अजीत रानाडे

  • केंद्रीय बजट में क्या न करें

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आगामी पांच जुलाई को केंद्र का अपना पहला बजट संसद में पेश करनेवाली हैं. सीतारमण ने, नागरिकों को यह आश्वासन देते हुए कि उनके प्रत्येक सुझाव पर गौर किया जायेगा, बजट के लिए अपने सुझाव देने का आह्वान भी किया है.

  • व्यापार युद्ध के व्यापक नतीजे

    बीते 19 मई को जब एग्जिट पोल ने एनडीए की भारी विजय की भविष्यवाणी की, तो मुंबई के शेयर बाजार ने अपने पिछले रिकॉर्ड तोड़ते हुए लंबी छलांग लगा कर उसे अपनी सलामी दी, मगर पूरे एशिया प्रशांत क्षेत्र में हांगकांग से लेकर शंघाई, सिंगापुर, सोल और सिडनी तक ये बाजार गिरे हुए थे. मध्य अप्रैल से इस क्षेत्र के शेयरों ने मिल कर अपनी कीमतों में 2.6 लाख करोड़ डॉलर का नुकसान उठाया, जो भारत की राष्ट्रीय आय के बराबर है.

  • नयी सरकार की आर्थिक चुनौतियां

    केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामले विभाग द्वारा जारी नवीनतम मासिक आर्थिक रिपोर्ट में कुछ चिंताजनक प्रवृत्तियां नजर आती हैं. पिछले पांच वर्षों के दौरान आर्थिक वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत से घटकर क्रमशः 7.2 एवं 7.0 प्रतिशत तक आ चुकी है. नवीनतम त्रैमासिक वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत है. इस तरह, यह घटती वृद्धि दर लगातार चौथे वर्ष भी जारी है. अब हम सबसे तेज गति से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था का खिताब भी बरकरार नहीं रख सकेंगे, क्योंकि चीन की आर्थिक वृद्धि दर हमसे थोड़ी ज्यादा हो सकती है.

  • कम होती खाद्य मुद्रास्फीति की चुनौती

    मार्च के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार मुद्रास्फीति की दर 2.6 प्रतिशत है. मार्च में समाप्त पिछले वित्तीय वर्ष के लिए औसत मुद्रास्फीति दर भी लगभग 3.5 प्रतिशत ही है.

  • जरूरी है राजकोषीय मितव्ययिता

    विश्व के सबसे बड़े आम चुनावों की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है. लगभग 90 करोड़ मतदाता तकरीबन 10 लाख मतदान केंद्रों पर मतदान कर लगभग 10 हजार उम्मीदवारों के बीच से संसद के निचले सदन के लिए 545 सदस्यों को चुनेंगे. इस पूरी प्रक्रिया में 11 सप्ताह का समय लगेगा, जिस दौरान लगभग छह सौ सियासी पार्टियों एवं चुनाव में खड़े उम्मीदवारों पर आदर्श आचार संहिता लागू रहेगी.

  • स्वच्छ चुनाव के विभिन्न आयाम

    हाल में सुप्रीम कोर्ट ने वह याचिका खारिज कर दी, जिसमें ‘अपराधी’ उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गयी थी. याचिकाकर्ता का तात्पर्य ऐसे उम्मीदवारों से था, जिन पर हत्या, हत्या की कोशिश, भयादोहन, बलात्कार, अपहरण या गबन के अभियोग लगे हैं, पर अभी उन्हें उक्त अपराध में दोषसिद्ध करार न दिया गया हो.

  • मित्रों पर निर्भर पाक-अर्थव्यवस्था

    पुलवामा के आतंकी हमले की विभीषिका रोंगटे खड़े करनेवाली है. इसकी जिम्मेदारी जैश-ए-मुहम्मद ने ली है, जो पाकिस्तान से संचालित होता है. इस हमले के लिए उन्नत योजना, आपूर्ति व्यवस्था, हथियारों और विस्फोटक की प्राप्ति, धन प्रवाह तथा सटीक सूचना की आवश्यकता थी, जो संस्थागत और सुव्यवस्थित समर्थन ढांचे के अभाव में असंभव था.

  • जल एक ज्वलंत मुद्दा बने

    अगले आम चुनाव हमसे अब भी तीन महीने दूर हैं. चुनाव विशेषज्ञ बताते हैं कि आम चुनाव का मुद्दा हमेशा ही अर्थव्यवस्था से संबद्ध हुआ करता है. हाल के केंद्रीय बजट ने किसानों एवं निम्नतर आयकर दाताओं को उदार राहत मुहैया की है, पर केवल वक्त ही यह बता सकेगा कि यह कदम सत्तासीन पार्टी को कोई लाभ पहुंचा सकेगा अथवा नहीं.

  • इस विचार को साकार कीजिए

    अंत्योदय यानी अंतिम का उदय उन प्रमुख सिद्धांतों में एक है, जिन्होंने हमारे संविधान को जीवंत बनाया है. महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत के नेताओं से कहा था कि जब आप किसी नीति का निर्माण करते हैं, तो आपको यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि वह किस तरह समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति का भला करेगी. यह उपयोगितावाद के उस सिद्धांत के विपरीत है, जो सर्वाधिक व्यक्तियों की सर्वाधिक भलाई की पैरोकारी करता है.

  • वैश्विक मंदी के संकेत देता अमेरिका

    वर्ष 2018 का आगाज आर्थिक वृद्धि के लिए एक बड़े आशावाद के साथ हुआ. साल 2017 के समापन ने भी साल की वास्तविक वृद्धि को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्वानुमानों से आगे पहुंचा दिया था, जबकि इसके पहले के छह वर्षों के दौरान प्रत्येक वर्ष की शुरुआत में उसके द्वारा घोषित वार्षिक पूर्वानुमानों को लगातार नीचे लाने की जरूरत पड़ती रही, क्योंकि वास्तविक वृद्धि उन पर कभी खरी नहीं उतर सकी. साल 2017 ने इस मामले में उन सबको मात देते हुए आश्चर्यजनक रूप से मजबूती दिखायी.

  • याद आते हैं शरद जोशी

    इस वक्त जब देश के कई हिस्सों में कृषि संकट के दीदार हो रहे हैं और लाखों किसान देश की राजधानी की ओर अग्रसर हैं, यह उचित ही है कि सुप्रसिद्ध किसान नेता स्व. शरद जोशी के संदेश तथा किसानों की आर्थिक आजादी के लिए उनकी भावपूर्ण पैरोकारी की स्मृति ताजा हो जाये. 12 दिसंबर को ‘शेतकरी संगठन’ के इस अनोखे विजनयुक्त संस्थापक की तीसरी पुण्यतिथि भी है, जिसने जोर देकर कहा कि कृषि संकट कुदरत की अनियमितता अथवा बाजारों की चाल से कहीं अधिक हमारी गलत नीतियों का नतीजा है.

  • कृषि को उबारना ही होगा

    अक्तूबर माह के लिए मुद्रास्फीति की दर 3.1 प्रतिशत प्रतिवेदित की गयी, जो पिछले एक वर्ष के दौरान न्यूनतम थी. यह एक बड़ी राहत थी, क्योंकि एक माह पहले ही ऐसी आशंकाएं थीं कि ईरान पर लगाये जानेवाले अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरेल तक पहुंच जायेंगी. पर अगले चार सप्ताहों के दौरान तेल की कीमतें लगभग 30 प्रतिशत घटकर वर्तमान में 60 डॉलर प्रति बैरेल से भी कम हो गयीं.

  • अहम है आरबीआइ की आजादी

    भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की स्थापना भारत की आजादी से भी बारह वर्षों पूर्व हुई थी. अपने आठ दशकों के जीवन काल में इसने उच्चतम वैश्विक मानकों के अनुरूप कार्यप्रणाली से एक विशिष्ट मुकाम हासिल किया है. आज यह वैसे कुछेक राष्ट्रीय संस्थानों में एक है, जिन्हें उनकी आदर्श निष्ठा तथा भ्रष्टाचारविहीनता के लिए जाना जाता है. यह दूसरी बात है कि इसके हिस्से भी कुछ बुरे नतीजे और नीतिगत गलतियां (जिन्हें बाद में ही महसूस किया जा सका) आयी हैं. पर कुल मिलाकर इसकी प्रतिष्ठा एक ठोस धरातल पर टिकी है, जिसे कठोर फैसलों के बल पर एक लंबे कठिन अरसे में निर्मित किया जा सका है.

  • दुरुस्त करें अपनी प्राथमिकताएं

    भारत के आर्थिक विकास की गति इस वर्ष भी चीन से आगे निकल विश्व में अव्वल आनेवाली है. मुद्रास्फीति को समायोजित करके भी हमारे जीडीपी की वास्तविक वृद्धि दर 7 प्रतिशत से ऊपर रहनेवाली है, जबकि इस पैमाने पर चीन 6.5 प्रतिशत से भी नीचे खिसक सकता है. आर्थिक विकास देश के नागरिकों के जीवन स्तर में वृद्धि का कारक होता है और यह वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य के अलावा बुनियादी ढांचे एवं यहां तक कि सुरक्षा तथा प्रदूषण नियंत्रण जैसी सामाजिक बुराइयों पर होनेवाले खर्च की भी माप करता है.

  • जरूरी है स्वच्छ राजनीति भी

    चुनाव लड़ने का अधिकार न तो दैवीय है और न ही मानवीय. यह भारतीय संविधान के अंतर्गत कोई मौलिक अधिकार भी नहीं है. यही वजह है कि चुनावों के द्वारा जन-प्रतिनिधि बनने हेतु कुछ प्रतिबंध लगे हैं, जैसे लोकसभा की उम्मीदवारी के लिए न्यूनतम 25 वर्ष एवं राज्यसभा के लिए 35 वर्ष की उम्र आवश्यक है. इसी तरह, यदि कोई किसी ऐसे अपराध में दोषसिद्ध हो चुका है, जिसमें न्यूनतम दो वर्षों के कारावास की सजा मिल सकती हो, तो वह उम्मीदवार नहीं बन सकता. लेकिन, न्याय की प्रक्रिया कच्छप गति से आगे बढ़ती है और दोषसिद्धि में संसद के एक कार्यकाल से भी ज्यादा वक्त लग सकता है.

  • स्थिति से जूझने की जरूरत

    इस सप्ताह दो मुख्य कीमतें खबरों की सुर्खियां बनीं. एक तो सर्वशक्तिमान डॉलर की कीमत, जबकि दूसरी पेट्रोल एवं डीजल की. ये दोनों चीजें हमारी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अहम मूल्य-संकेतक बन गयी हैं. भारत में इन ईंधन तेलों का भारी टोटा है, क्योंकि हमारा घरेलू उत्पादन हमारी जरूरत के पंचमांश को ही पूरा कर पाता है.

  • असली चुनौती अभी कायम है

    त्रैमासिक राष्ट्रीय आय पर 31 अगस्त को जारी आधिकारिक आंकड़े में बताया गया कि अप्रैल से जून की तिमाही के दौरान देश के जीडीपी की वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रही. यह वृद्धि 7.5 अथवा 7.6 प्रतिशत की उम्मीद से ही नहीं, बल्कि 8 प्रतिशत के एक मनोवैज्ञानिक स्तर से भी स्पष्टतः अधिक थी, जो पिछली नौ तिमाहियों में सर्वाधिक होने की वजह से आर्थिक मोर्चे पर एक खुशखबरी है.

  • सत्तर के स्तर पर रुपये का अर्थ

    अब अमेरिकी डॉलर एवं भारतीय रुपये के बीच विनिमय दर 70 को पार कर गयी, तो अखबारों की सुर्खियों ने ‘रुपये में रिकॉर्ड गिरावट’ का शोर मचा दिया. ऐसी सुर्खियों में प्रायः एक सनसनीखेज नाटकीयता होती है, जो सियासी पार्टियों की लफ्फाजी से प्रेरित होती हैं. इनका निहितार्थ यह होता है कि जब डॉलर के मुकाबले रुपया ‘कमजोर’’ होता है, तो मानो यह राष्ट्रीय अस्मिता तथा आर्थिक शक्ति पर आघात होता है. हमारे राष्ट्रीय प्रतीक रूपी मुद्रा तथा इसकी अंतरराष्ट्रीय कीमत को कैसे कमजोर होने दिया जा सकता है?

  • कई अभाव पूरे करने होंगे

    बीसवीं सदी के मध्य में उपनिवेशवाद से मुक्त हुए ज्यादातर नव-स्वतंत्र देशों की तरह भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप भी एक स्थायी अभाव से युक्त था.

  • आर्थिक प्रबंधन की मुश्किलें

    हाल ही में विश्व के दो अहम निकायों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर अपनी चेतावनियां जारी की हैं. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने इस वर्ष के साथ ही अगले वर्ष के लिए भी भारत की विकास दर को लेकर अपने अनुमान नीचे किये हैं, जिनमें 2018 के लिए अनुमान तो बस 7.4 प्रतिशत से घटकर 7.3 प्रतिशत तक ही गिरे हैं, पर अगले वर्ष के लिए उसने इसे 7.8 प्रतिशत से कमकर 7.5 प्रतिशत पर पहुंचा दिया है. सवाल इन अनुमानों के सही होने या न होने का नहीं है, बल्कि इन गिरावट की वजहों का है.