Rajneesh Anand

  • इन महिलाओं ने मसाला बेचकर जिंदगी को बनाया जायकेदार

    झारखंड की महिलाएं ना सिर्फ मेहनती हैं, बल्कि उनके अंदर स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता की भावना भी भरपूर है. इसकी बानगी राजधानी रांची के कांके प्रखंड के गारू गांव में देखने को मिलती है, जहां मात्र पांच महिलाओं ने मिलकर मिसाल कायम की है. इसकी सफलता की कहानी कुछ इस प्रकार है. गारू गांव के एक सखी मंडल की पांच महिलाओं ने इस साल की शुरुआत से मसाला फैक्टरी लगायी है. जहां शुद्ध मसालों को पीसकर बाजार में बेचा जा रहा है.

  • बिहार, झारखंड और बंगाल में भाजपा ने सिर्फ एक अल्पसंख्यक को दिया टिकट, एनडीए से मात्र दो

    भाजपा एक ऐसी पार्टी है जिसके लिए यह माना जाता है कि वह अल्पसंख्यकों से दूरी बनाकर रखती है. भाजपा की ओर से चुनावों में पार्टी प्रत्याशी भी अल्पसंख्यक समुदाय से कम ही बनाये जाते हैं. ऐसे में यह जानने की जरूरत है कि इस चुनाव में भाजपा अल्पसंख्यकों के कितना करीब हुई. अगर बात बिहार, झारखंड और बंगाल की हो, तो यहां से चुनिंदा अल्पसंख्यकों को ही टिकट दिया गया है.

  • बिहार-झारखंड में जिन महिलाओं को टिकट मिला वे सब मुखौटा, जानें क्या है असलियत...

    बिहार-झारखंड में कुल 54 लोकसभा क्षेत्र हैं और सात और चार चरणों में मतदान होना है. सभी पार्टियों ने तैयारी शुरू भी कर दी है, दो-चार सीटों को छोड़ दें तो सभी पार्टियों ने अपने-अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है. बिहार और झारखंड दोनों ही जगहों पर विपक्ष ने महागठबंधन किया है और भाजपा को हराने के लिए एकजुट हुए हैं. इन पार्टियों में तमाम मुद्दों को लेकर चाहे कितना भी मतभेद हो, लेकिन महिलाओं को राजनीति में भागीदारी देने के मामले में सबके चेहरे एक हैं

  • महिला सशक्तीकरण के नाम पर भाजपा ने अबतक कुल 33 महिलाओं को ही देश भर में दिया टिकट, जानें प्रत्याशियों के नाम

    भाजपा ने अबतक लोकसभा चुनाव के लिए अपने 375 प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है. पहले चरण का मतदान 11 अप्रैल को होना है. प्रत्याशियों की सूची पर अगर नजर डालें तो हम पायेंगे कि अबतक जिन महिलाओं को टिकट दिया उनकी संख्या मात्र 33 है. अभी कुछ और सूचियां जारी होनी हैं, जिनमें कुछ और महिला उम्मीदवारों का नाम हो सकता है, लेकिन उनकी संख्या दस से अधिक नहीं होगी, यह भी तय है. कहने का आशय यह है कि भाजपा की ओर से इस बार भी 50 महिला उम्मीदवारों को भी टिकट नहीं दिया जायेगा.

  • अटल-आडवाणी युग का उत्थान और फिर पतन

    भारतीय राजनीति में कई लीडर उभरे और इतने शक्तिशाली हुए कि उनका विकल्प कोई नहीं दिखता था, लेकिन कुछ समय बाद उनका पतन हो गया. इसे एक युग के रूप में देखा जाता है, जैसे गांधी युग, नेहरू युग, इंदिरा युग. हालांकि यह एक सच्चाई है कि उत्थान और पतन का दौर हर युग में आया. आज जबकि अटल-आडवाणी युग के पतन की बात हो रही है तो एक बार इस युग के उत्थान और पतन की चर्चा भी जरूरी है.

  • सरकारी योजनाओं को मजबूती देकर बाल अधिकार सुनिश्चित कर रही है ‘Save the Children' : महादेव हांसदा

    बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करके उनका बचपन खुशहाल बनाने के लिए ‘सेव दि चिल्ड्रेन’ काम कर रही है. हमारी संस्था मुख्यत: तीन क्षेत्रों में काम कर रही है- चाइल्ड प्रोटेक्शन, चाइल्ड एजुकेशन एवं स्वास्थ्य और पोषण. उक्त बातें ‘ सेव दि चिल्ड्रेन’ झारखंड के जेनरल मैनेजर स्टेट प्रोग्राम महादेव हांसदा ने कही. मूलत : बंगाल के पुरुलिया के रहने वाले महादेव हांसदा 2013 से संस्था से जुड़े हैं.

  • बाल विवाह के खिलाफ लोगों को जागरूक करने में जुटी है ‘सेव दि चिल्ड्रेन’ रूमी कुमारी को बनाया है ‘चाइल्ड चैंप’

    भारत एक ऐसा देश है जहां बाल विवाह एक गंभीर समस्या है, झारखंड में 38 प्रतिशत लड़कियां 18 वर्ष से पहले ब्याह दी जाती हैं. जिसका उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. कम उम्र में शादी होने के कारण वे कम उम्र में मां भी बन जाती हैं, जिसके लिए उनका शरीर तैयार नहीं होता है, जिसके कारण कई बार डिलीवरी के दौरान उनकी मौत भी हो जाती है.

  • ‘सेव दि चिल्ड्रेन’ ने आयोजित किया Competency Based Training कार्यक्रम

    बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘सेव दिन चिल्ड्रेन’ ने झारखंड स्टेट चाइल्ड प्रोटेक्शन सोसाइटी गवर्मेंट अॅाफ झारखंड के सहयोग से प्रोटेक्शन आफिसर्स के लिए competency Based training प्रोग्राम का आयोजन किया गया. इस ट्रेनिंग का उद्देश्य क्षमता में वृद्धि करना था.

  • झारखंड में ‘ट्रैफिकिंग’ और बाल यौन शोषण रोकने के लिए काम कर रही है Save the Children

    झारखंड में ‘ट्रैफिकिंग’ एक ऐसी समस्या है जो बच्चों का बचपन उनसे छीन लेती है और उन्हें एक ऐसा जीवन जीने पर मजबूर कर देती है, जिसकी चाहत उन्होंने कभी नहीं की होगी. झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य है और यहां के कई जिलों में ‘ट्रैफिकिंग’ की समस्या आम है, जिनमें रांची, गुमला, खूंटी, लोहरदगा, सिमडेगा, चाईबासा, दुमका और पलामू प्रमुख हैं.

  • क्या आप जानते हैं झारखंड की पहली महिला सांसद विजया राजे को?

    झारखंड राज्य का गठन तो वर्ष 2000 में हुआ था, लेकिन अविभाजित बिहार में जिस महिला ने इस क्षेत्र से पहली बार चुनाव जीता, उनका नाम विजया राजे था. जी हां विजया राजे ने चतरा लोकसभा सीट से 1957 में पहली बार चुनाव जीता था. हालांकि इससे पहले वे 1952 में राज्यसभा के लिए चुनी गयीं थीं.

  • क्या आप जानते हैं झारखंड की पहली महिला सांसद विजया राजे को?

    झारखंड राज्य का गठन तो वर्ष 2000 में हुआ था, लेकिन अविभाजित बिहार में जिस महिला ने इस क्षेत्र से पहली बार चुनाव जीता, उनका नाम विजया राजे था. जी हां विजया राजे ने चतरा लोकसभा सीट से 1957 में पहली बार चुनाव जीता था. हालांकि इससे पहले वे 1952 में राज्यसभा के लिए चुनी गयीं थीं.

  • फूलपुर : कभी पंडित नेहरू के कारण था कांग्रेस का गढ़, आज कोई अस्तित्व ही नहीं

    फूलपुर लोकसभा सीट उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से एक है, लेकिन यह सीट बहुत ही खास है. इस सीट के खास होने का कारण है यहां के सांसद पंडित जवाहर लाल नेहरू जो देश की आजादी के बाद से अपने मृत्यु तक यहां से सांसद रहे. उनके बाद इस सीट से विजयलक्ष्मी पंडित सांसद बनीं.

  • बच्चों में कुपोषण की समस्या को मात देने के लिए गुमला जिले में पिछले पांच वर्षों से कार्यरत है ‘सेव दि चिल्ड्रेन’

    बच्चों को देश का भविष्य माना जाता है, लेकिन यह झारखंड के लिए दुर्भाग्य की बात है कि यहां के 47.8 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. एनएफएचएस-4 (2015-16) के अनुसार झारखंड में 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 45 प्रतिशत बच्चे बौनेपन के शिकार हैं. 29 प्रतिशत बच्चे काफी दुबले हैं, यानी वे पोषाहार से वंचित हैं.

  • झारखंड में ड्रॉपआउट की एक बड़ी वजह है ‘ट्रैफिकिंग’

    ड्रॉपआउट हमारे समाज की एक ऐसी समस्या है, जो हमारी शिक्षा व्यवस्था को तो घुन की तरह खा ही रही है देश के भविष्य को भी खतरे में डाल रही है. ड्रॉप आउट की समस्या शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण इलाकों में बहुत ज्यादा है जिसके कारण हजारों बच्चे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं. आंकड़ों पर अगर गौर करें तो झारखंड राज्य में ड्रॉपआउट की समस्या बहुत गंभीर है.

  • लड़कों के खिलाफ बढ़ रहे हैं पॉक्सो एक्ट के मामले, घटनाओं का फॉलोअप ना होना भी समस्या का कारण : आरती कुजूर

    झारखंड में बाल अधिकारों की स्थिति यह है कि सबसे अधिक कुपोषित बच्चे झारखंड में हैं, बाल विवाह सबसे ज्यादा यहीं पर होता है, ड्रॉपआउट के मामलों में भी झारखंड बिहार के बाद दूसरे नंबर पर है, बावजूद इसके झारखंड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष आरती कुजूर का कहती हैं कि प्रदेश में समस्याएं तो हैं, लेकिन उनके निराकरण के लिए बहुत काम हो रहा है, अफसोस यह है कि उसे जिस तरह से दिखना चाहिए वह नहीं दिखता है. इसका कारण है आपसी सामंजस्य की कमी.

  • क्या इस बार भी झारखंड से कोई महिला नहीं पहुंच पायेगी लोकसभा? जानें अबतक कौन-कौन बनीं सांसद...

    लोकसभा चुनाव नजदीक है अगले महीने संभवत: तारीखों की घोषणा हो जाये. ऐसे में सभी राजनीतिक दल रेस हैं. चुनाव जीतने के लिए रणनीतियां बननी शुरू हो गयी है. सरकार उपलब्धियां गिना रही है, तो विपक्ष सरकार की नाकामी. इन सब के बीच एक सवाल है, जो झारखंड के लिए मौजूं है. क्या इस बार कोई महिला उम्मीदवार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचेंगी?

  • क्या इस बार भी झारखंड से कोई महिला नहीं पहुंच पायेगी लोकसभा? जानें अबतक कौन-कौन बनीं सांसद...

    लोकसभा चुनाव नजदीक है अगले महीने संभवत: तारीखों की घोषणा हो जाये. ऐसे में सभी राजनीतिक दल रेस हैं. चुनाव जीतने के लिए रणनीतियां बननी शुरू हो गयी है. सरकार उपलब्धियां गिना रही है, तो विपक्ष सरकार की नाकामी. इन सब के बीच एक सवाल है, जो झारखंड के लिए मौजूं है. क्या इस बार कोई महिला उम्मीदवार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचेंगी?

  • CWC ने कराया दिल्ली से झारखंड के 20 बच्चों का रेसक्यू, पिछले छह माह में 150 बच्चे छुड़ाए गये

    आज चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) और बाल अधिकारों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाली संस्था ‘सेव दि चिल्ड्रेन’ के सहयोग से झारखंड के 20 बच्चों को दिल्ली से ‘रेसक्यू’ कराकर रांची लाया गया. इस संबंध में जानकारी देते हुए CWC की चेयरपर्सन डॉ रूपा वर्मा ने बताया कि हमें यह जानकारी मिली थी कि झारखंड के 40 बच्चे दिल्ली में हैं, इस सूचना के बाद हमने 12 लोगों की टीम बनायी और दिल्ली गये. इस टीम में 10 पुलिस विभाग के थे, एक CWC के और एक और सदस्य हमारे सहयोगी संस्था के थे.

  • लोकसभा चुनाव 2019 : सपा-बसपा गठबंधन के बाद गोरखपुर सीट बचाना भाजपा के लिए चुनौती, जानें क्या है इतिहास...

    गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सीट है. यह सीट भारतीय जनता पार्टी का गढ़ रहा है और 1989 से 2017 तक इस सीट पर भाजपा के उम्मीदवार जीत दर्ज करते रहे हैं. लेकिन 2017 में जब यहां के सांसद योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो यहां उपचुनाव हुआ और सपा-बसपा के गठबंधन ने भाजपा के दुर्ग को ध्वस्त करते हुए यह सीट अपने नाम कर ली.

  • लोकसभा चुनाव 2019 : सपा-बसपा गठबंधन के बाद गोरखपुर सीट बचाना भाजपा के लिए चुनौती, जानें क्या है इतिहास...

    गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सीट है. यह सीट भारतीय जनता पार्टी का गढ़ रहा है और 1989 से 2017 तक इस सीट पर भाजपा के उम्मीदवार जीत दर्ज करते रहे हैं. लेकिन 2017 में जब यहां के सांसद योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो यहां उपचुनाव हुआ और सपा-बसपा के गठबंधन ने भाजपा के दुर्ग को ध्वस्त करते हुए यह सीट अपने नाम कर ली.