कुछ अलग

बेहद खास है नाहन का मुहर्रम

Prabhat Khabar

कभी हिमाचल का बेंगलुरु कहे जानेवाले शहर ‘नाहन’ के पानी से लबालब तालाब मेहमानों व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं. हर साल मुहर्रम नाहन में एक खास शोकोत्सव बनके आता है.

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यह जीत है विपक्ष के लिए सबक

प्रो योगेंद्र यादव

ए क असाधारण चुनाव का असाधारण नतीजा हमारे सामने है. यह परिणाम असाधारण सिर्फ इसलिए नहीं है कि बीजेपी ...

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परिवारवाद की राजनीति को जनता ने नकारा

मोहन गुरुस्वामी

न रेंद्र मोदी और शाह की यह निश्चित ही बहुत बड़ी रणनीतिक जीत हुई है. पिछली लोकसभा के लिए जब नरेंद्र ...

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मोदी के विकास को जनादेश

रामबहादुर राय

भारतीय जनता पार्टी भारी बहुमत से सरकार बनाने जा रही है. कांग्रेस ने दो साल पहले कैंब्रिज एनालिटिका ...

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बिहार की राजनीति का अगला पड़ाव

मणींद्र नाथ ठाकुर

लोकसभा का चुनाव परिणाम एक बार फिर से एनडीए के पक्ष में गया है. कांग्रेस फिर कोई कमाल नहीं दिखा पायी ...

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जरूरी है पर्यावरणीय संतुलन

हम इंसानों ने अपने सुख-सुविधाओं के लिए जिस तरह दूसरे जीव-जंतुओं और वनस्पतियों का दोहन कर रहे हैं, वह हमारी जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचा रहा है. उदाहरण के लिए गिद्ध को ही लें. कुछ साल पहले ज्यादा दूध निकालने के लिए गायों और भैंसों को एस्प्रिन डाइक्लोफेनेक का इंजेक्शन लगाया जाने लगा, ताकि उनकी मांसपेशियां ढीली हो जायें और वे दूध छोड़ दें.

पेड़ पर चढ़ने की कला

बेलपत्र के पेड़ों पर ढेरों बेल लगे हैं. जामुन के मौसम में आसपास लगे जामुन के पेड़ जामुनों से भर जाते हैं. आम के पेड़ भी असंख्य आमों से भरे झूमने लगते हैं. हालांकि, इस बार आम कम दिखायी दे रहे हैं. अभी ज्यादा वक्त नहीं हुआ, जब बच्चों की टोली फलदार पेड़ों पर नजर रखती थी. जिनके घर में या घर के बाहर या बगीचे में फलदार पेड़ होते थे, वे भी इन बच्चों रूपी बंदरों पर नजर रखते थे. हमेशा आंख-मिचौली चलती रहती थी. सबसे अच्छा मौका बच्चों को दोपहर में मिलता था, जब गर्मी के दिनों में लोग झपकी लेते थे, आंख लग जाती थी.

जहां विस्मय तरबूज की तरह

जेठ की तपती दोपहर में जब हम लू की लहर से बचने के लिए तरबूज की ओर शीतलता की उम्मीद से देखते हैं, तब इसी धूप में नदी की रेत के खेत में तपते तरबूज किसानों का जलता हुआ खून-पसीना हमसे नजरअंदाज हो जाता है. जिस तरबूज को खरीदने में हमारी आंख निकलती है, उसके लिए किसानों को पैकारों से बहुत ही न्यूनतम मूल्य मिलता है.

महानता के सीजन

एक राज्य सरकार ने अपनी पाठ्य पुस्तकों में महाराणा प्रताप की महानता कम कर दी है, अकबर की बढ़ा दी है. वीर सावरकर के बारे में बताया गया है कि उन्हें सावरकर माना जा सकता है, पर वीर नहीं. ऊपर कहीं ये महान आत्माएं बात करती होंगी, तो कुछ यूं वार्तालाप होता होगा-

घुड़चढ़ी पर बवाल

सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार drsureshkant@gmail.

जुबां ही तो फिसली है, जनाब!

कविवर रहीमदास जी कह गये कि यह जिह्वा बावरी है. ऐसी बावरी कि पल में सरग-पताल कर, भीतर घुस जाये और जूती खानी पड़े कपाल को. पलक झपकते ही भू-मंडल का चक्कर लगा लेनेवाली जीभ का हश्र तो देखो कि उसे गिरना तो खाई में ही होता है. दो जबड़ों तथा बत्तीस दांतों की अंधेरी गुहा में कैद हो जाती है.

आम के स्वाद का रहस्य

कक्का कह रहे थे कि पके फलों में थोड़ा-सा स्वाद उस वृक्ष का रहता है और थोड़ा-सा उसी वृक्ष के हरे पत्तों का. धूप जो बड़े प्यार से उसमें मीठापन भरती है, पके फलों में वह तो विद्यमान रहता ही है.

व्यस्तता का बहाना

बिखरे बाल, बेतरतीब पड़े कमरे, चेहरे पे शिकन भले ही खुद को अति व्यस्त साबित करने के लिए बने-बनाये लक्षण हों, पर ये ढर्रे आंतरिक बेचैनी, थकान, हताशा या संदेह को प्रकट करने में ज्यादा सक्षम हैं.

जहाज पर तलवारबाजी!

चालू चैनल का सेट सजा हुआ है, युद्ध पोत जैसा कुछ बना दिया गया है, जिस पर समुद्री डाकुओं की ड्रेस में तमाम पार्टियों के प्रवक्ता बैठे हुए हैं, पुराने समुद्री डाकू कमर में तलवार बांध कर रखते थे. डिबेट के खास अंश-

वक्त ने किया क्या हसीं सितम!

एक कहावत है- शायरों और कवियों के ‘कौल’ और ‘फेल’ में बहुत ही फर्क होता है, लेकिन कैफी आजमी को पढ़ते हुए यह फर्क कहीं नजर नहीं आता. कैफी ने महज ग्यारह साल की छोटी-सी उम्र में पहली गजल लिखी- ‘इतना तो जिंदगी में किसी के खलल पड़े/ हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े.’ इस गजल को पढ़कर कैफी आजमी की शायरी के मेयार का अंदाजा लगाया जा सकता है.

सच्चे वादों की बारिश

आम लोग कुछ दिनों के लिए फिर बतिया रहे हैं कि कस्बे में शहर जैसा विकास करने के सच्चे वादों की बारिश में कई चुनाव बह गये, पंचायत बनी, लेकिन दशकों से गलियों की नालियों का कीचड़ मुद्दा नहीं बना.

गांव और झोंपड़ी की यात्राएं

छुट्टियां आ रही हैं. लोग अपने बाल-बच्चों समेत कहीं बाहर जाने का कार्यक्रम बना रहे हैं. इन दिनों बहुत से लोग बच्चों को गांव घुमाने ले जाते हैं. गांवों में लोग कैसे रहते हैं, चक्की पर आटा पीसते हैं कि नहीं, गाय-भैंस कैसे पालते हैं, दूर तक लहराते खेतों को देखना कैसा होता है, गांव का खान-पान कैसा होता है आदि.