बोला पर तुम मुझे फोन कर सकती हो, अपने घर पहुंच कर मुझे, बता देना और जब तक टिकट न मिले, तुम मेरी मेहमान ही हो!

  • प्रेम की कोमल भावना से ओतप्रोत सुषमा शर्मा की कविताएं

    सुषमा शर्मा मूलत: बिहार की रहने वाली हैं. पेशे से शिक्षिका हैं, लेकिन साहित्य में विशेष रुचि हैं. इनकी कविताओं में प्रेम की कोमल भावना प्रमुखता से मुखरती होती है.

  • मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण डॉ उत्तम पीयूष की दो कविताएं

    डॉ उत्तम पीयूष मधुपूर दर्पण के चीफ एडिटर हैं. इनकी किताब ‘चीख सकते तो पहले पेड़ चीखते’ बहुत चर्चित है. हंस पत्रिका ने इन्हें देश के सर्वश्रेष्ठ उभरते हुए कवियों की सूची में स्थान दिया था. इन्हें कई साहित्य सम्मान भी मिल चुका है, जिनमें साहित्य श्री सम्मान, फणीश्वरनाथ रेणु पुस्कार और सतीश स्मृति साहित्य सम्मान प्रमुख है. इन्होंने ‘आरोह’ पत्रिका का संपादन भी किया है. इनकी कविताओं में मानवीय संवेदना का स्वर प्रस्फुटित होता है. प्रस्तुत है इनकी दो कविताएं :-

  • सामाजिक सरोकार से रूबरू करातीं अरुण देव की कविताएं

    अरुण देव मूलत: उत्तरप्रदेश के रहने वाले हैं. अबतक दो कविता संग्रह ‘क्या तो समय’ भारतीय ज्ञानपीठ से 2004 में और ‘कोई तो जगह हो’ राजकमल प्रकाशन से 2013 में प्रकाशित है. ‘कोई तो जगह हो’ के लिए उन्हें 2013 का राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त है. उनकी कविताओं के अनुवाद असमी, कन्नड़, तमिल, मराठी, नेपाली, अंग्रेजी आदि भाषाओं में हुए हैं. संप्रति अरुण देव पिछले छह वर्षों से हिंदी की वेब पत्रिका ‘समालोचन’ का संपादन कर रहे हैं. इन्होंने जेएनयू से शिक्षा प्राप्त की है और एसोसिएट प्रोफेसर भी रहे हैं. इनकी कविताओं में सामाजिक सरोकार बखूबी नजर आता है.

  • कल्पना मिश्रा ने जीवन की सहज अनुभूतियों को कविताओं में उतारा

    कल्पना मिश्रा गिरिडीह की रहने वाली हैं. पेशे से पत्रकार हैं. पत्रकारिता में स्नातकोत्तर हैं.इनकी कविताएं कई अखबारों में प्रकाशित हो चुकी हैं. इन्होंने जीवन की सहज अनुभूतियों को बहुत ही सहजता के साथ अपनी कविताओं में उतारा है और यही उनकी कविताओं का सौंदर्य है.

  • सौंदर्य के नये पैमाने रचते कवि प्रवीण सिंह की कविताएं

    प्रवीण सिंह पेशे से पत्रकार हैं और वर्तमान में गुजरात के सूरत शहर में एक हिंदी दैनिक अखबार में कार्यरत हैं. इनकी साहित्य में रुचि है और कविता लेखन से जुड़े हैं. मूलत: उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले हैं. प्रवीण सिंह प्रगतिशील शैली में कविता लेखन करते हैं.

  • कलावंती की कविताओं में पढ़ें नारी मन की अद्‌भुत अभिव्यक्ति

    प्रस्तुत है इनकी कुछ कविताएं, जिनमें उन्होंने नारी मन की भावनाओं को बखूबी चित्रित किया है. कैसे एक नारी अपनी इच्छा से जीना चाहती है, उसकी विवशता, उसके हृदय का प्रेम, सब कुछ उनकी कविताओं में परिलक्षित होता है.

  • युवा कथाकार शहादत की कहानी ‘ प्रेमिका’

    हारून गेहूएं रंग का एक बांका सजीला नौजवान था. वह शादी-शुदा था. फिर भी एक दूसरी औरत से प्यार करता था. गहरा और सच्चा प्यार. उसकी प्रेमिका एक तलाक-शुदा औरत थी और अब अपने बाप के घर रहती थी. हारून की उससे पहली मुलाकात अपनी शादी से हफ्ते भर पहले ही अपने दोस्त के घर हुई थी, जहां वह अपनी शादी का कार्ड देने गया था. उस पहली मुलाकात में उन्होंने एक-दूसरे को देखने और सलाम-दुआ करने के सिवा शायद ही कोई बात की हो, लेकिन यही मुलाकात उनके दिलों का सौदा करा बैठी. हारून की शादी हो गयी फिर भी वह अपनी प्रेमिका से भी बदस्तूर मिलता रहा था. वे लोग महीने में कम से कम चार-पांच बार शहर की मुखतलिफ जगहों पर मिलते थे. लेकिन शहर में कहीं कोई देख न ले इस डर से वे कभी-कभी शहर से बाहर भी चले जाते थे. वह भी पूरे-पूरे दिन के लिए.

  • पढ़ें, पुरुषवादी सोच के दंभ को अस्वीकारती प्रितपाल कौर की कविताएं

    प्रितपाल कौर महिलाओं की सामाजिक स्थिति से प्रतिकार करते हुए कविताएं लिखीं, जो पुरुषवादी सोच के दंभ को अस्वीकार करती है. इनकी कविताओं में नारी अपने शर्तों पर जीने की कोशिश करती है,

  • अंकिता रासुरी की कविताएं

    अंकिता रासुरी का जन्म उत्तराखंड के टिहरी जिले के भरपुरिया गांव में हुआ. इन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा से पत्रकारिता की पढ़ाई की. फिलहाल एनसीईआरटी की शोध पत्रिका भारतीय आधुनिक शिक्षा में कार्यरत. वागर्थ, परिकथा, अहा जिंदगी, लमही, साक्षात्कार, तहलका, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, आदि पत्र पत्रिकाओं में कविताएं और लेख प्रकाशित.

  • प्रणव प्रियदर्शी की कविताएं

    प्रणव प्रियदर्शी, रांची झारखंड के रहने वाले हैं. इनका जन्म 12 जनवरी 1984 को हुआ. इन्होंने हिंदी भाषा में स्नातक (हिंदी प्रतिष्ठा) की डिग्री ली. स्रातकोत्तर (पत्रकारिता एवं जनसंचार) संप्रति ‘प्रभात खबर’ रांची के संपादकीय विभाग में कार्यरत. इनका एक कविता संग्रह ‘सब तुम्हारा’ प्रकाशित हो चुका है. वर्तमान साहित्य, सनद, देशज, परिकथा, साहित्य अमृत, साहित्य परिक्रमा और कादंबिनी सहित कई पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं. दूरदर्शन व आकाशवाणी में कई रचनाओं का प्रसारण.

  • सारिका भूषण की कविताएं

    सारिका भूषण कवयित्री एवं लेखिका हैं, जन्म 15.04.1976 में हुआ. विज्ञान में स्नातक हैं. इनकी रचनाएं देश की प्रमुख पत्रिकाओं " कथादेश" , "कादम्बिनी " , " गृहशोभा" , " सेवा सुरभि " , " ब्रह्मर्षि समाज दर्शन " सहित कई प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. इनकी किताब भी प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें कविता संग्रह और लघुकथा भी शामिल हैं. इनकी प्रसिद्ध किताब है " माँ और अन्य कविताएं " 2015, " नवरस नवरंग " साझा काव्य संग्रह 2013,"कविता अनवरत " इत्यादि." नव सृजन साहित्य सम्मान 2017 " से सम्मानित "अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता " में नवां स्थान प्राप्त.

  • रश्मि शर्मा की कविताएं

    रश्‍मि‍ शर्मा रांची, झारखंड से हैं इनका जन्‍म- 2 अप्रैल को हुआ है. पत्रकारि‍ता में स्‍नातक, इति‍हास में स्‍नात्‍कोत्‍तर की डिग्री ली है. देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, कहानि‍यां, लघुकथा, संस्‍मरण, यात्रा वृतांत व विविध विषयों पर आलेख प्रकाशित हो चुके हैं. दो एकल कवि‍ता संग्रह और चार साझा संकलन प्रकाशि‍त, एक कवि‍ता-संग्रह का संपादन भी. लेखन के लि‍ए 2015 में नवसृजन सम्‍मान और 2017 में कात्‍ययानी पुरस्‍कार प्राप्‍त. संप्रति- स्वतंत्र पत्रकारि‍ता एवं लेखन कार्य.

  • जसिंता केरकेट्टा की कविताएं

    जसिंता केरकेट्टा का जन्म 3 अगस्त 1983 में झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में सारंडा जंगल से सटे मनोहरपुर प्रखंड के खुदपोस गांव में हुआ. 2016 में पहला काव्य-संग्रह ‘अंगोर’ हिंदी-अंग्रेजी में आदिवाणी कोलकाता से प्रकाशित. अंगोर का जर्मन संस्करण हिंदी-जर्मन में प्रकाशित. देश की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित. विभिन्न कवियों के कविता-संग्रहों में भी इनकी कविताएं शामिल, इनमें शतदल, रेतपथ, समंदर में सूरज, कलम को तीर बनने दो माटी आदि स्मरणीय हैं.

  • मुक्ति शाहदेव की कविताएं

    मुक्ति शाहदेव का जन्म रांची में हुआ. इनकी स्कूली शिक्षा रांची से ही हुई. रांची महिला कॉलेज से स्नातक किया और रांची विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए हैं. संप्रति ब्रिजफोर्ड स्कूल में सीनियर सेकेंडरी इंजार्ज हैं. इन्होंने कई कविताएं और कहानियां लिखीं हैं, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. साथ ही इनकी कविताएं आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी प्रसारित हो चुकी हैं.

  • बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति की कविताएं

    बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति का जन्म बिहार के भागलपुर जिले में एक मार्च 1978 को हुआ. पैतृक निवास मुंगेर है. स्कूली शिक्षा बिहार के समस्तीपुर जिले के ताजपुर से हुई. पटना विश्वविद्यालय से स्नातक और फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से एमए किया. संप्रति ‘Centre for World Solidarity’ के ज्वाइंट डायरेक्टर हैं.