विजय कुमार चौधरी

  • गांधी के देश का होने का गर्व

    इस वर्ष महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं. गांधी एक ऐसे युगपुरुष थे, जिन्होंने सत्य एवं अहिंसा के अमोघ अस्त्र से हिंदुस्तान को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराया था. उन्होंने चरणबद्ध तरीके से भारतीयों के मन से निराशा एवं भय को समाप्त कर आत्मगौरव का जो पाठ पढ़ाया, उससे उद्वेलित भारतीय जनमानस ने गुलामी की सारी बेड़ियां तोड़ दीं.

  • धर्म और राजनीति

    धर्म और राजनीति दोनों सदियों से व्यक्ति एवं समाज पर गहरा प्रभाव डालनेवाले विषय रहे हैं. दोनों ने ही मानव सभ्यता के विकास में अहम भूमिका निभायी है और समय-समय पर मानव इतिहास को नयी दिशा भी दी है.

  • कर्नाटक मामले से उपजे सवाल

    कर्नाटक में विधायकों के इस्तीफा एवं सरकार के विश्वासमत का प्रकरण अंतहीन बनता जा रहा है. राजनीतिक फलाफल से निरपेक्ष इस क्रम में कुछ महत्वपूर्ण बातें उभरकर सामने आयीं. राजनीतिक लाभ या हानि जिस दल का भी हुआ, इस प्रकरण से संबद्ध संवैधानिक संस्थाओं पर इसके प्रभाव का आकलन आवश्यक है. सर्वविदित है कि कर्नाटक के कांग्रेस और जनता दल (एस) के 16 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया और गोवा चले गये

  • सीजेआइ प्रकरण से उपजे सवाल

    भारत के मुख्य न्यायाधीश पर महिला कर्मचारी द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप प्रकरण ने जनमानस में कई प्रश्न अनुत्तरित छोड़ दिये हैं. सुप्रीम कोर्ट के जजों की तीन सदस्यीय आंतरिक समिति के द्वारा जांचोपरांत मुख्य न्यायाधीश को आरोप मुक्त किये जाने संबंधी प्रतिवेदन से असहमत भी होने का कारण नहीं है. फिर भी इस अभूतपूर्व घटना ने न्याय प्रणाली से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है.

  • भारत को घेरता ड्रैगन

    पिछले सात सितंबर को चीन ने अपने चार बंदरगाह और तीन लैंड-पोर्ट (भू-बंदरगाह) के उपयोग की अनुमति नेपाल को दी. बदले में नेपाल ने बिम्सटेक देशों द्वारा 10 सितंबर को पुणे में होनेवाले संयुक्त सैन्य अभ्यास से अपने को अलग कर लिया. बिम्सटेक भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, थाइलैंड एवं श्रीलंका का एक संगठन है, जो आर्थिक एवं तकनीकी क्षेत्र में आपसी सहयोग को बढ़ावा देता है. इन देशों के सेनाध्यक्षों ने यह कार्यक्रम तय किया था. अंतिम समय में चीन के दबाव में नेपाल झुक गया.

  • आमजन सिर्फ भीड़ न बने

    पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘मॉब लिंचिंग’ (भीड़-हिंसा) का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए इसे रोकने हेतु सख्त कार्रवाई के निर्देश दिये गये हैं. न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि केंद्र सरकार को इसके लिए अलग से कानून बनाना चाहिए और राज्य सरकारों को भी इसे नियंत्रित करने के उपाय करने चाहिए, क्योंकि विधि-व्यवस्था की मौलिक जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है. भीड़-हिंसा धीरे-धीरे खतरनाक रूप ले चुकी है और समय रहते इसे नहीं रोका गया, तो यह और भी वीभत्स रूप ले सकती है.