कुछ अलग

बेहद खास है नाहन का मुहर्रम

Prabhat Khabar

कभी हिमाचल का बेंगलुरु कहे जानेवाले शहर ‘नाहन’ के पानी से लबालब तालाब मेहमानों व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं. हर साल मुहर्रम नाहन में एक खास शोकोत्सव बनके आता है.

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जननायक कर्पूरी ठाकुर जयंती : सामाजिक समता के प्रबल योद्धा

केसी त्यागी

जननायक कर्पूरी ठाकुर का आज जन्मदिन है. जननायक की उपाधि उन्हें अपने जीवन काल में ही विषमता, ...

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गुण-दोष हो कानून के विरोध का आधार

शेषाद्रि चारी

देश में कोई भी सरकार संविधान की शपथ लेकर सत्ता पर काबिज होती है और उसी के अनुरूप काम करती है. ऐसे ...

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नेताजी की जयंती पर विशेष : स्वतंत्रता संघर्ष के महानायक

कृष्‍ण प्रताप सिंह

लंबे स्वतंत्रता संघर्ष ने हमारे देश को जितने महानायक दिये, नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनमें सबसे अलग ...

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संविधान को जानेंगे, तभी तो मानेंगे

सुभाष कश्‍यप

यह बड़ी विडंबना वाली बात है कि भारत में संविधान को लेकर भयंकर निरक्षरता व्याप्त है. ज्यादातर लोग तो ...

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नोटों पर चित्रों का महत्व

अच्छी बातें हमें हमेशा देर से कहने, सुनने और समझने की आदत है. वैसे भी, सही बातें करनेवाले कुछ गलत बंदे कानून की गिरफ्त में आ जाते हैं! हालांकि, अनगिनत स्वामी और मठ हमारे देश में हैं, जिनकी तरफ से कभी-कभार महत्वपूर्ण सुझाव हमारे सामने आते रहते हैं.

मेले की संस्कृति

दिसंबर और जनवरी की ठंड के साथ जो बात सामने आती है, वह है पिकनिक और मेलों का आनंद. समय चाहे जितना बदल जाये, जीने के पैमाने बदल जायें, लेकिन जो क्रियाकलाप मौसम के साथ होते हैं, उनमें कोई कमी नहीं आती है. शरीर को जिस ऊष्मा की तलाश होती है, वह पिकनिक के बहाने पूरी हो जाती है. अब भी संयुक्त परिवार हैं, जहां लोग नौकरी या व्यवसाय की आपाधापी से कुछ क्षण के लिए निजात पाना चाहते हैं. पिकनिक के बहाने वे अक्सर दूर के इलाकों में भी निकल जाते हैं.

क्यों शुभता का रंग पीला है

कक्का कल खेतों की मेड़ पर चलते हुए बड़ी दूर तक निकल गये. दृश्य इतना सुहावना था कि समय का होश ही न रहा. चलते हुए अंत तक यही लगता रहा कि आगे का दृश्य पास के दृश्य से बेहतर है. इसी लोभ में चलते चले गये. ऊपर पंछियों के झुंड को लौटता देखकर पश्चिम की ओर निगाह फेरी, तो अंधेरे को तेजी से लपकता देख बढ़ते कदमों को मुश्किल से रोक पाये. उन्होंने कहा कि वसंत मौसमों का राजा है. लेकिन, यह सिर्फ अपने आभूषणों के कारण राजा नहीं है. यह अपने स्वभाव और कृषक समुदाय के होठों पर मुस्कुराहट देने के प्रयास के कारण भी राजा है.

रोजगार वाया आंदोलन

वही हुआ जिसका डर था. बिना मान्यता प्राप्त विवि से प्रदर्शन-आंदोलन का कोर्स किये आंदोलनकारी सड़क पर आ गये हैं. देश का कोई नामचीन विवि उस कौशल का पाठ्यक्रम संचालित ही नहीं कर रहा, जिसकी आज अधिक आवश्यकता है.

एक युद्ध बड़ा सुंदर-सा

मध्य-पूर्व के इलाके में तनाव-ईरान इराक में उठापटक. सायरन, जलती-बुझती रोशनियां, मिसाइल, धमाके- ये सब टीवी स्क्रीन पर भले ही उत्तेजक लगते हैं, पर ये हैं तबाहकारी. यह बात मैंने अपने एक टीवी पत्रकार मित्र से कही. पर वह कुछ खुश न हुआ.

नेताओं में एबीसीडीई का गुण!

बहुत साल पहले ‘नेताजी’ शब्द का बड़ा महत्व था. कहीं नेताजी का अर्थ आप सुभाष चंद्र बोस से लगा रहे हैं, तो मुझे क्षमा कीजिये. मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं. मैं आज के नेताजी की बात कर रहा हूं. एक समय था जब ‘नेताजी’ का अर्थ सत्य, अहिंसा, धर्म और न्याय शब्द का पर्याय हुआ करता था. किंतु आज इसके विपरीत काम करनेवाला ही नेताजी कहलाता है.

किताब का प्रमोशन और लेखक

दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला खत्म हो गया. मेले में किताबों का लोकार्पण बड़ी संख्या में किया जाता है. सोशल मीडिया पर धूम रहती है. पहले लेखक का काम होता था लिखना और प्रकाशक का काम पुस्तक बेचना और पुस्तक समीक्षा के लिए पुस्तक भेजना. लेकिन, इन दिनों बहुत कम प्रकाशक समीक्षा के लिए पुस्तक भेजते हैं.

डॉ खगेंद्र ठाकुर : साहित्यिक आंदोलन का परचम

हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक डॉ खगेंद्र ठाकुर का जाना हमारे समाज और साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है. प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष बननेवाले वह उसके वरिष्ठतम सदस्य भी थे और पूर्व महासचिव भी थे. वह जनशक्ति के संपादक भी रहे और उन्होंने दो दर्जन के करीब किताबें भी लिखी हैं.

खिलजी का कनॉट प्लेस!

ज्ञान चर्चा हो रही थी. एक ज्ञानी ने कहा- पब्लिक बहुत चालू और लालची टाइप होती है. कुछ रकम में उसे खरीदा जा सकता है. न जाने कब से यही सब हो रहा है. अलाउद्दीन खिलजी ने अपने चाचा की हत्या कर दी थी, तो उसके खिलाफ दिल्ली में सारी पब्लिक एक हो गयी थी. खिलजी ने चांदनी चौक में अशर्फियां बंटवाना शुरू किया, पब्लिक ने अशर्फियां अंदर कीं और खिलजी के समर्थन में अपना बयान बाहर किया.

धर्म और आदमी का रिश्ता

अपने सभी पर्यायों के साथ धर्म और आदमी का रिश्ता अंडे और मुर्गी के रिश्ते जैसा है. पता ही नहीं चलता कि किसने किसे बनाया. वैसे दिमाग से काम लिया जाये, हालांकि धर्म के मामले में कोई दिमाग से काम लेता नहीं है, फिर भी अगर ले लिया जाये, तो साफ पता चल जाता है कि आदमी ने ही धर्म को बनाया होगा अपनी सुविधा के लिए.

ताकि समृद्ध हो ज्ञान-परंपरा

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक तस्वीर टहल रही थी. हेयर ड्रेसर सैलून वाली वह तस्वीर केरल की थी, जिसमें नाई एक आदमी का बाल काटता दिख रहा है, वहीं उसके पीछे बाल कटवाने के लिए अपनी बारी के इंतजार में बैठा दूसरा आदमी किताब पढ़ रहा है. सैलून में एक बड़ा-सा बुकशेल्फ है, जिसमें सैकड़ों किताबें रखी हुई हैं.

यूं भी संकल्प से बचाइए पानी!

हर बार जब नया साल आता है, तो उस खास मौके पर उसके पहले महीने की पहली तारीख पर लोगों के बीच कोई न कोई ''संकल्प'' लेने की ''परंपरा'' है. लोग कुछ अच्छा करने का संकल्प लेते हैं, लेकिन, मैं उन सबसे कुछ अलग संकल्प लेता हूं. मैं ''सर्दी में न नहाने'' का संकल्प लेता हूं. काफी चिंतन-मनन के बाद एक यही संकल्प मेरी समझ में आता है.