• कांके डैम में उतर आयीं मां गंगा, हर-हर महादेव, गंगा मैया की जय से गूंजायमान हुई रांची

    रांची : झारखंड की राजधानी रांची में स्थित कांके डैम में शरद पूर्णिमा की संध्या साक्षात मां गंगा उतर आयीं, जब कांके डैम पार्क गंगा मैया की जय, हर-हर महादेव से गूंजायमान हो गया. मौका था कांके डैम के तट पर ‘गंगा आरती’ का. झारखंड में पहली बार अपनी तरह के इस आयोजन में रांची के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. रांची की मेयर आशा लकड़ा और डिप्टी मेयर संजीव विजयवर्गीय के अलावा रांची के सांसद संजय सेठ ने भी नगर के लोगों को आश्वस्त किया कि समाज की ओर से हुई जल संरक्षण की इस शुरुआत को अंजाम तक पहुंचाया जायेगा.

  • शरद पूर्णिमा : आज आकाश से होगी अमृत की वर्षा, जानें कैसे पूजा करने से होगी शुभ फल की प्राप्ति

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा वह अवसर होता है जब चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर अमृत की वर्षा करता है. आयुर्वेद के मुताबिक इस दिन चंद्रमा न केवल सोलह कलाओं के साथ चमकता है बल्कि इसकी किरणों में कुछ ऐसे गुण होते हैं जो शरीर को पोषकता प्रदान करते हैं.

  • Sharad Purnima 2019: 16 कलाओं युक्त चंद्रमा से आज बरसेगा अमृत, जानें क्या कहता है विज्ञान

    शरद पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी की भी पूजा होती है. ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी रात्रि में विचरण करती है और भक्तों पर धन-धान्य से पूर्ण करती है. इस दिन रात भर जाग कर मां लक्ष्मी के भजन करने चाहिए. कहते हैं मां लक्ष्मी इस दिन रात में जगने और मां लक्ष्मी के अाराधना करनेवालों को धन और वैभव का आशीर्वाद देती हैं. इसलिए इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं. घी के दीपक जलाकर मां लक्ष्मी को प्रसन्न किया जाता है.

  • कार्तिक माह कल से, 25 को धनतेरस, 27 को दीपावली, 31 से चार दिवसीय छठ शुरू

    रांची : व्रत-त्योहारों का माह कार्तिक रविवार से शुरू हो जायेगा. इस माह में प्रात: स्नान और कल्पवास का विशेष महत्व है. इसलिए कई भक्त गंगा नदी तट के किनारे झोपड़ी बनाकर भगवान का ध्यान करते हैं.

  • स्वयं को प्रेम न करने के कारण ही दूसरी चीजों में होता है आकर्षण

    राम नाम का अमृत दिन-रात बरस तो रहा है, लेकिन लोगों को उसकी प्रतीति नहीं है और जब तक प्रतीति नहीं होती, तब तक प्रेम भी संभव नहीं होता. इसका एक ही उपाय है- सत्संग. जो सत्संग नहीं करेगा, कुसंग उसकी नियति होगी.

  • दाम्पत्य जीवन की मंगल कामना के लिए करवाचौथ

    करवाचौथ का पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है, जो इस साल 17 अक्तूबर (गुरुवार) को पड़ रहा है. माना जाता है कि इस दिन अगर सुहागिन स्त्रियां उपवास रखें, तो उनके पति की उम्र लंबी होती है और उनका गृहस्थ जीवन सुखी रहता है. मान्यता के अनुसार इस पर्व की सबसे पहले शुरुआत प्राचीन काल में सावित्री की पतिव्रता धर्म से हुई, जिसने यमराज को भी उसके पति के प्राण नहीं ले जाने को विवश कर दिया और उसके सुहाग की रक्षा हुई.

  • ज्योतिष में राज सत्ता योग बनानेवाले अहम घटक

    अजन्म और मृत्यु का ग्रह शनि सब कुछ देता है, ऐसा नहीं है. वह जनता की सेवा की अपेक्षा भी रखता है. इससे पहले यह जान लेना होगा कि राज सत्ता या कुछ अहम पद पाने के उत्तरदायी घटक कौन-कौन से हैं.

  • विजयादशमी आज, इस दिन का ज्योतिषीय महत्व जान कर हैरान हो जायेंगे आप

    आश्विन शुक्ल दशमी का विख्यात नाम विजयादशमी है. इसका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है. यह अनेक सुखद संयोगों को अपने में समेटी हुई तिथि है. शारद नवरात्र का ही अंग बन कर हर साल आती यह एक ओर दुर्गोत्सव को पूर्णता प्रदान करती, तो दूसरी ओर हमें मानवीय मूल्यों के संरक्षण में सर्वत्र विजयी होने का संदेश भी देती है.

  • अपने अवगुणों पर विजय प्राप्त करने का शुभकाल है विजयादशमी

    दशहरा कोई आम दिनों की तरह नहीं है. यह बुराई के अंत के लिए बिल्कुल उपयुक्त समय है. पौराणिक कथा मिलती है कि भगवान राम ने भी रावण को मारने से पहले मां दुर्गा की वंदना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया था. क्यों न विजयादशमी के दिन हम भी अपने अंदर बैठे दुर्गुणों के ''रावण'' को मारें और खुद में ''राम'' तत्व को जाग्रत करें. विजयादशमी का संदेश यही तो है.

  • शारदीय नवरात्र सातवां दिन : ऐसे करें मां कालरात्रि की पूजा, जपे ये ध्यान मंत्र

    जिनका रूप विकराल है, जिनकी आकृति और विग्रह कृष्ण कमल सदृश है तथा जो भयानक अट्टहास करनेवाली हैं, वे कालरात्रि देवी दुर्गा मंगल प्रदान करें.

  • अपनी राशि अनुसार करें मां की उपासना

    अ शारदीय दुर्गा पूजा पर महाष्टमी तथा महानवमी का विशेष महत्व है. महाष्टमी के दिन देवी शक्ति धारण करती हैं. नवमी को नवरात्र पूजा-उपासना समाप्त होती है. इसलिए महाशक्ति स्वरूपिणी ''दुर्गा दुर्गति नाशिनी'' हैं.

  • महाअष्टमी में है संधि पूजा का विशेष महत्व

    महाअष्टमी पर संधि पूजा का विशेष महत्व है, जो नवमी को भी चलती है. संधि पूजा में अष्टमी समाप्त होने के अंतिम 24 मिनट और नवमी प्रारंभ होने के शुरुआती 24 मिनट के समय को संधि क्षण या काल कहते हैं, जो पूजा के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है. मान्यता है कि इसी काल में देवी दुर्गा ने प्रकट होकर असुर चंड और मुंड का वध किया था.

  • शारदीय नवरात्र छठा दिन : ऐसे करें मां कात्यायनी की पूजा

    जिनका हाथ उज्ज्वल चंद्रहास (तलवार) से सुशोभित होता है तथा सिंहप्रवर जिनका वाहन है, वे दानव संहारिणी दुर्गा देवी कात्यायनी मंगल प्रदान करें.

  • नवरात्र विशेष : देवी सती के अंग-भंग से जुड़ा है 51 शक्तिपीठों का रहस्‍य

    नवरात्र में माता दुर्गा के विभिन्‍न रूपों की पूजा से कई शुभकारी फलों की प्राप्ति होती है. देश विदेश के विभिन्‍न मंदिरों में देवी दुर्गा की पूजा होती है. नवरात्र के पावन अवसर पर हम आपके लिए 51 शक्तिपीठों की जानकारी लेकर आये हैं. पुराणों के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति ने जब भगवान शिव का अपमान किया और यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया तो इससे कुपित माता सती हवन कुण्‍ड में कूदकर अपने देह का त्‍याग कर दिया. इसके बाद भगवान शिव वहां पहुंचे और सती के पार्थिव देह को कंधे पर लेकर तांडव करने लगे.

  • दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की हुई पूजा, आज होगी चंद्रघंटा की पूजा

    पटना : शहर में भले ही भारी बारिश के कारण लोगों को परेशानियाें का सामना करना पड़ रहा हो पर इन्हीं परेशानियों के बीच लोग मां दुर्गा की आराधना में लगे हुए हैं. ऐसे लोगों में नवरात्र का उत्साह और मां के प्रति श्रद्धा कम नहीं है. नवरात्र के दूसरे दिन भी शहर के कई पूजा-पंडालों के अलावा मंदिरों और घरों में भक्त नवरात्र का पाठ करते दिखे. नवरात्रि के दूसरे दिन श्रद्धालुओं ने मां के ब्रह्मचारिणी स्वरूप का पूजन किया.

  • नवरात्र शुरू, पहले दिन माता शैलपुत्री की हुई पूजा, आज मां ब्रह्मचारिणी की होगी पूजा

    पटना : रविवार से नवरात्र का त्योहार शुरू हो गया. नौ दिन तक चलने वाले पर्व में प्रत्येक दिन देवी के विशेष स्वरूप की उपासना होगी. नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना के साथ ही दुर्गासप्तशती एवं गीता का पाठ किया गया. पहले दिन माता के स्वरूप शैलपुत्री की विधि विधान से पूजा की गयी. सभी लोगों ने देवी मां का आशीर्वाद प्राप्त किया.

  • #Navratri: दुर्गादुर्गतिनाशिनी अर्थात दुख दूर करनेवाली

    नवरात्र एक हिंदू पर्व है. नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ''नौ रातें''. इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति/देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है.

  • महालया, महादेवी और मधुपुर

    कास के फूल, मां दुर्गा का आह्वान और द्विजेन मुखोपाध्याय के स्वर का मधुपुर (झारखंड) कनेक्शन अद्भुत है. शहरों और बाजारों की हठबज्जड़ी चमक और लरियाती गिफ्ट हैंपरों की गलियों से निकल कर जरा देहाती-गंवई संसार को निहारिए,

  • महालय आज : श्रद्धा के एक फूल से प्रसन्न हो जाती हैं मां भगवती, जानें कैसे करें पूजन व व्रत-उपवास

    नवरात्रि, नवरात्रा नहीं, नवरात्र ही शुद्ध है. नवरात्र सर्वव्यापिनी मां का यह सामाजिक व लौकिक उत्सवकाल है. इसमें भी शरद ऋतु का यह काल उत्सव ही नहीं, महोत्सव काल है. ‘दुर्गासप्तशती’ में स्वयं उन्होंने ही इसे महापूजा कहा है -

  • महालया विशेष : ‘या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता’

    अ खिल ब्रह्माण्डनायिका जगज्जननी मां दुर्गा उन प्रधान शक्तियों में से एक हैं, जिनको समय-समय पर अपनी आवश्यकतानुसार प्रकटित कर परब्रह्म परमात्मा ने विश्व का कल्याण किया है -

  • नवरात्र पूजन में अवश्य करें विशेष नियमों का पालन

    कलश स्थापना के दिन शुक्र का उदित होना सुख-समृद्धि का कारक माना गया है. इस दिन बुध का शुक्र के घर तुला में आना शुभ फलदायी है. नवरात्र में कुछ ऐसे भी नियम हैं, जिनका पालन अवश्य करना चाहिए.

  • पितृ पक्ष: महाभारत काल में प्रसिद्ध हुई धर्मारण्य वेदी

    यह गाैरव की बात है कि प्राचीन जय संहिता (महाभारत) में गया विषयक विवरण स्पष्ट रूप से मिलता है आैर यह भी स्पष्ट है कि गया की दर्जनाें पिंडवेदियां महाभारत काल में ही स्थापित व चर्चित हुईं. इन पिंड प्रदान स्थलाें में ‘धर्मारण्य’ सर्वप्रमुख है, जहां पांडव बंधुआें ने चातुर्मास यज्ञ विधिवत संपन्न किया था. धर्मारण्य का ‘रहट कूप’ उसी जमाने से गया प्रसिद्ध है. गया के अक्षयवट की पुण्य प्रसिद्धि भी महाभारत काल में द्विगुणित हुई ताे मां मंगलागाैरी मार्ग में भीमगया वेदी इसी युग में सर्वख्यात हुई है.

  • पिंडदान से श्राद्धकर्ता को भी होता है लाभ

    21 सितंबर शनिवार काे सप्तमी तिथि का श्राद्ध अर्थात आठवें दिन का श्राद्ध 16 वेदी तीर्थ पर चंद्र पद वेदी से प्रारंभ कर गणेश पद सम्याग्नि पद, आवसथयाग्निपद दधीचि पद एवं कण्व पद छह वेदियाें पर संपन्न करें.

  • पितरों को भवसागर से पार करा देता है गयाधाम में पिंडदान

    शास्त्रों में भगवान की पूजा से पहले अपने पितरों को पूज्यनीय बताया गया है. पितरों के प्रसन्न होने से सभी काम बन जाते हैं. पितरों को प्रसन्न करने के लिहाज से आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक के पंद्रह दिनों का (इस वर्ष 14 सितंबर से 28 सितंबर) विशेष महत्व है, जो ''पितृपक्ष'' कहलाता है.

  • जानें किस तिथि को करें श्राद्ध

    तर्पण मुख्यतः जल का अर्पण है. स्नान के बाद जलाशय में खड़े होकर ही भींगे कपड़े में या अन्यत्र आसन पर बैठकर सूखे कपड़े में देय जल में अक्षत, पुष्प, चंदन डालकर आदिस्रष्टा ब्रह्माजी से लेकर ब्रह्मांड तक के समस्त प्राणियों का आवाहन किया जाता है.

  • जिउतिया व्रत से संतान को मिलती है लंबी आयु, नहाय खाय आज

    पितृपक्ष के दौरान अष्टमी तिथि को जीवित पुत्रिका व्रत किया जाता है, जो रविवार, 22 सितंबर को है. संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जानेवाला जिउतिया सप्तमी को नहाय-खाय से शुरू होता है. अष्टमी को निर्जला व्रत और नवमी को पारण का विधान है. मान्यता है कि इस व्रत को रखने तथा कथा सुनने से माता को संतान का वियोग नहीं होता. देवी-देवताओं की कृपा बनी रहती है.

  • जिउतिया व्रत: संतान के लिए माताएं करेंगी निर्जला उपवास, बदल रही है लोगों की मानसिकता

    धनबाद : संतान के बेहतर स्वास्थ्य एवं दीर्घायु होने के लिए माताएं जिउतिया व्रत करती हैं. यह व्रत आश्विन माह कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को किया जाता है. पंडित गुणानंद झा बताते हैं मिथिला पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 21 सितंबर को दोपहर तीन बजे प्रवेश कर रहा है जो 22 सितंबर को दोपहर ढाई बजे तक रहेगा.

  • मिट्टी के बर्तन में सरसों के तेल का दीपक जलाएं, पितरों को मिलेगी शांति

    पितृपक्ष के दिनों में हमारे पितर (पूर्वज) हमारे यहां जरूर आते हैं. उनको मनाने या खुश करने का यह सबसे अच्छे दिन होते हैं. मिट्टी के बर्तन में सरसों के तेल का दीपक जलायें, श्रद्धानुसार एक या एक से अधिक पेड़ा रखें और कुल्हड़ में कच्चा दूध रखें. इन तीनों चीजों को घर के दक्षिण दिशा में 15 दिनों तक रोजाना रखें.

  • जीवित्पुत्रिका व्रत: 22 को उपवास करेंगी महिलाएं, 21 को नहाय-खाय,बनेगा नोन्ही का साग और मडुआ की रोटी

    संतान की दीघार्यु और मंगलकामना के लिए माताएं रविवार को जिउतिया (जीवित्पुत्रिका व्रत) का व्रत रखेंगी. इसकी शुरुआत 21 सितंबर को नहाय-खाय से होगी. आचार्य श्रीपति त्रिपाठी ने बताया कि महावीर पंचांग के मुताबिक 22 को उपवास व्रत के बाद 23 सितंबर को सूर्योदय के बाद व्रत का पारण किया जा सकेगा. जीवत्पिुत्रिका कथा में भी उदया तिथि में अष्टमी व्रत करने की बात कही गयी है.

  • विश्वकर्मा जयंती आज : मान्यता है कि इन मंदिरों का निर्माण खुद भगवान विश्वकर्मा ने किया

    जिन भगवान विश्वकर्मा की चर्चा ऋग्वेद में है और जिन्हें आदि शिल्पी माना जाता है, उनके विषय में यह मान्यता है कि चार युगों में उन्होंने कई नगरों, भवनों और मंदिरों का निर्माण किया. सतयुग में स्वर्गलोक, त्रेतायुग में लंका, द्वापर में द्वारका और कलियुग के आरंभ में हस्तिनापुर व इन्द्रप्रस्थ का निर्माण उनके ही हाथों हुआ. वर्तमान में देश में अवस्थित कई मंदिरों के विषय में यह मान्यता है कि उनका निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया.

  • पितृपक्ष : प्रेत बाधा से मुक्ति के लिए किये गये पिंडदान व तर्पण

    आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा यानी शनिवार को 17 दिनी गया श्राद्ध करने आये पिंडदानियों ने प्रेतशिला में पिंडदान व तर्पण किया. शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित प्रेतशिला पर प्रेतबाधा से मुक्ति के लिए सत्तु उड़ाने की परंपरा है. पिंडदानियों ने पहाड़ के नीचे स्थित ब्रह्मकुंड में तर्पण कर पिंड को गोशाला में छोड़ा है. इसके बाद 676 सीढ़ियां चढ़ कर प्रेतशिला पर्वत के बाद प्रेत पर्वत पर तिल मिला सत्तू उड़ा कर पितरों को प्रेतयोनि से मुक्ति दिलायी.

  • अपने मूल से रूबरू होने और उसे सम्मान देने का काल है पितृपक्ष

    श्राद्ध. इस शब्द से मृत व्यक्तियों के लिए किया जाने वाले किसी कर्मकाण्ड का बोध होता है, और पितृपक्ष जो सामान्य जन में श्राद्ध के काल के रूप में प्रख्यात है, को मृत व्यक्तियों व पूर्वजों का पखवाड़ा समझ लिया जाता है, जो सही नहीं है. यह कर्म और पक्ष दरअसल अपनी जड़ों को पुष