प्रो योगेंद्र यादव

  • मुद्दा क्यों नहीं नशामुक्ति का सवाल?

    अगर औरतों को इस देश में एक दिन के लिए राजपाट मिल जाये, तो वे क्या फैसला करेंगी? आप जब, जहां चाहे औरतों के समूह से यह सवाल पूछ लें, आपको एक ही जवाब मिलेगा. लेकिन, हमारे लोकतंत्र में यह मुद्दा राष्ट्रीय चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं बनता?

  • जॉब चाहिए, जुमला नहीं

    देरी से ही सही, जाते-जाते मोदी जी एक सर्जिकल स्ट्राइक कर गये.'' एक बेरोजगार युवक संसद में सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के संविधान संशोधन की खबर पढ़ रहा था. मुझसे रहा नहीं गया- ''भाई यह सर्जिकल स्ट्राइक नहीं, यह तो खाली कारतूस चलाया है. सिर्फ देरी से नहीं, गलत निशाने पर चलाया है. सबको पता है कि लागू नहीं हो सकता. और लागू हो गया तो एक भी गरीब सवर्ण को इससे नौकरी मिलनेवाली नहीं है.''

  • राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर किसान

    बहुत समय बाद राष्ट्रीय किसान मंच पर बैठा है. बहुत साल बाद अखबारों और टीवी की सुर्खियों में किसान दिखने लगा है. सब देख रहे हैं, मानो गांव के मेले में भालू आ गया हो. कोई उसे छेड़ रहा है, कोई उसे टोपी पहना रहा है.

  • भाजपा हारी है, कांग्रेस अभी जीती नहीं है

    अहंकार और आलस्य दोनों हारे. जनता ने सत्ता धारियों को हराया और विपक्ष को डराया. कांग्रेस जीती नहीं है. चुनाव की अश्लील चकाचौंध में गांव देहात में अपना खुरदरा चेहरा दिखाया. लोकतंत्र में तंत्र के शिकार लोक ने विरोध तो जताया लेकिन विकल्प नहीं पाया.

  • भाजपा हारी है, कांग्रेस अभी जीती नहीं है

    अहंकार और आलस्य दोनों हारे. जनता ने सत्ता धारियों को हराया और विपक्ष को डराया. कांग्रेस जीती नहीं है. चुनाव की अश्लील चकाचौंध में गांव देहात में अपना खुरदरा चेहरा दिखाया. लोकतंत्र में तंत्र के शिकार लोक ने विरोध तो जताया लेकिन विकल्प नहीं पाया.

  • किसानों के प्रति उदासीनता

    बीसवीं सदी के किसान नेता दीनबंधु चौधरी छोटू राम ने किसान को कहा था: ''ए भोले किसान, मेरी दो बात मान लें- एक बोलना सीख और एक दुश्मन को पहचान ले''.

  • आम चुनाव की प्रीबोर्ड परीक्षा

    इधर स्कूलों में प्रीबोर्ड परीक्षा की तैयारी चल रही है. उधर मोदी सरकार भी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में अपनी प्रीबोर्ड परीक्षा दे रही है. जब आगामी 11 दिसंबर को इसका परिणाम आयेगा, तो हमें लोकसभा चुनाव 2019 की एक झांकी जरूर दिख जायेगी. अब तक जो झलक मिली है, उससे बीजेपी का विचलित होना स्वाभाविक है.

  • अग्नि-परीक्षा के चुनावी आधार

    कहते हैं डूबते को तिनके का सहारा. मोदीजी ने तो छोटा-सा तिनका नहीं, बल्कि 182 मीटर की प्रतिमा बनवायी है. लेकिन, लगता है कि मोदी सरकार के लिए यह सहारा भी नाकाफी साबित होगा. अब तो राम मंदिर का ही आसरा है! पिछले सालभर में मोदी सरकार की साख अप्रत्याशित रूप से गिरी है.

  • नयी नीति और किसानों के सवाल

    बच्चा अभी हुआ नहीं, लेकिन लड्डू तीन बार खा लिये. किसानों को फसल का सही भाव देने के बारे में मोदी सरकार ने यही किया है. अभी तक एक भी किसान को बढ़ा हुआ रेट मिला नहीं है. लगता नहीं है कि ज्यादातर किसानों को मिलेगा, लेकिन तालियां तीन बार पिट गयीं, बधाई के पोस्टर होर्डिंग लग गये, लड्डू खा लिये. पहली बार लड्डू एक फरवरी को खाये, जब अरुण जेटली ने सरकार के इस ‘ऐतिहासिक’ फैसले की घोषणा की. लड्डू की मिठास में यह कड़वा सच छुप गया कि वित्त मंत्री ने लागत की परिभाषा ही बदल दी थी और अपने मूल वायदे से मुकर गये थे.

  • तेल के बढ़ते दाम और अर्थनीति

    क्या पेट्रोल और डीजल के दाम में बेतहाशा बढ़ोत्तरी के लिए मोदी सरकार और बीजेपी को जिम्मेदार ठहराना उचित है? जब विपक्षी दल मोदी सरकार की आलोचना करते हैं, तो समझ नहीं आता कि उनके तर्क में दम है या यह सिर्फ उनकी आदत है. उधर सरकार कहती है कि हमें अधिकांश कच्चा तेल विदेश से आयात करना पड़ता है. पिछले कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे हैं, तो हमारे देश में भी बढ़ेंगे. सरकार का इसमें क्या कसूर? यूं भी सरकार ने अब पेट्रोल और डीजल के दाम तय करने बंद कर दिये हैं. इसके लिए सरकार को दोष देना तो बेतुकी बात है.

  • पीएम की बातें और देश के सवाल

    क्या लाल किले और चांदनी चौक में फासला बढ़ रहा है? पंद्रह अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण सुनते वक्त यह सवाल मेरे जहन में कौंध रहा था. टीवी पर विपक्षी नेता और कई एंकर शिकायत कर रहे थे कि प्रधानमंत्री का भाषण बहुत राजनीतिक है.

  • करुणानिधि का सामाजिक न्याय

    देश के अधिकांश इलाकों में एम करुणानिधि का गुजरना कोई बड़ी खबर नहीं है. उनके निधन और अंत्येष्टि की खबर जरूर देशभर के अखबारों के मुखपृष्ठ पर छपी है. सबने बताया है कि वे पांच बार मुख्यमंत्री रहे, तेरह बार विधायक. लेकिन पता नहीं तमिलनाडु के बाहर कितने पाठक इस खबर को पढ़ेंगे, कितने लोग इसका महत्व समझेंगे. उनके लिए जैसी जयललिता वैसे ही करुणानिधि. किसी दूर देश के अनजाने, अबूझे नायक, नायिका.

  • सरकार संसद में पहले भी सुरक्षित थी

    लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो गया. सरकार संसद में पहले भी सुरक्षित थी, अब और भी आश्वस्त हो गयी. विपक्ष भी सरकार पर कुछ छींटाकशी कर खुश हो गया. गले से कहने में जो कसर रह गयी, वह गले लगकर पूरी की गयी. सत्ताधारी मोर्चे में कुछ टूट-फूट होने से विपक्ष भी आश्वस्त है.

  • किसानों का अविश्वास मत पास

    इधर लोकसभा में मोदी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर बहस होगी. उधर अखिल भारतीय किसान संघ समिति के बैनर तले 201 किसान संगठनों के प्रतिनिधि संसद के बाहर प्रदर्शन कर इस सरकार में अविश्वास जतायेंगे.

  • पाठ्यपुस्तक में इमरजेंसी अध्याय

    इमरजेंसी पर केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के बयान ने मुझे एक भूले-बिसरे किस्से की याद दिला दी. जब भी इस किस्से को याद करता हूं तो विस्मय होता है, गर्व भी होता है.

  • किसानों की हालत बदलनी होगी

    आजकल भारतीय जनता पार्टी के नजदीक समझे जानेवाले उद्योगपति मोहनदास पई ने कहा कि देश में सिर्फ 16 प्रतिशत किसान हैं.

  • एंटी इनकंबैंसी का तापमान

    मई और जून के महीने में अक्सर सरकारों को लू लगजाती है. खास तौर पर उन सरकारों को, जो चार साल तक राजधानी के एयर कंडीशन कमरों में बंद रहती हैं. जब मंत्री लोग चुनावी साल में जनता के बीच धूप और धूल फांकते हैं, तो अक्सर वे जनाक्रोश की लू का शिकार हो जाते हैं. इस स्थिति में अच्छे-अच्छे चुनावी डॉक्टर भी मरीज को बचा नहीं पाते हैं. और पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट में मौत का कारण ''एंटी इनकंबैंसी'' लिखा जाता है.

  • मोदी-शी मुलाकात का महत्व

    कुछ सवाल हैं. आखिर चुनावी साल में अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच पीएम मोदी अचानक चीन क्यों गये? वह भी एक अनौपचारिक बातचीत के लिए? वह भी तब, जब कुछ हफ्ते में उन्हें दोबारा चीन जाना ही था? और आखिर मोदीजी ने शी साहब को घोड़े की पेंटिंग क्यों भेंट की?

  • दीर्घकालिक राजनीति की मांग

    एक शे''र है- किसी का नाम न लो, बेनाम अफसाने बहुत से हैं.'' प्रधानमंत्री के लंदन उवाच को सुनकर बरबस यह शे''र याद आ गया. प्रधानमंत्री ने अपना मौन तोड़ा और कुछ कहा भी नहीं. न बच्ची का नाम लिया (वह तो शायद ठीक ही था), न कठुआ और उन्नाव का नाम लिया, न ही यह माना कि इन दोनाें जगह उनकी पार्टी की सरकार है, न ही यह स्वीकारा कि इन कांडों में उनकी अपनी पार्टी के लोगों का नाम है. मानो, कल के मौनी बाबा मनमोहन सिंह के चुप्पी वाले तंज और न्यूयार्क टाइम्स के संपादकीय का जवाब भर दे दिया. तुम कह रहे थे न बोलने को, तो लो सुन लो, कैसे बोलकर भी कुछ नहीं कहा जाता है.

  • उपेक्षा की मार झेल रहा एक जिला

    पिछले सप्ताह से यह सवाल मेरे मन में बार-बार घूम रहा है. पिछले सप्ताह नीति आयोग ने देश के सबसे पिछड़े 101 जिलों की सूची जारी की. इस सूची में सबसे ऊपर यानी देश का सबसे पिछड़ा जिला होने का श्रेय हरियाणा के मेवात जिले को जाता है (आजकल इसका सरकारी नाम जिला मुख्यालय के नाम पर नुहू कर दिया गया है). बिहार के अररिया, छत्तीसगढ़ के सुकमा, उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती और तेलंगाना के असिफाबद जिलों से भी पिछड़ा जिला है मेवात. गौरतलब है कि हरियाणा का कोई और जिला इस 101 की सूची में कहीं नहीं है.