प्रभु चावला

  • नव भारत निर्माण के धनस्रोत

    वायदों की, न कि उपलब्धियों की सियासत का शोर वोट की बोलियां लगते इस चुनावी माहौल में चहुंओर तारी है. शायद ही कोई पार्टी हो, जो मतदाताओं को किसी न किसी रूप में रिश्वत की पेशकश न कर रही हो. इसके बावजूद, नैतिकता का दिखावा असाध्य रोग के रूप में बार-बार उभर आता है और प्रत्येक पार्टी दूसरे पर ऐसे वायदों का आरोप लगाती है, जिन्हें कभी पूरा नहीं किया जा सकता.

  • संवाद चाहिए, विवाद नहीं

    सदियों से विभिन्न विडंबनाओं ने भारत को एक ऐसे अनोखे देश के रूप में परिभाषित किया है, जहां अतीत तथा वर्तमान में तवज्जो पाने की होड़ लगी रहती है. भारत विश्व का सबसे युवा देश होते हुए भी वर्ष 2020 तक दूसरा ऐसा देश बनेगा, जो साठोत्तर वर्ष की उम्र हासिल कर चुका होगा.

  • जरूरी है चीन पर आर्थिक चोट

    यों तो मसूद अजहर पाकिस्तानी आइएसआइ की कठपुतली है, पर चीन उसे खुद के लिए संपदा का एक ऐसा सृजनकर्ता मानता है, जो पाकिस्तान और यहां तक कि उसके आगे भी चीन के सामरिक तथा कारोबारी हितों का पोषण करता है. मगर ऐसा करते हुए चीन हमारी उस उदार नीति को नजरअंदाज कर देता है, जिसके बलबूते उसे भारत में अपने निर्यातों के बदले डॉलरों में वह कमाई होती है, जिसे वह पाकिस्तान स्थित अपने इस पसंदीदा आतंकी खलनायक के वित्तपोषण में खर्च करता है.

  • भारत के लिए घोषणापत्र

    राजनीतिक महाभारत का नवीनतम संस्करण व्यूह-रचना के दौर में है. आधा दर्जन राष्ट्रीय तथा पचास से अधिक क्षेत्रीय पार्टियां अपने घोषणापत्र रूपी मिसाइलों के साथ रणक्षेत्र में जाने को तैयार हैं, जिनमें नया भारत, समावेशी भारत, सहिष्णु भारत, समृद्ध भारत, शक्तिशाली भारत एवं एकजुट भारत जैसे नारों की बारूद भरी हुई है.