प्रो योगेंद्र यादव

  • आर्थिक मंदी की तरफ देश!

    क्या देश आर्थिक मंदी की तरफ बढ़ रहा है? इस सवाल को और टाला नहीं जा सकता. जहां एक ओर पूरा देश जम्मू और कश्मीर के सवाल पर उलझा हुआ है, वहीं अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे सरकती जा रही है. पहले जो छोटी समस्या दिखती थी, अब वह एक संकट का रूप लेती जा रही है.

  • राष्ट्रीय मुद्दों से मुंह मोड़ते नेता

    क्या हरियाणा और पंजाब के मसले को हिंदुस्तान और पाकिस्तान के झगड़े की तरह लड़कर निपटाया जायेगा? या कि इस मसले को दोनों प्रदेश और पूरे देश के हित को ध्यान में रखते हुए सुलझाया जायेगा? आज यह सवाल सिर्फ हरियाणा और पंजाब के नागरिकों के सामने ही नहीं पूरे देश के सामने मुंह बाये खड़ा है.

  • बजट से किसानों की उम्मीद

    एक पत्रकार ने सवाल पूछा- ''इस साल के बजट में आप किसानों के लिए क्या नयी घोषणाएं चाहते हैं?'' उस पत्रकार को उम्मीद थी कि मैं अपनी मांगों की एक लंबी लिस्ट उसे दे दूंगा. मैंने उसे निराश करते हुए कहा, ''मुझे एक भी नयी घोषणा नहीं चाहिए. हर बजट में नयी घोषणाओं का क्या फायदा, जब उन पर अमल ही नहीं होता? मैं तो बस इतना चाहता हूं कि निर्मला सीतारमण जी इस साल फरवरी के अंतरिम बजट में पीयूष गोयल जी की सभी घोषणाओं को पूरा कर दें. पिछले कृषि मंत्री राधामोहन सिंह द्वारा किसानों को किये गये वादों के लिए बजट में पैसा दे दें. बस.''

  • एक राष्ट्र-एक चुनाव की अवधारणा

    सुनने में ''एक राष्ट्र एक चुनाव'' बड़ा सुंदर लगता है, लेकिन क्या इसके पीछे का प्रस्ताव भी उतना ही सुंदर है? क्या देशभर में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव पांच साल में एक बार एक साथ करवाने का प्रस्ताव हमारे लोकतंत्र के लिए एक अच्छा कदम है? पहली नजर में बड़ा सीधा प्रस्ताव है.

  • भारतीय भाषाओं पर नासमझी

    एक बार फिर नादान बिल्लियों की लड़ाई में बंदर रोटी ले उड़ा. एक बार फिर भारतीय भाषाओं के नासमझ झगड़े की आड़ में अंग्रेजी ने अपना वर्चस्व सुनिश्चित कर लिया. एक बार फिर भाषा के सवाल पर गंभीर राष्ट्रीय बहस शुरू होने से पहले ही बंद हो गयी. एक बार फिर महारानी अंग्रेजी जोर से हंसी.

  • यह जीत है विपक्ष के लिए सबक

    ए क असाधारण चुनाव का असाधारण नतीजा हमारे सामने है. यह परिणाम असाधारण सिर्फ इसलिए नहीं है कि बीजेपी के जीत के फासले ने सभी को हैरान कर दिया है. सिर्फ इसलिए नहीं की पहली बार कोई गैर कांग्रेस सरकार दोबारा पूर्ण बहुमत से चुनकर आयी है, बल्कि इसलिए भी कि इस चुनाव के परिणाम हमारे लोकतंत्र के दूरगामी भविष्य को तय करेंगे.

  • घोषणापत्रों के वादे और इरादे

    पिछले हफ्ते भाजपा और कांग्रेस के मेनिफेस्टो जारी हुए. अगर मेनिफेस्टो से चुनाव जीते जाते तो कांग्रेस यह चुनाव जीत जाती. अगर इस देश के वोटर पार्टियों के घोषणापत्र को पढ़कर नंबर देते, तो भाजपा जरूर परीक्षा में फेल हो जाती.

  • मुड़ गयी चुनाव-चर्चा की दिशा!

    लगता है गलती से ही सही, तीर निशाने पर जा लगा है. जब से राहुल गांधी ने गरीबों को ₹छह हजार महीने देने की चुनावी घोषणा की है, तब से दोनों चुनावी कैंप में खलबली मची है. कांग्रेस को समझ नहीं आ रहा कि उसने क्या घोषणा की है! भाजपा को समझ नहीं आ रहा कि इस घोषणा का जवाब कैसे दे!

  • क्या हों आम चुनाव के मुद्दे

    पुलवामा हमले के अगले ही दिन मैंने राष्ट्रीय सहमति का एक प्रस्ताव रखा था. सोच यह थी कि आतंकी और उसके सरगना हमें एक-दूसरे से लड़ने-भिड़ने और भारतीय राजनीति को पटरी से उतारने के अपने मंसूबे में कामयाब ना हों. संकट के समय राष्ट्रीय एकता ही आतंकियों को सबसे करारा जवाब है.

  • मुद्दा क्यों नहीं नशामुक्ति का सवाल?

    अगर औरतों को इस देश में एक दिन के लिए राजपाट मिल जाये, तो वे क्या फैसला करेंगी? आप जब, जहां चाहे औरतों के समूह से यह सवाल पूछ लें, आपको एक ही जवाब मिलेगा. लेकिन, हमारे लोकतंत्र में यह मुद्दा राष्ट्रीय चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं बनता?

  • जॉब चाहिए, जुमला नहीं

    देरी से ही सही, जाते-जाते मोदी जी एक सर्जिकल स्ट्राइक कर गये.'' एक बेरोजगार युवक संसद में सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के संविधान संशोधन की खबर पढ़ रहा था. मुझसे रहा नहीं गया- ''भाई यह सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, यह तो खाली कारतूस चलाया है. सिर्फ देरी से नहीं, गलत निशाने पर चलाया है. सबको पता है कि लागू नहीं हो सकता. और लागू हो गया तो एक भी गरीब सवर्ण को इससे नौकरी मिलनेवाली नहीं है.''

  • राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर किसान

    बहुत समय बाद राष्ट्रीय किसान मंच पर बैठा है. बहुत साल बाद अखबारों और टीवी की सुर्खियों में किसान दिखने लगा है. सब देख रहे हैं, मानो गांव के मेले में भालू आ गया हो. कोई उसे छेड़ रहा है, कोई उसे टोपी पहना रहा है.

  • भाजपा हारी है, कांग्रेस अभी जीती नहीं है

    अहंकार और आलस्य दोनों हारे. जनता ने सत्ता धारियों को हराया और विपक्ष को डराया. कांग्रेस जीती नहीं है. चुनाव की अश्लील चकाचौंध में गांव देहात में अपना खुरदरा चेहरा दिखाया. लोकतंत्र में तंत्र के शिकार लोक ने विरोध तो जताया लेकिन विकल्प नहीं पाया.

  • भाजपा हारी है, कांग्रेस अभी जीती नहीं है

    अहंकार और आलस्य दोनों हारे. जनता ने सत्ता धारियों को हराया और विपक्ष को डराया. कांग्रेस जीती नहीं है. चुनाव की अश्लील चकाचौंध में गांव देहात में अपना खुरदरा चेहरा दिखाया. लोकतंत्र में तंत्र के शिकार लोक ने विरोध तो जताया लेकिन विकल्प नहीं पाया.

  • किसानों के प्रति उदासीनता

    बीसवीं सदी के किसान नेता दीनबंधु चौधरी छोटू राम ने किसान को कहा था: ''ए भोले किसान, मेरी दो बात मान लें- एक बोलना सीख और एक दुश्मन को पहचान ले''.

  • आम चुनाव की प्रीबोर्ड परीक्षा

    इधर स्कूलों में प्रीबोर्ड परीक्षा की तैयारी चल रही है. उधर मोदी सरकार भी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में अपनी प्रीबोर्ड परीक्षा दे रही है. जब आगामी 11 दिसंबर को इसका परिणाम आयेगा, तो हमें लोकसभा चुनाव 2019 की एक झांकी जरूर दिख जायेगी. अब तक जो झलक मिली है, उससे बीजेपी का विचलित होना स्वाभाविक है.

  • अग्नि-परीक्षा के चुनावी आधार

    कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा. मोदीजी ने तो छोटा-सा तिनका नहीं, बल्कि 182 मीटर की प्रतिमा बनवायी है. लेकिन, लगता है कि मोदी सरकार के लिए यह सहारा भी नाकाफी साबित होगा. अब तो राम मंदिर का ही आसरा है! पिछले सालभर में मोदी सरकार की साख अप्रत्याशित रूप से गिरी है.

  • नयी नीति और किसानों के सवाल

    बच्चा अभी हुआ नहीं, लेकिन लड्डू तीन बार खा लिये. किसानों को फसल का सही भाव देने के बारे में मोदी सरकार ने यही किया है. अभी तक एक भी किसान को बढ़ा हुआ रेट मिला नहीं है. लगता नहीं है कि ज्यादातर किसानों को मिलेगा, लेकिन तालियां तीन बार पिट गयीं, बधाई के पोस्टर होर्डिंग लग गये, लड्डू खा लिये. पहली बार लड्डू एक फरवरी को खाये, जब अरुण जेटली ने सरकार के इस ‘ऐतिहासिक’ फैसले की घोषणा की. लड्डू की मिठास में यह कड़वा सच छुप गया कि वित्त मंत्री ने लागत की परिभाषा ही बदल दी थी और अपने मूल वायदे से मुकर गये थे.

  • तेल के बढ़ते दाम और अर्थनीति

    क्या पेट्रोल और डीजल के दाम में बेतहाशा बढ़ोत्तरी के लिए मोदी सरकार और बीजेपी को जिम्मेदार ठहराना उचित है? जब विपक्षी दल मोदी सरकार की आलोचना करते हैं, तो समझ नहीं आता कि उनके तर्क में दम है या यह सिर्फ उनकी आदत है. उधर सरकार कहती है कि हमें अधिकांश कच्चा तेल विदेश से आयात करना पड़ता है. पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं, तो हमारे देश में भी बढ़ेंगे. सरकार का इसमें क्या कसूर? यूं भी सरकार ने अब पेट्रोल और डीजल के दाम तय करने बंद कर दिये हैं. इसके लिए सरकार को दोष देना तो बेतुकी बात है.

  • पीएम की बातें और देश के सवाल

    क्या लाल किले और चांदनी चौक में फासला बढ़ रहा है? पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण सुनते वक्त यह सवाल मेरे जहन में कौंध रहा था. टीवी पर विपक्षी नेता और कई एंकर शिकायत कर रहे थे कि प्रधानमंत्री का भाषण बहुत राजनीतिक है.