कुछ अलग

बेहद खास है नाहन का मुहर्रम

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कभी हिमाचल का बेंगलुरु कहे जानेवाले शहर ‘नाहन’ के पानी से लबालब तालाब मेहमानों व पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं. हर साल मुहर्रम नाहन में एक खास शोकोत्सव बनके आता है.

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जन-संस्कृति का त्योहार है होली

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हमारी काॅलोनी के बच्चे प्लास्टिक की पिचकारियां हाथ में लेकर एक-दूसरे के पीछे दौड़ते दिख रहे हैं, ...

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घातक है नफरत की संस्कृति

आकार पटेल

शुक्रवार (15 मार्च, 2019) को रेडियो पर समाचार सुनते हुए मुझे न्यूजीलैंड में हुए नरसंहार के बारे में ...

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हर राज्य में हों कैंसर अस्पताल

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बीते रविवार की शाम गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का निधन हो गया. पर्रिकर पैंक्रियाटिक कैंसर से ...

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और अब श्वेत आतंकवाद का उभार

आशुतोष चतुर्वेदी

न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में दो मस्जिदों पर अंधाधुंध गोलीबारी कर 50 लोगों की जान लेने की घटना ने ...

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प्रकृति रंग लुटा रही है!

कक्का खेतों की ओर से घूम कर लौटे ही थे. कह रहे थे कि फागुन का महीना आते-आते प्रकृति लाल, हरे और पीले रंगों में डूबने-उतरने लगती है. उन्होंने सेमल के लाल-लाल फूलों को याद किया और नये निकले हरे पत्तों को भी. उन्हें आमों में अभी-अभी निकले बौर की याद हो आयी. उन्होंने कहा कि किसी भी त्योहार का उत्साह प्रकृति अपने में सकारात्मक बदलाव करके हमें पहले ही दे देती है!

मिथिला की ‘लिखिया कला’

पिछले दिनों राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मिथिला कला की वयोवृद्ध एवं सिद्धहस्त कलाकार गोदावरी दत्त को पद्मश्री से सम्मानित किया. राष्ट्रपति के ट्विटर हैंडल से राष्ट्रपति भवन ने गोदावरी दत्त की तस्वीर शेयर करने के साथ ही लिखा कि ‘पारंपरिक कला को बढ़ावा देने, उभरते कलाकारों को प्रशिक्षित करने और मार्गदर्शन के लिए’ उन्हें यह सम्मान दिया गया.

चुनाव परिणाम तक नागरिक-संहिता

लोकसभा चुनावों की घोषणा हो गयी है, 23 मई 2019 को परिणाम भी आ जायेंगे. चुनाव आयोग ने नेताओं के लिए आचार संहिता लगा दी है, पर नागरिक-वोटर लोकतंत्र में सबसे ताकतवर होते हैं और इसलिए उनमें से कुछ खुद को हर तरह के नियम-कायदों से मुक्त भी मानते हैं.

सामाजिकता और शिक्षा व्यवस्था

यह परीक्षाओं का समय है. कुछ बोर्ड की परीक्षाएं हो रही हैं, तो कुछ की होनेवाली हैं. इसके बाद आयेगा परीक्षा परिणाम का दौर और उससे जुड़ी तमाम आकांक्षाओं के बनने-बिगड़ने का समय. विरोधाभास यह है कि एक तरफ आजकल बहुतायत में विद्यार्थियों को 95 से 100 फीसदी के बीच अंक प्राप्त हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ हम यह भी देखते हैं कि ये बच्चे देश-काल की जमीनी हकीकत से बहुत कम वााकिफ होते हैं.

आध्यात्मिक फिजाओं की खुशबू

भारत में हर ऋतु के अनुसार खान-पान, पर्व-उत्सव और कर्मकांड होते हैं. माघ मेला, पौष मेला, कुंभ मेला, दशहरा मेला आदि एक स्थान विशेष में होते हुए भी विभिन्न प्रदेशों की संस्कृति को समेटे होते हैं. मेला जब गंगा के किनारे हो तब उसका महत्व और भी बढ़ जाता है. गंगोत्री से निकली गंगा कूदती-फांदती उत्तर प्रदेश-बिहार पहुंचते-पहुंचते युवा हो जाती है. थोड़ी चपलता, थोड़ा गांभीर्य. और बात जब संगम के गंगा की हो तो क्या कहने! संगम की गरिमा और इसकी महिमा से हर व्यक्ति परिचित है.

मैं भी वही करूं की प्रतियोगिता!

देश की मिली-जुली संस्कृति में गन्ना, रस, गुड़, नींबू, नीम, करेला और शहद सब मिल-जुल कर रहते हैं. कभी मीठा ज्यादा हो जाये, तो कहने लगते हैं कि जीवन में कड़वा भी होना चाहिए, ताकि मीठे के महत्व से वाबस्ता रहें. फीकी चाय पीने की आदत डाल लो, तो सेहत के लिए वही अच्छी लगने लगती है.

नमस्ते की कीमत!

बहुत साल पहले छोटी बहन और बड़ा भाई साथ-साथ जा रहे थे. अचानक सामने से एक सज्जन आये. बहन ने कहा- अंकल नमस्ते. आगे जाकर भाई ने बहन से कहा-अपनी नमस्ते बचाकर रखा कर. यह क्या कि हर-एक के सामने हाथ जोड़ती फिरती है. भाई की उम्र कोई ज्यादा नहीं थी, लेकिन उसके मन में यह बात कैसे आयी होगी कि नमस्ते हर एक से नहीं करनी चाहिए. उसे किसने यह सिखाया होगा. उसने जरूर बड़ों को ऐसा करते देखा होगा.

अक्ल से परे के संबंध

मद्रास उच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकार से पूछा है कि क्या टीवी धारावाहिकों के चलते विवाह से परे संबंधों को बढ़ावा मिल रहा है. न्यायालय ने इस संबंध में विशेषज्ञों की एक शोध समिति के गठन का सुझाव भी दिया है. विवाह के परे के संबंधों का ताल्लुक टीवी धारावाहिकों से क्या है, इसका पूरा शोध हो जाये, तो कई सवालों के जवाब मिल जायेंगे.

महिला जागरूकता का दिवस

बॉलीवुड के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन कहते हैं- ‘क्योंकि आप महिलाएं हैं, इसलिए लोग आप पर अपनी सोच थोपेंगे. वे आपको बतायेंगे कि कैसे कपड़े पहनें, कैसे व्यवहार करें, किससे मिलें और कहां जायें.

समस्याएं खड़ी करने की कला

अपने हिस्से की समस्या खड़ी करने का अधिकार हर किसी को है. भला वह भी कोई इनसान है, जो समस्या तक खड़ी न कर सके. कीड़े-मकौड़े तक समस्या खड़ी कर देते हैं. इतना दम-खम तो हर किसी में होना चाहिए कि अपने या अपने से ऊपर के स्तर की समस्या खड़ी कर सके और आसपास के लोग परेशान होकर उसका लोहा मान लें.

वाह ढोलकिया वाह!

कक्का उस दिन सुर्ख लाल अड़हुल के फूलों को देर तक निहारते रहे थे. उन्हें आश्चर्य लग रहा था कि इस पौधे के पत्ते कितने हरे हैं और फूल कितने लाल! कहने लगे कि प्रकृति इंसान को रंग का एक अनमोल सुख भी देती है. जो न सिर्फ हमारी भावनाओं को उद्दीप्त करने का काम करता है, बल्कि जीवन के आयाम में भी सहयोग करता है.

सिनेमा के स्वरूप पर उठते सवाल

पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशक में फिल्म अध्येताओं के बीच बजरिये आंद्रे बाजां ‘सिनेमा क्या है’, बहस के केंद्र में था. असल में सिनेमा के चर्चित आलोचक और सिंद्धांतकार बाजां की इस नाम से मूल फ्रेंच भाषा में दो भागों में लिखी किताब का अंग्रेजी अनुवाद बाजार में आया था. करीब पचास वर्ष बाद एक बार फिर से सिनेमा के सौंदर्यशास्त्र और स्वरूप को लेकर सवाल उठ रहे हैं.