आर राजगोपालन

  • दक्षिण भारत मोदी के असर से अछूता

    द क्षिण भारत में तेलुगु देशम, तेलंगाना राष्ट्र समिति, द्रमुक, अन्ना द्रमुक, जनता दल (सेकुलर), वायएसआर कांग्रेस दक्षिण भारत के प्रमुख क्षेत्रीय दल हैं. चंद्रबाबू नायडू और एमके स्टालिन ने उत्तर भारतीय मतदाताओं के मन-मस्तिष्क को नहीं समझा. द्रमुक और टीडीपी ने मोदी को कमतर आंका. यही वह सीख है, जिसे 2019 में नरेंद्र मोदी की जीत से सीखा जा सकता है.

  • तमिलनाडु में कांटे का मुकाबला

    तमिलनाडु का नाम आते ही आपके जेहन में जयललिता, एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) और करुणानिधि जैसे कद्दावर नेताओं की यादें ताजा हो जाती होंगी. वर्ष 2019 के आम चुनाव इस राज्य में ऐसे पहले चुनाव होने जा रहे हैं, जिसके अभियान से इस तिकड़ी में बाकी बचे दो नेता भी अनुपस्थित हैं. तमिलनाडु में 18 अप्रैल को होनेवाले मतदान में इस राज्य के मतदाता कुल 39 लोकसभा सदस्यों के चुनाव करेंगे. पड़ोस के केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी की एक सीट के लिए भी उसी दिन मतदान होंगे.

  • खंडित ही होगा तमिल जनादेश

    जे जयललिता एवं एम करुणानिधि जैसे कद्दावर नेताओं के निधन के पश्चात तमिलनाडु तो जैसे अब एक नेता विहीन राज्य बन गया है. अगली लोकसभा के लिए आगामी 18 अप्रैल, 2019 को तमिलनाडु में संपन्न होनेवाले आम चुनावों के अभियान में इन दोनों नेताओं की कमी शिद्दत से महसूस की जायेगी. पहले तो डीएमके ने यह घोषणा की कि प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी उसके पसंदीदा उम्मीदवार होंगे. उसके बाद एडीएमके ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपना विश्वास व्यक्त किया.

  • कर्नाटक संकट के लिए कांग्रेस दोषी

    कर्नाटक का राजनीतिक ड्रामा लोकसभा चुनावों का एक ट्रेलर है- गठबंधन सरकार के गिरने के बारे में राष्ट्रीय मीडिया में ऐसी ही सुर्खियां हैं. भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियां अपनी योजना की सफलता को सुनिश्चित करना चाहती हैं. भाजपा यह दिखाना चाहती है कि गठबंधन चाहे देश के स्तर पर हो या क्षेत्रीय स्तर पर, इसे टूटना ही है.

  • एम करुणानिधि के बाद क्या!

    तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि अब हमारे बीच नहीं हैं. उन्हें भरपूर श्रद्धांजलि देना ही काफी नहीं होगा. करुणानिधि के आदर्शों, उनके समय में उनकी सामाजिक अभियांत्रिकी का प्रभाव, द्रविड़ वैचारिकी आदि तो अनिवार्य हैं ही, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों के लिए इन्हें आकार देना निश्चय ही मुश्किल से भरा होगा.

  • कर्नाटक नतीजों से पैदा प्रश्न

    व्यावहारिक अर्थों में कर्नाटक में भाजपा की विजय और कांग्रेस की पराजय हुई है. कांग्रेस विधानसभा में अपनी 125 सीटों से नीचे उतरकर 78 पर पहुंच गयी और दक्षिण का यह महत्वपूर्ण राज्य उसके हाथ से निकल गया. भाजपा अपनी सीटों में काफी बढ़ोतरी करने के बाद भी बहुमत हासिल करने से रह गयी.

  • राष्ट्रपति चुनाव की सियासी सरगर्मी

    पिछले तीस वर्षों के दौरान यह पहला मौका है, जब केंद्र में सत्तासीन दल देश के अगले राष्ट्रपति के लिए विपक्ष का मुंह ताके बगैर अपना प्रत्याशी उतारने और उसे इस सर्वोच्च पद पर बिठाने में समर्थ है. फिर भी, सत्ताधारी दल की जिम्मेवारियों के तहत भाजपा ने एनडीए के अपने समर्थक दलों के साथ ही विपक्षी दलों से भी व्यापक विमर्श की योजना तैयार की है.

  • संपत्तियों पर सिमटी सियासत

    तमिलनाडु की इ पलानीसामी सरकार द्वारा जयललिता की संपत्ति की नीलामी के आदेश ने शशिकला परिवार के लिए तो मुसीबत खड़ी कर दी है, दूसरी ओर उनके शिविर में एक नये सियासी संकट की पृष्ठभूमि भी बन गयी है. क्या पलानीसामी तथा शशिकला के बीच तीव्र मतभेद एआइएडीएमके में तीसरे विभाजन को जन्म देंगे अथवा एक ऐसा संकट पैदा कर देंगे, जो पलानीसामी सरकार को धराशायी कर देगा? दिलचस्प यह है कि पार्टी का ओ पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) धड़ा शशिकला समर्थकों को यह कह कर उकसा रहा है कि अम्मा की सरकार ही अम्मा की संपत्ति नीलाम कर रही है. वैसे यह तय है कि यह विवाद पलानीसामी खेमे को नुकसान पहुंचा कर ही दम लेगा.

  • दक्षिण में राजनीतिक दबाव

    राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भारत की हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में दक्षिण भारत की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर आकर खड़ी है. आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम, वाइएसआर कांग्रेस तथा तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीआरएस) तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए भाजपा के उम्मीदवार को अपने समर्थन का वादा कर दिया है. दूसरी ओर, दक्षिण भारत की राजनीति का एक संजीदा पहलू भी है. पी चिदंबरम के पुत्र पर संकट के बादल घिर आये हैं. एआइएडीएमके के दो परस्पर विरोधी धड़े नरेंद्र मोदी एवं भाजपा सरकार को अपना समर्थन प्रदान करने की स्पर्धा कर रहे हैं. कर्नाटक में, जहां भारतीय जनता पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करती जा रही है, वहीं कांग्रेस पूरी तरह कमजोर बन कर इस परिदृश्य से बाहर होती दिखती है.

  • संशय में पड़ी विलय वार्ता

    एआइएडीएमके के दोनों धड़ों के बीच चल रही विलय वार्ता पर संदेह के बादल घिर आये हैं, क्योंकि ओ पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) धड़ा शशिकला एवं दिनाकरन द्वारा अपने पदों से इस्तीफे दिये जाने की जिद पर अड़ा है. यह धड़ा जून 2017 के मध्य में चेन्नई में एआइएडीएमके के संस्थापक एमजी रामचंद्रन (एमजीआर) की जन्म शताब्दी समारोहों के आयोजन की तैयारी में जुटा है.