प्रभु चावला

  • कांग्रेस के लिए चुनाव के संदेश

    कांग्रेस मर चुकी है. कांग्रेस का विचार अमर रहे! वर्ष 2019 के एग्जिट पोल ने ये दोहरा संदेश दिया है कि हालांकि राज्य विधानसभाओं तथा संसद में इस ‘ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ की जगह अब काफी तंग हो चुकी है, पर भारत के सभी कोनों में इसके कार्यकर्ता जीवित तथा सक्रिय हैं. यदि 19 मई की चुनावी अटकलें नतीजों के दिन उलटी-पुलटी भी हो जायें, तो इतना तय है कि कांग्रेस केंद्र के सत्ता सोपान के प्रथम पायदान से भी मीलों दूर ही रहेगी.

  • जोड़नेवाले नारों की जरूरत

    सियासी पार्टियों के नारे कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों में एकता का पोषण करते हैं. पर चालू चुनाव में वे संहार तथा विभाजक उन्माद से संयुक्त सनक के शब्दों में तब्दील हो चुके हैं. ‘राम-राम’ की शब्दावली कभी हिंदुओं और मुसलिमों के बीच उभयपक्षीय अभिवादन के लिए इस्तेमाल हुआ करती थी.

  • किंगमेकर के किरदारों का दौर

    राजनीति का अंतिम कर्म सत्ता है. राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा से युक्त छोटे-बड़े सभी किस्म के सभी नेताओं का सपना इंद्रप्रस्थ के चमचमाते सिंहासन पर आसीन होना ही होता है. अब जबकि आमचुनावों के परिणामों को सिर्फ दो सप्ताहों की प्रतीक्षा शेष रह गयी है, कई नेता ‘किंगमेकर’ की भूमिकाओं में उतर गये हैं. चालू आम चुनाव विचारों एवं आदर्शों का संघर्ष नहीं है. सभी 542 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं के सामने विकल्प कुछ विचित्र ढंग से केवल दुहरे रूप में ही मौजूद है-यह कि वह पीएम मोदी अथवा एक प्रांतीय क्षत्रप में किसी एक का चुनाव करे.

  • सितारों के सम्मोहन में सियासत

    हॉलीवुड सितारे तथा पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने एक बार एक प्रश्न उछाला, ‘एक अभिनेता क्या जानता है?’ और रिपब्लिकन उम्मीदवार के रूप में दो बार राष्ट्रपति चुनाव जीतकर अपने इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने स्वयं ही दे दिया. भारत में किंवदंती बन चुके एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) एवं एनटी रामाराव (एनटीआर) की ही भांति अमेरिकी काउबॉय रीगन ने भी शीतयुद्ध के शिखर काल में ‘शैतानी साम्राज्य’ से संघर्ष करने हेतु अमेरिका द्वारा महसूस की जा रही एक नायक की जरूरत का लाभ उठाकर दिखा दिया कि अभिनेता चुनाव जीतने की कला जानते हैं. सिनेमा अफसाने को हकीकत के रूप में पेश करने का नाम है और रीगन ने ग्लैमर का मिथक रचते हुए उसे सियासी संभावनाओं का रूप दे दिया.

  • दलबदलुओं पर निर्भर होती राजनीति

    सफल नेतागण सिर्फ अपने वारिसों को गढ़कर ही अपनी विरासत टिकाऊ बना पाते हैं. चूंकि आदर्श रूप में किसी सियासी पार्टी की सक्रियता किसी खास विचारधारा से ऊर्जा पाती है, इसलिए नेताओं की विरासत पार्टी में नये झंडाबरदारों की लगातार भर्ती पर ही निर्भर होती है. पर लोकसभा के लिए वर्ष 2019 के संग्राम ने लगभग सभी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पार्टियों का वैचारिक दिवालियापन उजागर कर दिया है.

  • नव भारत निर्माण के धनस्रोत

    वायदों की, न कि उपलब्धियों की सियासत का शोर वोट की बोलियां लगते इस चुनावी माहौल में चहुंओर तारी है. शायद ही कोई पार्टी हो, जो मतदाताओं को किसी न किसी रूप में रिश्वत की पेशकश न कर रही हो. इसके बावजूद, नैतिकता का दिखावा असाध्य रोग के रूप में बार-बार उभर आता है और प्रत्येक पार्टी दूसरे पर ऐसे वायदों का आरोप लगाती है, जिन्हें कभी पूरा नहीं किया जा सकता.

  • संवाद चाहिए, विवाद नहीं

    सदियों से विभिन्न विडंबनाओं ने भारत को एक ऐसे अनोखे देश के रूप में परिभाषित किया है, जहां अतीत तथा वर्तमान में तवज्जो पाने की होड़ लगी रहती है. भारत विश्व का सबसे युवा देश होते हुए भी वर्ष 2020 तक दूसरा ऐसा देश बनेगा, जो साठोत्तर वर्ष की उम्र हासिल कर चुका होगा.

  • जरूरी है चीन पर आर्थिक चोट

    यों तो मसूद अजहर पाकिस्तानी आइएसआइ की कठपुतली है, पर चीन उसे खुद के लिए संपदा का एक ऐसा सृजनकर्ता मानता है, जो पाकिस्तान और यहां तक कि उसके आगे भी चीन के सामरिक तथा कारोबारी हितों का पोषण करता है. मगर ऐसा करते हुए चीन हमारी उस उदार नीति को नजरअंदाज कर देता है, जिसके बलबूते उसे भारत में अपने निर्यातों के बदले डॉलरों में वह कमाई होती है, जिसे वह पाकिस्तान स्थित अपने इस पसंदीदा आतंकी खलनायक के वित्तपोषण में खर्च करता है.

  • भारत के लिए घोषणापत्र

    राजनीतिक महाभारत का नवीनतम संस्करण व्यूह-रचना के दौर में है. आधा दर्जन राष्ट्रीय तथा पचास से अधिक क्षेत्रीय पार्टियां अपने घोषणापत्र रूपी मिसाइलों के साथ रणक्षेत्र में जाने को तैयार हैं, जिनमें नया भारत, समावेशी भारत, सहिष्णु भारत, समृद्ध भारत, शक्तिशाली भारत एवं एकजुट भारत जैसे नारों की बारूद भरी हुई है.