मणींद्र नाथ ठाकुर

जनतंत्र और ज्ञान परंपरा

मणींद्र नाथ ठाकुर

हाल के दिनों में यह बात लगभग साफ हो गयी है कि दुनियाभर में जनतंत्र और पूंजीवाद के बीच का रिश्ता बदलता जा रहा है. पूंजीवाद ने अपने प्रारंभिक दिनों में जनतंत्र की लड़ाई लड़ी थी. फ्रांस की क्रांति इसका अच्छा उदाहरण है. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी ऐसा कुछ देखा जा सकता है. लेकिन 2008 के आर्थिक संकट के बाद से पूंजी मालिकों को जनतंत्र खतरनाक लगने लगा है. इसलिए एक नयी तरह की राजनीति जन्म ले रही है.

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