अनुज लुगुन

  • पानी की समस्या और राजनीति

    कवि रहीम कहते हैं- ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून/ पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून.’ रहीम ने श्लेष अलंकार के द्वारा पानी के अर्थ का विभिन्न संदर्भों में प्रयोग किया है. पर हम पानी का सीधा अभिप्राय पानी से ही लेंगे.

  • निजीकरण पर ठोस बहस जरूरी

    उदारीकरण के बाद देश में निजीकरण का माहौल तेजी से बढ़ा है. सरकारें निजीकरण को अर्थव्यवस्था के विकल्प के रूप देख रही हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे बुनियादी सामाजिक क्षेत्रों से लेकर रक्षा के क्षेत्र तक में विदेशी निवेश को मंजूरी दी गयी है.

  • राष्ट्रीय राजनीति में आदिवासी

    लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अपने वरिष्ठ आदिवासी नेता कड़िया मुंडा को टिकट नहीं दिया. कड़िया मुंडा ने हमेशा की तरह विनम्रतापूर्वक अपनी पार्टी के निर्णय को स्वीकार कर लिया और कहा कि वे अब फिर से अपने खेतों में हल-बैल के साथ समय गुजारेंगे.

  • तेरह प्वॉइंट रोस्टर का मुद्दा

    बातचीत के दौरान 13 प्वॉइंट रोस्टर पर कुछ विद्यार्थी यह चिंता जाहिर कर रहे थे कि यदि नियुक्तियों में इसी तरह के रोस्टर लागू होंगे, तो हमारे पढ़ने-लिखने का कोई मतलब नहीं रह जायेगा.

  • बदलता आदिवासी समाज-विज्ञान

    भारत से अंग्रेजों का जाना अन्य भारतीयों की तरह ही आदिवासियों के लिए भी अंग्रेजों का जाना था और इसके साथ ही उन्होंने भी नेहरू के नेतृत्व के साथ एक उम्मीद भी जतायी थी. नेहरू स्वयं आदिवासियों को लेकर पंचशील सूत्रों के जरिये अपनी चिंता जता चुके थे, बावजूद इसके उन्होंने देश के विकास के लिए जो रास्ता तय किया,

  • लैंगिक असमानता के विरुद्ध

    पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के आगरा में संजली नाम की एक लड़की को जलाकर मार देने की दहला देनेवाली घटना हुई. अपराधियों ने न केवल बेरहमी से लड़की को जलाकर मार डाला, बल्कि उनके परिवार वालों को फोन पर धमकी भी दी. अपराधियों को यह दुस्साहस कहां से आता है?

  • सबको समान शिक्षा की बात

    अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच ने आगामी 18 फरवरी 2019 को सबको समान शिक्षा के लिए ‘हुंकार रैली’ का आह्वान किया है. इसके लिए शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आंदोलन की कार्ययोजना बनायी है.

  • पांचवीं अनुसूची का महत्व

    साल 1820 में झारखंड के ‘हो’ आदिवासी समुदाय और अंग्रेजों के बीच चाईबासा के निकट रोरो नदी के किनारे पहली लड़ाई हुई थी. उसके पहले न ही अंग्रेजों का और न ही मुख्यधारा के समाज का ‘हो’ आदिवासियों से शासकीय संबंध था. तब के अंग्रेज अधिकारी मेजर रफसेज ने कूटनीतिक हितों को देखते हुए कोल्हान के हो आदिवासियों को कंपनी शासन के अधीन रखने की योजना बनायी. अंग्रेजों द्वारा हो लोगों पर कई हमले किये गये. लेकिन, हो कभी भी अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे. यह वह दौर था, जब दो बड़ी शक्तियां मुगल और मराठों के लिए अंग्रेज चुनौती बन गये थे.

  • फेक न्यूज का हिंसक दौर

    सोशल मीडिया पर प्रचारित अफवाह के कारण पिछले कुछ ही महीनों में देशभर में तीस से ज्यादा बर्बरतापूर्ण हत्याएं हुई हैं. सभी हत्याएं भीड़ द्वारा की गयी हैं. इसमें से किसी चेहरे की पहचान नहीं है.

  • दुनिया में बढ़ता शरणार्थी संकट

    मध्य अमेरिकी देशों से करीब पांच हजार से ज्यादा लोगों का जत्था पैदल करीब डेढ़ हजार किलोमीटर की यात्रा कर अमेरिका जा रहा है. इनमें बच्चे, औरत सब शामिल हैं. भूखे-प्यासे, नंगे पैर ये किसी उम्मीद की तलाश में निकल पड़े हैं. रास्ते में कहीं-कहीं कुछ संस्थाएं उनके लिए दवा और विश्राम की व्यवस्था कर रही हैं. उनकी आंखों की बेबसी द्रवित करनेवाली है, लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें अमेरिका में शरण नहीं दिये जाने की बात कही है.

  • क्या आम लोगों की जिंदगी सस्ती है

    झारखंड हाइकोर्ट के जस्टिस रंगन मुखोपाध्याय ने 2015 में पलामू जिले में हुए कथित माओवादी-पुलिस मुठभेड़ की जांच के आदेश सीबीआइ को देते हुए टिप्पणी की कि राज्य की पुलिस और सीआइडी जैसी जांच एजेंसियों से लोगों का विश्वास डिग रहा है. इसके लिए स्वतंत्र जांच जरूरी है. पलामू जिले के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में नक्सली-पुलिस मुठभेड़ में बारह लोग मारे गये थे. शुरू से ही इस मुठभेड़ को लेकर सवाल उठ रहे थे. इसमें पांच नाबालिग लड़के भी मारे गये थे और मृतकों में एक पारा शिक्षक भी शामिल थे. तब इन सबको नक्सली बताया गया था. जांच में इन सबके नक्सली होने का साक्ष्य साबित नहीं हुआ.

  • पाखंड से इतर लोक का विचार

    इस माह में मगध अंचल में मनाया जानेवाला एक त्योहार है ‘जिउतिया’. इस अंचल के दाउदनगर का जिउतिया सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. वहां इस अवसर पर लगभग सप्ताह भर से स्वांग, नकल, अभिनय और झांकियां प्रस्तुत की जाती हैं. लोक कलाकार हैरतअंगेज करतब दिखाते हैं. आमतौर पर हिंदी पट्टी में स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी बहुत कम दिखती है. यहां तक कि प्रगतिशील संगठनों के कार्यक्रमों में भी. यह हिंदी पट्टी का सामंती और पितृसत्तात्मक लक्षण है. लेकिन, दाउदनगर के जिउतिया त्योहार में स्त्रियों की बराबर की उपस्थिति ने इस पर पुनः विचार करने को विवश किया है. त्योहार के कार्यक्रम की व्यवस्था आपसी सहयोग-सद्भाव के साथ सभी स्थानीय समुदायों के लोग मिल-जुलकर करते हैं.

  • सामाजिक-राजनीतिक समीकरण

    वर्ष 2019 के चुनाव के मद्देनजर तैयारियां हो रही हैं. सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार ने अपने चुनावी वादों के मुताबिक सफलता हासिल नहीं की है. इस दौरान धर्म के नाम पर उन्मादी भीड़ ने खूब उत्पात मचाया है. विरोधी विचार वालों और सत्ता से असहमत होनेवाले पक्षों पर हमले भी बहुत हुए हैं.

  • तर्क, असहमति और शिक्षा

    आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने अपने उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में लिखा है कि ‘सत्य के लिए किसी से नहीं डरना, न लोक से, न वेद से, न मंत्र से, न गुरु से.’ उपन्यास की अंतर्वस्तु में बाणभट्ट को मिली यह सीख जोखिमों से भरी है. शायद ही आज के समय में कोई किसी को इस तरह की सीख देना चाहता है, न ही कोई यह सीख लेना चाहेगा. आजकल की दुनिया ‘प्रैक्टिकल’ होने की दुनिया है, ‘उसूलों’ वाली नहीं, यानी जहां जैसे अपना हित सधता हो उसी के अनुसार आचरण किया जाये.

  • राजनीति में नहीं आपदा का हल

    ऐसा माना जा रहा है कि केरल में पिछले सौ वर्षों में ऐसी भीषण बाढ़ नहीं आयी थी. पिछले कई दिनों से केरल बाढ़ में डूबा हुआ है. सैकड़ों लोगों की मृत्यु हुई है और तीन लाख से ज्यादा लोग राहत शिविरों में रहने के लिए मजबूर हैं. स्थिति सामान्य होने में अभी और कई दिन लगेंगे. बाढ़ प्राकृतिक आपदा है. बाढ़ पुराने समय से आती रही है. भौगोलिक परिस्थितियां भी इसके लिए जिम्मेदार होती हैं, लेकिन जैसे-जैसे आबादी का घनत्व बढ़ता गया है, इसका रूप विकराल होता गया है.

  • ज्ञान के दरवाजे खुले रहें

    पाब्लो नेरुदा की कविता है- ‘अगर पीला रंग खत्म हो जाये / तो हम किससे बनायेंगे रोटी?’ यह कविता बाल सुलभ मासूमियत से लिखी गयी है. अपने जीवन के अंतिम समय में लिखी गयी नेरुदा की इस तरह की कविताएं न तो काव्यशास्त्रीय मानकों को स्थापित करने के उद्देश्य से लिखी गयी हैं और न ही इनका राजनीतिक स्वर है.

  • धान के गीत गानेवाले

    धान रोपनी का एक गीत है- ‘रोपा रोपे गेले रे डिंडा दंगोड़ी गुन्गु उपारे जिलिपी लगाये / लाजो नहीं लगे रे डिंडा दंगोड़ी गुन्गु उपारे जिलिपी लगाये /हर जोते गेले रे डिंडा दंगोड़ा एड़ी भईर तोलोंग लोसाते जाये /लाजो नहीं लगे रे डिंडा दंगोड़ा एड़ी भईर तोलोंग लोसाते जाये.’ झारखंड के आदिवासियों के द्वारा गाये जानेवाले इस गीत में धान की खेती के समय का उल्लास है. यह धान की खेती से जुड़े युवक और युवतियों का चित्रण है. हल जोतते हुए युवक की धोती का ‘तोलोंग’ लहरा रहा है और धान रोपती युवती की बाली ‘गुन्गु’ के ऊपर हिल रही है.

  • आदिवासियों के धर्म का मुद्दा

    कुछ दिन पहले राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, पद्मश्री सोनाम त्सरिंग लेपचा से साथियों के साथ कलिंगपोंग में मेरी लंबी मुलाकात हुई थी. वे लेपचा आदिवासी समुदाय के महान लोक संगीतकार हैं. उन्हें एक साथ आदिवासी दार्शनिक, इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता कहा जा सकता है.

  • बिरसा मुंडा की शहादत के बाद

    नौ जून, 1900- बिरसा मुंडा की शहादत की तारीख. एक ऐसी तारीख जो न केवल आदिवासी समाज के लिए, बल्कि विश्व के जनइतिहास में एक ऐसी तारीख है जो उत्पीड़ित समुदायों और अस्मिताओं के अधिकार और गरिमा की लड़ाई को ऐतिहासिक आधार देती है.

  • पत्थलगड़ी संस्कृति और राजनीति

    एक मुंडारी आदिवासी गीत है- ‘ओको बुरु लो तना रे सुकुल भईर नेलो ताना/ हय रे हय रे गातिंग रे नेली रेयो कय नेलोआ/ दिरी तेको थेन किया रे जनुम तेको रामे किया...’ अर्थात् ‘कौन सा जंगल जल रहा है, केवल धुआं दिखायी दे रहा है? ओह मेरे साथी! अब देखने से भी नहीं दिख रहे/ उसे पत्थर में सहेज दिया गया/ उसे झाड़ियों से घेर दिया गया.’ यह गीत आदिवासियों के औपनिवेशिक संघर्ष की दास्तां कहता है. इसमें मुंडाओं के द्वारा किये जानेवाले अंतिम संस्कार की रस्म है, जिमसें मृतक के कब्र पर ससम्मान पत्थर समर्पित किया जाता है.