कुछ अलग

बेहद खास है नाहन का मुहर्रम

Prabhat Khabar

कभी हिमाचल का बेंगलुरु कहे जानेवाले शहर ‘नाहन’ के पानी से लबालब तालाब मेहमानों व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं. हर साल मुहर्रम नाहन में एक खास शोकोत्सव बनके आता है.

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आर्थिक मंदी की तरफ देश!

प्रो योगेंद्र यादव

क्या देश आर्थिक मंदी की तरफ बढ़ रहा है? इस सवाल को और टाला नहीं जा सकता. जहां एक ओर पूरा देश जम्मू ...

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आरक्षण, दलित दर्द और हिंदू

तरुण विजय

यह निर्विवाद सत्य है कि यदि बाबा साहब आंबेडकर की पहल तथा संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था न होती, तो ...

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सीएसआर स्वैच्छिक हो

अजीत रानाडे

संभवतः भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहां लाभप्रद कंपनियों के लिए अनिवार्य है कि वे अपने टैक्स चुकाने के ...

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सीपीआइ का पहला दलित महासचिव

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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआइ) के लगभग सौ वर्षों के इतिहास में पहली बार उसे एक दलित महासचिव ...

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मीरा के घनश्याम

हर काल में एक ऐसा युगपुरुष हुआ है, जो नरोत्तम होने के साथ दैवी शक्तियों से लैस रहा, जिसे ईश्वर माना गया. ऐसे ही प्रेरक पुरुष के रूप में सबसे मनमोहक रूप कृष्ण का है, जो संपूर्ण पुरुष हैं.

खय्याम का संगीत रूहानी

मकबूल सूफी गायिका बेगम आबिदा परवीन कहती हैं- ''संगीत खुदा का पैगाम है''. शास्त्रीय गायक भी कहते हैं- ''सुर ही ब्रह्म है''. मौलाना या कारी की आवाज में जब कुरान की आयतों को सुनते हैं, तो उसमें बहता सुर हमें अपनी तरफ खींच लेता है. शायद खुदा को संगीत बहुत पसंद होगा, इसीलिए उसने पैगम्बर हजरत दाउद पर एक किताब ''जबूर'' ही उतार दी, जिसमें संगीतबद्ध आयतें हैं. हजरत दाउद जब गाते थे, तो पहाड़, चिड़ियां और जानवर उन्हें सुनन लगते थे. संगीतकार खय्याम का संगीत भी ऐसा ही है, जिसे सुनते ही हम एक सूफियाना आगोश में समाते चले जाते हैं.

गांव की बस

शहर से बस को निकलने में तकरीबन बीस मिनट का समय लग जाता है. इस बीच आंखों के सामने सैकड़ों तरह के दृश्य आते हैं और बड़ी तेजी से गुजर जाते हैं. शहर छोटा हो तब भी उसके पास भीड़ बेतहाशा होती है न. बस चार कदम रेंगती है और भीड़ में फंस जाती है.

सड़कों पर भारतीय समाज के दर्शन

एक बार मैंने अपने एक विदेशी मित्र से पूछा कि भारत में आकर आपको सबसे निराली बात क्या लगती है? तो उसने थोड़ा हिचकते हुए बताया कि भारत के शहरों में सड़कें उसे सबसे विचित्र लगती हैं.

बंद कमरे का संयुक्त राष्ट्र

देवरानी ने कहा जेठानी से चल ससुरजी के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर दें- बहुत परेशान करते हैं ससुरजी. जेठानी ने समझाया- ना छोटी, ऐसे खुलेआम उनकी बुराई करेंगे, तो आफत हो जायेगी. ससुरजी ने रकम लगायी है मेरे हजबैंड के प्लांट में. ससुरजी तो माल बिकवा रहे हैं, इनकी फैक्ट्री का. देख खुलेआम ना करेंगे ससुरजी की बुराई. देवरानी बोली- मैं बुरी तरह जल रही हूं. मैंने अगर उनकी बुराई ना की, तो मैं भस्म हो जाऊंगी.

इस बार का स्वतंत्रता दिवस खास

इस बार का स्वतंत्रता दिवस कुछ खास है. सरकार ने सत्तर वर्षों से लागू अनुच्छेद 370, जिसे लोगों को अनुच्छेद के बजाय धारा कहना ज्यादा पसंद है और इसलिए हम भी उसे धारा 370 ही कहेंगे, हटा दी है और विरोधी दल नहीं समझ पा रहे कि करें तो क्या करें? यह तब है, जब सत्ताधारी दल ने चुनाव में जनता से वादा कर रखा था कि हम इसे हटायेंगे. विरोधियों को लगता होगा कि यह भी बाकी वादों की तरह होगा, सो वे निश्चिंत रहे.

प्रलेस के सोच में बदलाव जरूरी

देश के सबसे बड़े और पुराने लेखक संगठन- प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस)- का अधिवेशन मध्य सितंबर में जयपुर में आयोजित होगा. साल 1936 में कायम हुए इस संगठन के सामने आज अनेक चुनौतियां भी हैं. इनमें से एक पदाधिकारी मंडलों में महिलाओं का न होना है.

मोबाइल के बहाने

जब से जीवन में मोबाइल फोन का प्रवेश हुआ है, इसके बिना अब एक दिन तो क्या, एक मिनट रहना मुश्किल हो चला है. यही नहीं, चौबीसो घंटे हाथ में फोन रहने से झूठ बोलने, बहाने बनाने, बात करने से बचने के तरीकों में इतना बदलाव आ गया है कि इस पर महाग्रंथ लिखे जा सकते हैं.

ईद रहमतों की बारिश का दिन

‘ईद-अल-अजहा’ इस्लाम का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार है. यह त्योहार सुन्नत-ए-इब्राहीमी के नाम से भी जाना जाता है. जिस तरह से ईदुल फितर रमजान की खुशी में मनाया जाता है, ठीक उसी तरह से ईद-अल-अजहा भी हज की खुशी में मनाया जाता है. यह हर साल इस्लामी महीने जिल हिज्जा यानी हज के महीने की 10वीं तारीख को पड़ता है. इस दिन सभी मुस्लिम पहले ईदगाह जाकर खास नमाज अदा करते हैं और उसके बाद अपने-अपने घरों में कुर्बानी करते हैं.

जिंदादिल रहने का नाम जिंदगी

युवा पीढ़ी अक्सर कहती है कि जिस काम में वह संलग्न है, उससे उसका मन भर गया है. वह कुछ नया करना चाहती है. उसे ढेर सारी स्वतंत्रता चाहिए, अपने मन की करनी है और किसी दबाव में तो हरगिज नहीं. ऐसा क्या है, इस पीढ़ी में जिसे हर काम की व्याकुलता रहती है? काम पकड़ने की भी और काम छोड़ने की भी.

राष्ट्रपिता का वह आह्वान

हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का 150वां शताब्दी वर्ष चल रहा है. हम अपने देश की आजाद हवा में सांस ले सकें, इसके लिए गांधीजी के साथ अनेक महापुरुषों ने आंदोलन किये, अंग्रेजों से लड़ाइयां लड़ीं और अपनी कुर्बानी देने से कभी पीछे नहीं हटे.

अमरूद नहीं ये खुशियां हैं!

आजकल अमरूद के पेड़ फलों से झुक गये हैं और आते-जाते लोगों के आकर्षण के केंद्र में रहते हैं. खेतों की ओर निकले कृषक और स्कूल की ओर जाते बच्चे पके अमरूदों को निहारते हुए चलते हैं. अगर कोई न हो, तो पहले दो-चार तोड़ लेते हैं, फिर आगे बढ़ते हैं. कभी-कभी एक अमरूद के लिए दो बच्चों में उठ्ठम-पटका भी हो जाता है. यह सब पूरे सावन-भादो चलता ही रहता है.