नवीन जोशी

  • न हो आचार संहिता का उल्लंघन

    आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने के कारण चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती, केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और पूर्व मंत्री आजम खान को दो से तीन दिन तक चुनाव प्रचार करने से रोक दिया. आयोग ने यह ‘सख्त’ कार्रवाई इसलिए की, क्यांेकि ये नेता चुनाव प्रचार में सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने और अभद्र टिप्पणियों के दोषी पाये गये. दरअसल, इस कार्रवाई से पहले सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा था कि धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगकर आचार संहिता का उल्लंघन करनेवालों पर क्या कार्रवाई की जा रही है.

  • चुनाव में भावनाओं के अस्त्र-शस्त्र

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास अपनी पांच साल की उपलब्धियां गिनाने के लिए कम नहीं होनी चाहिए. अक्सर वे दावा भी करते रहे हैं कि उनकी सरकार ने देश के आम जन के लिए पहली बार क्या-क्या किया है. ‘साठ साल के कांग्रेसी राज’ की तमाम गड़बड़ियां गिनाते हुए वे उसे दुरुस्त करने की बात करते रहे हैं. अभी कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि पांंच साल गड्ढे भरने में लग गये, अब गाड़ी सरपट दौड़ानी है.

  • अब भी द्वंद्व में है कांग्रेस

    इसी मंगलवार को अहमदाबाद में कांग्रेस कार्यसमिति ने लोकसभा चुनाव के लिए जो रणनीति तय की, उसका मुख्य ध्येय है- ‘आरएसएस-भाजपा की फासीवादी, नफरत व गुस्से से भरी और विभेदकारी विचारधारा को परास्त करना.’ उद्देश्य बड़ा, बेहद चुनौतीपूर्ण और कांग्रेस की मूल नीतियों को समाहित करनेवाला है. सवाल है कि यह उद्देश्य कैसे पूरा होगा? इसके लिए कांग्रेस ने कौन सा रास्ता या तरीका चुना है? क्या इस बारे में भी वह स्पष्ट है?

  • चुनावी तरकश के तीर तैयार

    साल 2019 के चुनावी संग्राम का मैदान सज रहा है. कुछ सेनाएं काफी पहले से तैयार हैं, कुछ अंतिम तैयारियों की हड़बड़ी में हैं और कुछ अब भी ठीक से तय नहीं कर सकी हैं कि किस शिविर का रुख करना है. जो संग्राम के अंतिम दिन तक अदले-बदले और पैने किये जाते रहेंगे, वह हैं इस युद्ध में इस्तेमाल होनेवाले हथियार. जनता को प्रभावित करने, एक-दूसरे के व्यूह को भेदने और रणनीतियां विफल करने में इन जुबानी तीरों की बड़ी भूमिका होती है.

  • बिना गठबंधन की एकता

    बीती 19 जनवरी को ही वे सब कोलकाता में एक मंच पर इकट्ठा हुए थे. ममता बनर्जी की बुलायी रैली के मंच से उन सबने मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए को केंद्र की सत्ता से उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था.

  • क्षेत्रीय दलों के छुपे पत्ते

    न तो साल 2014 के आम चुनाव जैसी परिवर्तन की आकांक्षा जोर मार रही है, न ही सत्ता-विरोधी लहर दिख रही है. साल 2019 का लोकसभा चुनाव कई तरह की संभावनाएं ला सकता है. यदि भाजपा-नीत गठबंधन बहुमत पाता है या भाजपा और कांग्रेस में कोई दल सत्ता के करीब पहुंचता है, तो स्थितियां असामान्य नहीं कही जायेंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो?

  • उत्तर प्रदेश से निकलते संकेत

    बहुजन समाज पार्टी की नेत्री मायावती कभी किसी गैर पार्टी के नेता के समर्थन में खुल कर सामने नहीं आतीं. मुद्दा आधारित समर्थन भले उन्होंने किसी को दिया हो, लेकिन किसी नेता के बचाव में उनका खड़ा होना दुर्लभ है. चंद रोज पहले उन्होंने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को व्यक्तिगत रूप से फोन करके अपना समर्थन व्यक्त किया.

  • जातीय अस्मिता और मुक्ति की चाह

    रामविलास पासवान ने एनडीए से गठबंधन में शामिल रहने की मनमाफिक कीमत वसूल ली. उन्हें खुश करने के लिए भाजपा को अपने हिस्से में कटौती करनी पड़ी. उससे पहले उपेंद्र कुशवाहा सौदा नहीं पटने पर गठबंधन छोड़कर विपक्षी यूपीए में शामिल हो गये. इससे पहले उन्होंने सौदेबाजी की पूरी कोशिश की. जब वे इस काम में असफल हो गये, तब जाकर अलग हुए.

  • समर्थन व विरोध का क्षेत्रीय द्वंद्व

    मध्य प्रदेश और राजस्थान में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को अपनी पार्टी के समर्थन की घोषणा से पहले बसपा अध्यक्ष मायावती ने उसकी खूब लानत-मलामत की. कहा कि इस देश के दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की दुर्दशा के लिए कांग्रेस की सरकारें जिम्मेदार हैं. एक साथ समर्थन और विरोध का यह द्वंद्व राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के रिश्ते का अनिवार्य पहलू है. बसपा की तरह कई क्षेत्रीय दल कांग्रेस-विरोध के कारण जन्मे, लेकिन आज भाजपा को अपने लिए बड़ा खतरा जानकर वे कांग्रेस का साथ समर्थन लेने-देने को सशंक तैयार हो रहे हैं.

  • ताकि महागठबंधन न बने

    पिछले सप्ताह निजामाबाद (तेलंगाना) की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चौंकानेवाला एक वक्तव्य दिया. उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश या मायावती से कोई दिक्कत नहीं है.

  • विपक्षी एकता के नाविक नायडू

    हमारे देश में राजनीतिक दलों का पलटी मारना कोई नयी बात नहीं है. मुलायम सिंह यादव से लेकर नीतीश कुमार तक और ममता बनर्जी से लेकर जयललिता तक कई बार आश्चर्यजनक रूप से पैंतरे बदलते रहे हैं.

  • राजनीतिक इतिहास का दोहराव!

    सामान्य चुनावी रणनीति यह कहती है कि यदि प्रतिद्वंद्वी लोकप्रिय है, तो सीधा हमला करने की बजाय उसे इधर-उधर से घेरा जाये, ताकि आपके तीर उसकी लोकप्रियता के कवच से टकराकर आपकी ओर न मुड़ आयें. सत्ता-विरोधी रुझानों के बावजूद लोकप्रियता के पैमाने पर प्रधानमंत्री आज भी आगे हैं. जनता के बड़े वर्ग में मोदी से अब भी काफी उम्मीदें हैं. कम-से-कम उन्हें भ्रष्ट मानने को कोई तैयार नहीं है. तब क्या कारण है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सीधे नरेंद्र मोदी पर लगातार भ्रष्टाचार और पक्षपात के आरोप लगा रहे हैं?

  • महागठबंधन की बाधाएं

    आम चुनाव नजदीक आ रहे हैं, लेकिन भाजपा के खिलाफ विपक्ष के महागठबंधन की कोई शक्ल नहीं बन पा रही. बल्कि, विपक्ष की एकता की संभावनाओं पर सवालिया निशान लगते जा रहे हैं. कोशिशें हो रही हैं, लेकिन पक्का नहीं है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का गठबंधन बन ही जायेगा.

  • पार्टियों का बदलता मूल चरित्र

    रोचक है यह दृश्य या इसे राजनीतिक प्रहसन कहा जाए? साल 2019 का आम चुनाव आते-आते ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘आइडिया ऑफ इंडिया की रखवाली’ कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ‘शिव-भक्त’ हो गये हैं. उधर कट्टर हिंदुत्ववादी, उग्र राष्ट्रवाद की पोषक भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री मस्जिद में जा रहे हैं. ‘मुसलमानों को देश का शत्रु’ माननेवाली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत कहने लगे हैं कि ‘मुसलमान इस देश में अवांछित हुए तो हिंदुत्व ही नहीं रह जायेगा.’

  • इस बार मंडल के साथ कमंडल

    लगभग तीन दशक बाद ‘मंडल-राजनीति’ का नया दौर शुरू हुआ है. रोचक बात यह है कि इस बार वही भाजपा इसकी जोरदार पहल कर रही है, जिसकी ‘कमंडल-राजनीति’ की काट के लिए 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों से धूल झाड़कर उसे लागू करने की तुरुप चाल चली थी. साल 2019 के लिए भाजपा मंडल और कमंडल दोनों का एक साथ इस्तेमाल कर रही है.

  • कांग्रेस का कठिन रास्ता

    चुनाव आयोग के इनकार के बाद ‘एक देश, एक चुनाव’ का भाजपा का अभियान फिलहाल निकट भविष्य में फलीभूत होता नहीं दिखता. भाजपा शुरू में यह माहौल तो बना ही रही थी कि 2019 में आम चुनाव के साथ आठ-दस राज्यों के विधानसभा चुनाव भी करा लिये जाएं. चार राज्यों के चुनाव वैसे भी लोकसभा के साथ होने हैं.

  • सिर्फ सुविधा की राजनीति

    हमारे देश में किसी मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दल कैसा रुख अपनायेंगे और क्या पैंतरे दिखायेंगे, यह इस पर निर्भर करता है कि वह मुद्दा किन लोगों से जुड़ा है और वे आसन्न चुनाव को किस तरह प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. बिल्कुल ताजा मामला एससी-एसटी एक्ट का है, जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट के कुछ दिशा-निर्देशों के बाद बीते 20 मार्च से आज तक संसद से सड़क तक हंगामा बरपा है.

  • कांग्रेस की गठबंधन-परीक्षा

    कांग्रेस ने यह मानकर ठीक ही किया कि 2019 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी को वह अकेले दम पर नहीं हरा सकती. इसके लिए विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करना जरूरी है. राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद संभालने के बाद हुई पहली कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक का यह स्वर बहुत महत्वपूर्ण कहा जाना चाहिए. निर्वाचित सांसदों के हिसाब से सबसे बड़ी पार्टी बनने पर गठबंधन के नेता के रूप में राहुल को पेश करना सिर्फ औपचारिकता है.

  • साल 2019 की परीक्षा का पर्चा

    स्वाभाविक है कि भाजपा 2019 में केंद्र की सता में बहुमत से वापसी की कोशिश करे, जैसे कि विरोधी दल उसे बेदखल करने के प्रयत्न में लग रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष काफी समय से चुनावी मोड में हैं.

  • एक साथ चुनाव के प्रश्न

    देश में सभी चुनाव एक साथ कराने की चर्चा अक्सर छिड़ जाती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चार साल के कार्यकाल में इसे एक मुद्दे की तरह बार-बार उठाया. वे लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ कराने की वकालत करते हैं. कुछ समय पहले उनके सुझाव पर केंद्रीय विधि आयोग ने तीन पेज का एक सार-पत्र तैयार किया है.